सहमति से बने यौन संबंधों को रेप के दायरे से बाहर रखने के लिए लाया जा रहा है रोमियो-जूलियट कानून।
पड़ोसी देश नेपाल में किशोरों के आपसी संबंधों और उनके अधिकारों को लेकर एक बहुत बड़ा कानूनी बदलाव आकार ले रहा
- नेपाल में किशोरों के प्रेम संबंधों को लेकर कानूनी ढांचे में बड़े बदलाव की ऐतिहासिक तैयारी
- तीन साल के आयु अंतर की छूट से नाबालिगों को आपराधिक मुकदमों और सामाजिक कलंक से मिलेगी बड़ी राहत
पड़ोसी देश नेपाल में किशोरों के आपसी संबंधों और उनके अधिकारों को लेकर एक बहुत बड़ा कानूनी बदलाव आकार ले रहा है। वर्तमान समय में वहां की सरकार एक ऐसे विशेष कानूनी संशोधन पर काम कर रही है, जिसे वैश्विक स्तर पर रोमियो-जूलियट कानून के नाम से जाना जाता है। इस नए कानून को लाने का मुख्य उद्देश्य किशोर वय के लड़के-लड़कियों के बीच आपसी सहमति से बनने वाले रोमांटिक या शारीरिक संबंधों को जबरन या शोषण वाले अपराधों से अलग करना है। मौजूदा व्यवस्था में उम्र की सीमा के कारण कई बार किशोरों के आपसी और स्वैच्छिक संबंधों को भी गंभीर अपराध की श्रेणी में डाल दिया जाता है, जिससे कई युवाओं का पूरा भविष्य और करियर शुरुआती दौर में ही नष्ट हो जाता है। इस कानूनी विसंगति को दूर करने के लिए वहां के नीति निर्माता अब इस नए और व्यावहारिक दृष्टिकोण को अपनाने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रहे हैं।
इस नए कानून के तकनीकी और व्यावहारिक स्वरूप को समझना बेहद जरूरी है, क्योंकि यह कानून नाबालिगों की सुरक्षा से समझौता किए बिना उनके प्राकृतिक विकास को स्वीकार करता है। रोमियो-जूलियट कानून के तहत एक ऐसी व्यवस्था की जा रही है जिसमें यदि दोनों भागीदारों की उम्र के बीच का अंतर एक निश्चित सीमा के भीतर है, तो उनके बीच आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंधों को बलात्कार या वैधानिक दुराचार नहीं माना जाएगा। नेपाल सरकार इस कानून के अंतर्गत मुख्य रूप से 16 से 18 वर्ष के बीच के किशोरों के लिए तीन साल के आयु अंतर की विशेष छूट का प्रावधान करने जा रही है। इसका सीधा मतलब यह है कि यदि कोई 18 वर्ष का लड़का अपनी सहमति से किसी 16 या 17 वर्ष की लड़की के साथ संबंध में है, तो उसे कानूनी रूप से एक गंभीर अपराधी नहीं माना जाएगा, बशर्ते उस रिश्ते में किसी भी प्रकार का दबाव या शोषण शामिल न हो।
नेपाल में वर्तमान समय में लागू कानूनी व्यवस्था बेहद सख्त है, जिसके तहत 18 वर्ष से कम उम्र के किसी भी व्यक्ति के साथ बनाया गया शारीरिक संबंध पूरी तरह से अवैध और दंडनीय है। इस मौजूदा कानून में पीड़ित की सहमति का कोई कानूनी महत्व नहीं होता है, यानी अगर दोनों पक्ष पूरी तरह राजी भी हों, तो भी कानून की नजर में वह एक गंभीर यौन अपराध ही माना जाता है। इसके साथ ही वहां विवाह के लिए न्यूनतम कानूनी उम्र 20 वर्ष तय की गई है, जबकि नागरिकता 16 वर्ष में और मतदान का अधिकार 18 वर्ष में मिल जाता है। इस उम्र के विरोधाभास के कारण समाज में एक अजीब स्थिति पैदा हो गई है, जहां एक युवा देश का भविष्य तय करने के लिए वोट तो डाल सकता है, लेकिन अपने व्यक्तिगत जीवन के फैसले लेने पर उसे सीधे जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया जाता है। इस विसंगति के कारण सैकड़ों युवा लड़के इस समय अदालतों के चक्कर काट रहे हैं और जेलों में बंद हैं।
