कांगो और युगांडा में इबोला के प्रकोप को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जारी किया वैश्विक आपातकाल, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुरक्षात्मक उपाय तेज करने के निर्देश

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य और युगांडा में इबोला वायरस के बढ़ते मामलों को देखते हुए इसे अंतरराष्ट्रीय

May 18, 2026 - 13:41
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कांगो और युगांडा में इबोला के प्रकोप को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जारी किया वैश्विक आपातकाल, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुरक्षात्मक उपाय तेज करने के निर्देश
कांगो और युगांडा में इबोला के प्रकोप को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जारी किया वैश्विक आपातकाल, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुरक्षात्मक उपाय तेज करने के निर्देश
  • अफ्रीकी देशों में फैलते संक्रमण के बीच भारतीय स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने जताई राहत, कोविड-19 की तुलना में इबोला के सीमित प्रसार तंत्र को बताया सुरक्षित आधार
  • भारत में नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल ने बढ़ाई निगरानी, देश की प्रयोगशालाओं में त्वरित RT-PCR जांच और शुरुआती क्लीनिकल पहचान पर दिया जा रहा विशेष जोर

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य और युगांडा में इबोला वायरस के बढ़ते मामलों को देखते हुए इसे अंतरराष्ट्रीय चिंता का सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित कर दिया है। यह फैसला अफ्रीकी महाद्वीप के कई हिस्सों में संक्रमण की तेज रफ्तार और एक देश से दूसरे देश में फैलते मामलों के गहन मूल्यांकन के बाद लिया गया है। इस घोषणा का मुख्य उद्देश्य वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य प्रणालियों को सतर्क करना, अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना और प्रभावित क्षेत्रों के लिए वित्तीय व चिकित्सीय संसाधनों को तुरंत जुटाना है। वैश्विक स्वास्थ्य निकाय के अनुसार, मौजूदा स्थिति को नियंत्रित करने के लिए सीमाओं पर थर्मल स्क्रीनिंग और संक्रमितों के संपर्क में आए लोगों की त्वरित ट्रैकिंग बेहद आवश्यक हो गई है। इस आपातकाल के बाद दुनिया भर के हवाई अड्डों और बंदरगाहों पर यात्रियों की निगरानी से जुड़े नियमों को कड़ा किया जा रहा है।

इस वैश्विक घोषणा के तुरंत बाद भारतीय स्वास्थ्य महकमे ने देश में सुरक्षात्मक तंत्र की समीक्षा शुरू कर दी है। देश के शीर्ष चिकित्सा अधिकारियों का कहना है कि भारत के नागरिकों को इस स्थिति से घबराने या पैनिक करने की बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं है। इस राहत की सबसे बड़ी वजह यह है कि इबोला वायरस का प्रसार तंत्र कोविड-19 जैसे सांस से जुड़े संक्रमणों से पूरी तरह अलग है। कोविड-19 जहां हवा में मौजूद छोटी बूंदों या ड्रॉपलेट्स के माध्यम से बेहद तेजी से एक से दूसरे इंसान में फैलता है, वहीं इबोला के फैलने का तरीका इतना सुगम नहीं है। इसके बावजूद, देश की घनी आबादी को देखते हुए स्वास्थ्य मंत्रालय ने पूरी सतर्कता बरतने के निर्देश दिए हैं और किसी भी संभावित खतरे से निपटने के लिए अग्रिम तैयारियां शुरू कर दी हैं।

