6 महीने भी नहीं चलेगी विजय की सरकार, सत्ता परिवर्तन के तुरंत बाद सत्ताधारी गठबंधन के भविष्य पर विपक्षी दल ने खड़े किए गंभीर और तीखे सवाल।
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के अप्रत्याशित और ऐतिहासिक नतीजों के बाद राज्य की राजनीतिक जमीन पर जारी उठापटक
- नवगठित सरकार के अल्पायु होने का विरोधी खेमे ने किया दावा, गठबंधन के अंतर्विरोधों के जल्द सतह पर आने की राजनीतिक हलकों में तेज हुई सुगबुगाहट
- द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के वरिष्ठ विधायक के बयान से क्षेत्रीय राजनीति में मची खलबली, छह महीने के भीतर सत्ता संरचना बिखरने की दी गई खुली चेतावनी
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के अप्रत्याशित और ऐतिहासिक नतीजों के बाद राज्य की राजनीतिक जमीन पर जारी उठापटक थमने का नाम नहीं ले रही है। हाल ही में संपन्न हुए लोकतांत्रिक महासमर में दशकों पुराने द्विध्रुवीय राजनीतिक परिदृश्य को बदलते हुए एक नए राजनीतिक संगठन ने सत्ता की बागडोर संभाली है। इस अभूतपूर्व बदलाव के तुरंत बाद, अब राज्य के मुख्य विपक्षी दल द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (द्रमुक) की ओर से नवनिर्वाचित सरकार के स्थायित्व को लेकर बेहद तीखा और हमलावर बयान सामने आया है। विपक्षी दल के एक अत्यंत प्रभावकारी और वरिष्ठ विधायक ने सार्वजनिक मंच से यह बड़ा दावा किया है कि नवगठित सरकार का कार्यकाल बेहद सीमित है और यह छह महीने की अवधि भी पूरी नहीं कर पाएगी। इस बयान ने राज्य की प्रशासनिक और रणनीतिक गलियों में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है, जिससे यह साफ है कि आने वाले दिनों में राज्य के भीतर एक बड़ा कूटनीतिक टकराव देखने को मिल सकता है।
विपक्षी खेमे द्वारा लगाए गए इन गंभीर आरोपों के पीछे जो तर्क दिए जा रहे हैं, वे पूरी तरह से वर्तमान सरकार के गठन की परिस्थितियों और संख्याबल के गणित पर आधारित हैं। विधानसभा चुनाव में सबसे बड़े दल के रूप में उभरने के बावजूद, सत्तासीन दल बहुमत के जादुई आंकड़े से थोड़ा पीछे रह गया था, जिसके चलते उसे सरकार बनाने के लिए कई अन्य क्षेत्रीय और राष्ट्रीय विचारधारा वाले दलों का बाहरी और आंतरिक सहयोग लेना पड़ा। द्रमुक विधायक का मानना है कि इतनी विरोधाभासी विचारधाराओं के मेल से बनी बैसाखियों वाली यह सरकार आंतरिक मतभेदों के बोझ तले खुद ही दब जाएगी। उनके अनुसार, अलग-अलग राजनीतिक हितों और क्षेत्रीय आकांक्षाओं को एक साथ जोड़कर रखी गई इस व्यवस्था में विभागों के बंटवारे से लेकर नीतिगत फैसलों तक पर हर कदम पर गतिरोध पैदा होना तय है, जो अंततः इस सरकार के समय से पहले पतन का कारण बनेगा।
राज्य के इस नए सियासी ड्रामे की गहराई में जाएं तो यह बात पूरी तरह साफ हो जाती है कि तमिलनाडु की जनता ने इस बार पारंपरिक द्रविड़ राजनीति से अलग हटकर एक नए विकल्प को आजमाया है। दशकों तक राज्य की सत्ता पर बारी-बारी से राज करने वाले दोनों बड़े दलों को इस बार तगड़ा झटका लगा है। लेकिन सत्ता हाथ से जाने की इस छटपटाहट के बीच, पराजित दलों ने अब नए शासकों की प्रशासनिक अनुभवहीनता को अपना मुख्य हथियार बना लिया है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि सिनेमा के पर्दे से सीधे राजनीति के शिखर तक पहुंचे नेतृत्व के पास इतने बड़े और औद्योगिक रूप से विकसित राज्य को चलाने का कोई पूर्व अनुभव नहीं है। नौकरशाही को नियंत्रित करने और जटिल कल्याणकारी योजनाओं को धरातल पर उतारने में आने वाली व्यावहारिक चुनौतियों के सामने यह नई व्यवस्था बहुत जल्द घुटने टेक देगी।
