दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित सेंट स्टीफेंस कॉलेज पर लगा धार्मिक भेदभाव का गंभीर आरोप, डूटा अध्यक्ष के बयानों के बाद शैक्षणिक गलियारों में मचा भारी बवाल।
दिल्ली विश्वविद्यालय के सबसे प्रतिष्ठित और ऐतिहासिक शैक्षणिक संस्थानों में शुमार सेंट स्टीफेंस कॉलेज एक बार फिर वैचारिक और
- अकादमिक नियुक्तियों और अनिवार्य धार्मिक असेंबली को लेकर प्रबंधन और शिक्षक संगठनों के बीच टकराव तेज, स्वायत्तता बनाम नियमों की अनदेखी पर छिड़ी नई बहस
- प्रशासनिक व्यवस्था और बहुसंख्यक समुदाय के अधिकारों की उपेक्षा के दावों ने पकड़ा तूल, विश्वविद्यालय प्रशासन से लेकर मंत्रालय तक हस्तक्षेप की बढ़ने लगी मांग
दिल्ली विश्वविद्यालय के सबसे प्रतिष्ठित और ऐतिहासिक शैक्षणिक संस्थानों में शुमार सेंट स्टीफेंस कॉलेज एक बार फिर वैचारिक और प्रशासनिक विवादों के केंद्र में आ गया है। इस बार विवाद की वजह दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (डूटा) के अध्यक्ष द्वारा कॉलेज प्रबंधन पर लगाए गए अत्यंत गंभीर और संवेदनशील आरोप हैं। शिक्षक संघ के शीर्ष नेतृत्व ने सीधे तौर पर कॉलेज की प्रशासनिक नीतियों को एक विशेष समुदाय के हितों के खिलाफ और पक्षपातपूर्ण करार दिया है। इस बयान के सार्वजनिक होते ही न केवल विश्वविद्यालय के भीतर बल्कि पूरे देश के शैक्षणिक और सामाजिक हलकों में एक बहुत बड़ा बवंडर खड़ा हो गया है। आरोपों के केंद्र में कॉलेज के भीतर होने वाली प्रशासनिक नियुक्तियां, साक्षात्कार की प्रक्रिया और छात्रों के लिए आयोजित होने वाली सुबह की प्रार्थना सभाएं शामिल हैं, जिन्हें लेकर लंबे समय से सुगबुगाहट चल रही थी, लेकिन अब इसने एक बड़े टकराव का रूप ले लिया है।
इस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू कॉलेज के भीतर होने वाली शैक्षणिक और गैर-शैक्षणिक स्टाफ की नियुक्तियों से जुड़ा हुआ है। शिक्षक संघ का दावा है कि कॉलेज प्रशासन एक खास अल्पसंख्यक दर्जे की आड़ में विश्वविद्यालय के स्थापित नियमों, आरक्षण नीतियों और योग्यता के मानकों को दरकिनार कर रहा है। यह आरोप लगाया गया है कि साक्षात्कार समितियों में मनमाने ढंग से बदलाव किए जाते हैं और बहुसंख्यक समुदाय से आने वाले योग्य उम्मीदवारों को जानबूझकर चयन प्रक्रिया से बाहर कर दिया जाता है। इस प्रकार की प्रशासनिक कार्यप्रणाली को लेकर शिक्षकों के एक बड़े वर्ग में लंबे समय से असंतोष व्याप्त था, जो अब डूटा अध्यक्ष के कड़े रुख के बाद खुलकर सतह पर आ गया है। इस स्थिति ने कॉलेज की उस स्वायत्तता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसका उपयोग वह अपने आंतरिक मामलों को संचालित करने के लिए करता रहा है।
नियुक्तियों के अलावा, कॉलेज परिसर के भीतर होने वाली दैनिक गतिविधियों और धार्मिक असेंबली को लेकर भी विवाद काफी गहरा गया है। शिक्षक संगठन का आरोप है कि कॉलेज प्रशासन द्वारा एक ऐसी व्यवस्था को बढ़ावा दिया जा रहा है जो धर्मनिरपेक्ष देश के शैक्षणिक मानदंडों के अनुकूल नहीं है। सुबह की प्रार्थना सभाओं या असेंबली में सभी छात्रों की उपस्थिति को लेकर जो आंतरिक नियम बनाए गए हैं, उन्हें लेकर यह दावा किया जा रहा है कि यह परोक्ष रूप से गैर-ईसाई छात्रों पर एक विशेष धार्मिक विचार थोपने का प्रयास है। इस प्रक्रिया को पूरी तरह से भेदभावपूर्ण और भारतीय संविधान के धर्मनिरपेक्ष ढांचे के खिलाफ बताते हुए इसके खिलाफ तुरंत दंडात्मक और सुधारात्मक कदम उठाने की मांग की जा रही है। इस विवाद ने परिसर के भीतर पढ़ रहे विभिन्न समुदायों के छात्रों के बीच भी एक अजीब सी असहजता और वैचारिक विभाजन की स्थिति पैदा कर दी है।
