मध्य प्रदेश के धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला परिसर पर आया न्यायिक निर्णय, पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर मंदिर होने की पुष्टि।

मध्य प्रदेश के धार जनपद में स्थित ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण भोजशाला-कमल मौला मस्जिद परिसर को

May 16, 2026 - 12:47
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मध्य प्रदेश के धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला परिसर पर आया न्यायिक निर्णय, पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर मंदिर होने की पुष्टि।
मध्य प्रदेश के धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला परिसर पर आया न्यायिक निर्णय, पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर मंदिर होने की पुष्टि।
  • सनातन संस्कृति के प्राचीन प्रतीकों, देवी-देवताओं की खंडित मूर्तियों और शिलालेखों ने कानूनी लड़ाई में निभाई बेहद निर्णायक भूमिका
  • वैज्ञानिक सर्वेक्षण की विस्तृत रिपोर्ट को अदालत ने माना अकाट्य साक्ष्य, सदियों पुराने सांस्कृतिक और धार्मिक गतिरोध का हुआ पटाक्षेप

मध्य प्रदेश के धार जनपद में स्थित ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण भोजशाला-कमल मौला मस्जिद परिसर को लेकर चल रहे दशकों पुराने कानूनी और धार्मिक विवाद में एक युगान्तकारी मोड़ आ गया है। उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ ने इस बेहद संवेदनशील मामले पर अपना एक ऐतिहासिक और दूरगामी फैसला सुनाया है, जिसके तहत इस विवादित परिसर को मूल रूप से वाग्देवी (मां सरस्वती) का प्राचीन मंदिर घोषित किया गया है। अदालत का यह निर्णय भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा हाल ही में किए गए बेहद वैज्ञानिक, आधुनिक और विस्तृत सर्वेक्षण की प्रामाणिक रिपोर्ट के आधार पर आया है। इस न्यायिक आदेश के बाद से न केवल मध्य प्रदेश बल्कि पूरे देश के सांस्कृतिक और कानूनी हलकों में एक बहुत बड़ी हलचल पैदा हो गई है। न्यायालय का यह फैसला इस बात को बेहद मजबूती से स्थापित करता है कि ऐतिहासिक धरोहरों के स्वामित्व का निर्धारण आस्था के बजाय पूरी तरह से वैज्ञानिक, पुरातात्विक और ऐतिहासिक तथ्यों के ठोस धरातल पर ही किया जाना चाहिए।

इस बेहद जटिल और ऐतिहासिक मामले की अदालती कार्यवाही और उसके ऐतिहासिक बैकग्राउंड पर नजर डालें तो धार की भोजशाला को लेकर लंबे समय से हिंदू और मुस्लिम पक्षों के बीच तीखा गतिरोध बना हुआ था। हिंदू पक्ष का हमेशा से यह अटूट दावा रहा था कि यह परिसर राजा भोज द्वारा निर्मित ग्यारहवीं सदी का एक अत्यंत भव्य वाग्देवी मंदिर और संस्कृत पाठशाला है, जिसे बाद में मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा क्षतिग्रस्त करके मस्जिद का रूप देने का प्रयास किया गया था। इस गतिरोध को स्थाई रूप से सुलझाने के लिए उच्च न्यायालय ने पिछले दिनों एएसआई को आधुनिक तकनीकों जैसे ग्राउंड पेनिट्रेटिंग राडार (जीपीआर), कार्बन डेटिंग और विजुअल एपिग्रॉफी के जरिए पूरे परिसर का एक मुकम्मल और वैज्ञानिक सर्वे करने का सख्त निर्देश दिया था। पुरातत्व विभाग की टीम ने कई हफ्तों तक परिसर के चप्पे-चप्पे की गहराई से जांच की और जो रिपोर्ट अदालत के समक्ष पेश की, उसने पूरे मामले की दिशा और दशा को पूरी तरह से बदलकर रख दिया। राजा भोज द्वारा धार में निर्मित भोजशाला को प्राचीन भारत में ज्ञान, विज्ञान, कला और सनातन संस्कृति का एक बहुत बड़ा और प्रतिष्ठित केंद्र माना जाता था। यहाँ देश-विदेश से विद्वान संस्कृत व्याकरण, खगोल शास्त्र और दर्शन की शिक्षा लेने आते थे। एएसआई के ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, इस परिसर की वास्तुकला पूरी तरह से धार के परमार राजवंश की विशिष्ट स्थापत्य शैली से मेल खाती है, जिसे बाद के कालखंडों में कई सैन्य संघर्षों और राजनीतिक बदलावों का सामना करना पड़ा।