कानूनी विसंगति का प्रभाव
वर्तमान व्यवस्था का सबसे नकारात्मक पहलू यह है कि जब भी कोई किशोर जोड़ा अपनी मर्जी से घर से भागकर शादी कर लेता है या संबंध बनाता है, तो लड़की के परिवार वाले सामाजिक प्रतिष्ठा और नाराजगी के कारण लड़के के खिलाफ अपहरण और बलात्कार का मुकदमा दर्ज करवा देते हैं। कानून में सहमति का कोई स्थान न होने के कारण अदालतों को भी मजबूरी में उन लड़कों को लंबी सजा सुनानी पड़ती है।
इस प्रस्तावित बदलाव को लेकर देश के भीतर एक बहुत बड़ी और व्यापक बहस छिड़ गई है, जिसमें विभिन्न पक्षों के अपने-अपने तर्क और चिंताएं शामिल हैं। युवा अधिकार कार्यकर्ताओं और कानून के छात्रों के एक बड़े वर्ग का मानना है कि समकालीन समाज की वास्तविकताओं को देखते हुए कानून में लचीलापन लाना बेहद आवश्यक हो चुका है। उनका तर्क है कि दो हमउम्र किशोरों के बीच के स्वाभाविक आकर्षण को एक प्रौढ़ अपराधी द्वारा किए जाने वाले शोषण के समकक्ष नहीं रखा जा सकता। कठोर कानून समाज में सुधार लाने के बजाय युवाओं में डर और मानसिक अवसाद को बढ़ावा दे रहे हैं। इसलिए, कानून को सुरक्षात्मक होना चाहिए न कि इतना दंडात्मक कि वह सामान्य मानवीय व्यवहार को ही एक बहुत बड़ा अपराध घोषित कर दे।
दूसरी तरफ, इस कानून को लेकर महिला अधिकार संगठनों और बाल संरक्षण के क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाओं के मन में गंभीर संशय और आशंकाएं भी बनी हुई हैं। उनका मुख्य डर यह है कि इस प्रकार की कानूनी ढील से देश में बाल विवाह और लड़कियों के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों को बढ़ावा मिल सकता है। नेपाल के ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में आज भी बाल विवाह और लैंगिक हिंसा एक बहुत बड़ी चुनौती बनी हुई है, जहां जबरन शादियों को आपसी सहमति का रूप देकर इस कानून का दुरुपयोग किया जा सकता है। इसलिए, यह मांग भी पुरजोर तरीके से उठाई जा रही है कि किसी भी नए संशोधन को लागू करने से पहले समाज की जमीनी हकीकत को अच्छी तरह समझा जाए और कानून में ऐसे सुरक्षा कवच लगाए जाएं जिससे कि वास्तविक शोषक इसका फायदा न उठा सकें।
नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय ने भी पूर्व में आए कुछ मामलों की सुनवाई के दौरान इस व्यावहारिक समस्या को स्वीकार किया था और कानून में सुधार करने की आवश्यकता की ओर ध्यान आकर्षित किया था। अदालती फैसलों में यह देखा गया कि आपसी सहमति से शादी करने वाले जोड़ों पर जब बलात्कार के मुकदमे चलाए जाते हैं, तो वह न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत होता है। अदालत ने एक मामले में शादी को केवल बाल विवाह का उल्लंघन मानते हुए बलात्कार की धाराओं को हटा दिया था और मामूली सजा दी थी ताकि युवा जोड़े का जीवन बर्बाद न हो। इसी न्यायिक समझ और प्रशासनिक बैठकों के दौर के बाद अब सरकार इस विधेयक को संसद में पेश करने की अंतिम तैयारियों में जुटी हुई है, जिससे कानून और न्याय व्यवस्था के बीच एक संतुलन स्थापित किया जा सके।
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