इस बड़े विवाद की पृष्ठभूमि में सेंट स्टीफेंस कॉलेज को मिलने वाले विशेष अल्पसंख्यक दर्जे और दिल्ली विश्वविद्यालय के साथ उसके ऐतिहासिक संबंधों की कानूनी जटिलताएं भी शामिल हैं। एक स्वायत्त ईसाई अल्पसंख्यक संस्थान होने के नाते कॉलेज को अपने यहां 50 प्रतिशत सीटें ईसाई छात्रों के लिए आरक्षित रखने और अपनी प्रवेश व नियुक्ति प्रक्रिया खुद तय करने का विशेष अधिकार प्राप्त है। हालांकि, दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ और अन्य संबंधित संगठनों का तर्क है कि चूंकि कॉलेज को मिलने वाली वित्तीय सहायता का एक बहुत बड़ा हिस्सा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और सार्वजनिक धन से आता है, इसलिए वह देश के संवैधानिक नियमों और आरक्षण के सिद्धांतों को पूरी तरह से खारिज नहीं कर सकता। स्वायत्तता के नाम पर किसी भी प्रकार के वैचारिक या धार्मिक पूर्वाग्रह को शैक्षणिक संस्थानों में प्रश्रय नहीं दिया जाना चाहिए, क्योंकि यह शिक्षा की गुणवत्ता और निष्पक्षता को प्रभावित करता है।
प्रशासनिक मशीनरी पर लगे इन तीखे और संगीन आरोपों के जवाब में कॉलेज प्रबंधन और उसके समर्थकों का पक्ष भी पूरी तरह से अलग है। संस्थान के करीबियों और प्रशासनिक अधिकारियों का मानना है कि कॉलेज पर लगाए जा रहे सभी आरोप पूरी तरह से बेबुनियाद, राजनीति से प्रेरित और संस्थान की वैश्विक सादगी व प्रतिष्ठा को धूमिल करने का एक सुनियोजित प्रयास हैं। प्रबंधन के अनुसार, कॉलेज हमेशा से अपनी उच्च शैक्षणिक परंपराओं, कड़े अनुशासन और पारदर्शी चयन प्रक्रियाओं के लिए जाना जाता रहा है, जहां किसी भी स्तर पर धर्म या जाति के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाता। सुबह की असेंबली को लेकर उनका कहना है कि यह संस्थान की एक सदी से भी पुरानी परंपरा का हिस्सा है जिसका उद्देश्य छात्रों में नैतिक मूल्यों का विकास करना है, न कि किसी विशिष्ट धार्मिक विचारधारा का प्रचार-प्रसार करना।
इस पूरे मामले ने अब दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रशासनिक तंत्र और शिक्षा मंत्रालय के गलियारों तक भी अपनी धमक पहुंचा दी है। डूटा के कड़े रुख और लगातार बढ़ते विरोध प्रदर्शनों को देखते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन पर इस मामले में एक उच्च स्तरीय जांच समिति गठित करने का भारी दबाव है। विभिन्न शिक्षक संगठनों और छात्र गुटों का मानना है कि यदि इन आरोपों की समय रहते निष्पक्ष जांच नहीं कराई गई, तो इससे विश्वविद्यालय की साख को अपूरणीय क्षति पहुंचेगी। इसके साथ ही, देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले छात्रों के मन में भी इस ऐतिहासिक संस्थान की निष्पक्षता को लेकर एक गहरा अविश्वास पैदा हो जाएगा, जो किसी भी स्वस्थ लोकतांत्रिक शैक्षणिक व्यवस्था के लिए अत्यंत खतरनाक संकेत है।
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