राजनीतिक रणनीतिकारों के अनुसार, इस पूरे विवाद का मुख्य केंद्र बिंदु हाल ही में विधानसभा के भीतर हुआ वह शक्ति परीक्षण भी है, जिसे नई सरकार ने तकनीकी रूप से तो पास कर लिया है, लेकिन उसकी आंतरिक कमियां अभी भी बरकरार हैं। विपक्ष का आरोप है कि सदन के पटल पर बहुमत साबित करने के लिए जिस तरह के राजनीतिक समझौतों और जोड़-तोड़ का सहारा लिया गया, वह लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुकूल नहीं था। सरकार को टिकाए रखने के लिए सहयोगी दलों को जो बड़े-बड़े आश्वासन दिए गए हैं, उन्हें पूरा करना राज्य के सीमित वित्तीय संसाधनों को देखते हुए लगभग असंभव होगा। जैसे ही सहयोगी दलों की महत्वाकांक्षाएं अधूरी रहनी शुरू होंगी, वैसे ही इस गठबंधन की दीवारें दरकने लगेंगी और छह महीने का समय बीतते-बीतते यह पूरी व्यवस्था ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगी।
इस कड़े राजनीतिक हमले के जवाब में सत्ताधारी दल के रणनीतिकारों और मंत्रियों ने भी पलटवार करने में देर नहीं की है। नए प्रशासन का कहना है कि विपक्ष अभी तक अपनी करारी और ऐतिहासिक हार के सदमे से बाहर नहीं आ पाया है, जिसके कारण उसके नेता इस तरह के बेबुनियाद और हताशा से भरे बयान दे रहे हैं। सत्तापक्ष के नेताओं के मुताबिक, राज्य की जनता ने उन्हें पांच साल के लिए एक मजबूत और स्पष्ट जनादेश दिया है और उनके पास सरकार को सुचारू रूप से चलाने के लिए आवश्यक संख्याबल से कहीं ज्यादा विधायकों का अटूट समर्थन हासिल है। सरकार के सलाहकारों का दावा है कि उनके नीतिगत एजेंडे में सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता और युवाओं के लिए रोजगार जैसे मुख्य मुद्दे शामिल हैं, जिन पर सभी सहयोगी दल पूरी तरह से एकमत हैं, इसलिए सरकार को कोई खतरा नहीं है।
तमिलनाडु की इस गरमाई हुई राजनीति का असर अब राज्य के आम नागरिकों और प्रशासनिक मशीनरी पर भी दिखने लगा है। एक तरफ जहां नई सरकार के समर्थक इस बात से उत्साहित हैं कि राज्य को एक नया और युवा नेतृत्व मिला है जो पुरानी रूढ़ियों को तोड़ेगा, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष द्वारा लगातार फैलाई जा रही राजनीतिक अस्थिरता की अफवाहों से निवेशकों और उद्योग जगत के भीतर एक असमंजस की स्थिति पैदा हो रही है। औद्योगिक संगठनों का मानना है कि यदि राज्य में राजनीतिक स्थिरता को लेकर लगातार सवाल उठते रहेंगे, तो नए निवेश प्रस्तावों और विकास परियोजनाओं की गति धीमी पड़ सकती है। इस स्थिति से निपटने के लिए नए मुख्यमंत्री को जल्द से जल्द कुछ बड़े और ठोस नीतिगत फैसले लेने होंगे ताकि जनता और बाजार दोनों के भीतर सरकार की साख को और मजबूती से स्थापित किया जा सके।
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