भारत में इस वायरस के ऐतिहासिक आंकड़ों पर नजर डालें तो देश के भीतर अब तक इबोला संक्रमण का कोई भी स्थानीय मामला दर्ज नहीं किया गया है। आखिरी बार साल 2014 में एक अंतरराष्ट्रीय यात्री की जांच रिपोर्ट पॉजिटिव आई थी, जिसे हवाई अड्डे पर ही आइसोलेट कर दिया गया था और देश के भीतर संक्रमण फैलने नहीं पाया था। वर्तमान में नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल इस पूरे घटनाक्रम पर चौबीसों घंटे पैनी नजर बनाए हुए है। विभाग द्वारा उन सभी अंतरराष्ट्रीय यात्रियों की स्वास्थ्य हिस्ट्री खंगाली जा रही है जो प्रभावित अफ्रीकी देशों से यात्रा करके भारत लौट रहे हैं। इसके साथ ही बंदरगाहों और हवाई अड्डों पर बने स्वास्थ्य काउंटरों को अलर्ट मोड पर डाल दिया गया है ताकि किसी भी संदिग्ध मरीज को सीमा पर ही चिन्हित किया जा सके।

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के पूर्व नेतृत्वकर्ताओं के अनुसार, इबोला वायरस के प्रसार को रोकने के लिए इसके संक्रमण के तरीकों को ठीक से समझना जरूरी है। यह वायरस केवल तभी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में जाता है जब कोई स्वस्थ इंसान संक्रमित मरीज के शारीरिक तरल पदार्थों, जैसे खून, उल्टी, पसीने, लार या अन्य स्राव के सीधे संपर्क में आता है। इसके अलावा, संक्रमित व्यक्ति के इस्तेमाल किए गए कपड़ों, बिस्तरों या सुइयों जैसी दूषित चीजों को छूने से भी यह बीमारी फैल सकती है। चूंकि यह संक्रमण हवा के जरिए नहीं फैलता, इसलिए जब तक कोई व्यक्ति किसी मरीज के सीधे और बेहद करीबी संपर्क में न आए, तब तक इसके फैलने की संभावना न के बराबर होती है। यही कारण है कि इसे व्यापक स्तर पर फैलने से रोकना कोविड जैसी महामारियों के मुकाबले काफी आसान माना जाता है।

चिकित्सीय बुनियादी ढांचे की बात करें तो भारत के पास इस वायरस का बेहद शुरुआती स्तर पर पता लगाने के लिए पर्याप्त और आधुनिक प्रयोगशाला क्षमता मौजूद है। देश के विभिन्न राज्यों में निर्धारित किए गए विशेष केंद्रों पर RT-PCR जांच की सुविधाएं पूरी तरह से कार्यशील हैं, जो कुछ ही घंटों में इस वायरस की सटीक पहचान कर सकती हैं। इन प्रयोगशालाओं में बायो-सेफ्टी स्तर के कड़े नियमों का पालन किया जाता है ताकि जांच प्रक्रिया के दौरान कोई अन्य व्यक्ति संक्रमित न हो। स्वास्थ्य विभाग ने इन सभी जांच केंद्रों को आवश्यक रीएजेंट्स और टेस्टिंग किट्स का बफर स्टॉक तैयार रखने के निर्देश दिए हैं ताकि आपातकालीन स्थिति में जांच में कोई देरी न हो। लैब की तैयारियों के साथ-साथ चिकित्सा प्रणालियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बीमारी के शुरुआती लक्षणों की पहचान करना है। इबोला के शुरुआती लक्षण सामान्य फ्लू, मलेरिया या टाइफाइड जैसे हो सकते हैं, जिनमें तेज बुखार, बदन दर्द, कमजोरी और गले में खराश शामिल हैं। ऐसे में अस्पतालों और डॉक्टरों के स्तर पर क्लीनिकल संदेह होना और बिना समय गंवाए उसकी तुरंत रिपोर्ट करना सबसे महत्वपूर्ण कदम बन जाता है। यदि कोई डॉक्टर किसी ऐसे मरीज को देखता है जिसमें ये लक्षण हैं और उसकी हालिया यात्रा का इतिहास प्रभावित देशों से जुड़ा है, तो उसे तुरंत आइसोलेशन वॉर्ड में शिफ्ट करने की गाइडलाइन जारी की गई है। बीमारी को शुरुआती दौर में ही रोक देना ही इस वायरस को समुदाय में फैलने से बचाने का एकमात्र अचूक उपाय है।

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