अदालत ने अपने विस्तृत और सैकड़ों पन्नों के ऐतिहासिक फैसले में उन तमाम पुरातात्विक खोजों और सबूतों को पूरी तरह से स्वीकार किया है जो एएसआई के सर्वेक्षण के दौरान इस विवादित ढांचे के भीतर से प्राप्त हुए थे। सर्वेक्षण के दौरान परिसर की दीवारों, खंभों और भूमिगत तहखानों से भारी मात्रा में प्राचीन सनातन संस्कृति के प्रत्यक्ष और अकाट्य प्रतीक चिन्ह प्राप्त हुए थे। इनमें विशेष रूप से मां सरस्वती, भगवान गणेश, हनुमान जी और अन्य देवी-देवताओं की प्राचीन और खंडित मूर्तियां शामिल थीं, जो इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं कि इस स्थान पर सदियों पहले नियमित रूप से हिंदू देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना की जाती थी। इन मूर्तियों की बनावट, उनकी प्राचीनता और उन पर परमार कालीन शिल्प कला की स्पष्ट छाप ने इस कानूनी लड़ाई में हिंदू पक्ष के दावों को एक ऐसी अकाट्य मजबूती प्रदान की जिसे प्रतिवादी पक्ष चाहकर भी कानूनी कसौटी पर झुठला नहीं सका।

मूर्तियों के अलावा, इस ऐतिहासिक परिसर के पत्थरों और विशाल खंभों पर उत्कीर्ण प्राचीन श्लोक और शिलालेख भी इस न्यायिक निर्णय के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण आधार बने हैं। एएसआई के भाषाविदों और लिपि विशेषज्ञों ने इन शिलालेखों का बारीकी से अध्ययन करके यह पाया कि इन पर प्राकृत और संस्कृत भाषा में परमार कालीन राजाओं की स्तुतियां, व्याकरण के नियम और विभिन्न धार्मिक श्लोक लिखे हुए हैं। पत्थरों पर उकेरे गए ये श्लोक किसी भी मस्जिद की पारंपरिक वास्तुकला या इस्लामिक धार्मिक कला का हिस्सा कभी नहीं हो सकते, क्योंकि इस्लाम में मूर्तियों या मानवीय आकृतियों और अन्य भाषाओं के श्लोकों को धार्मिक स्थलों पर उकेरने की पूरी मनाही होती है। अदालत ने इन साहित्यिक और भाषाई साक्ष्यों को एक जीवंत दस्तावेज माना जो यह चीख-चीख कर गवाही दे रहे थे कि यह स्थान मूल रूप से एक विशाल और समृद्ध संस्कृत विद्यापीठ और मंदिर परिसर ही था।

इस पूरे पुरातात्विक साक्ष्य तंत्र में सबसे ज्वलंत और महत्वपूर्ण सबूत के रूप में उस प्राचीन हवनकुंड और यज्ञशाला के अवशेषों को माना गया है जो परिसर के मुख्य भाग के ठीक समीप खुदाई और वैज्ञानिक सफाई के दौरान पूरी तरह से साफ स्थिति में प्राप्त हुए थे। इस प्राचीन हवनकुंड की बनावट पूरी तरह से वैदिक काल के यज्ञ सिद्धांतों और वास्तु शास्त्र के नियमों के अनुसार चौकोर और विशिष्ट परतों वाली पाई गई है। इस स्थान से प्राचीन काल में हुए यज्ञों की भस्म और अन्य अवशेषों के वैज्ञानिक प्रमाण भी मिले हैं, जो यह दर्शाते हैं कि यह स्थान केवल एक प्रतीकात्मक मंदिर नहीं था, बल्कि यहाँ बड़े पैमाने पर वैदिक अनुष्ठान, हवन और धार्मिक सभाएं नियमित रूप से आयोजित होती थीं। न्यायालय ने माना कि एक ही परिसर के भीतर हवनकुंड, मूर्तियों और संस्कृत श्लोकों की सामूहिक मौजूदगी इस बात को पूरी तरह से अकाट्य बना देती है कि इस ढांचे का मूल स्वरूप और चरित्र पूरी तरह से एक हिंदू धार्मिक संस्थान का ही था।

उच्च न्यायालय के इस बड़े फैसले के बाद अब धार जिला प्रशासन और मध्य प्रदेश सरकार के सामने इस पूरे परिसर की सुरक्षा व्यवस्था को चाक-चौबंद बनाए रखने और कानून-व्यवस्था को नियंत्रित रखने की एक बहुत बड़ी प्रशासनिक जिम्मेदारी आ गई है। पूर्व के नियमों के तहत, यहाँ मंगलवार को हिंदुओं को पूजा करने और शुक्रवार को मुस्लिम पक्ष को नमाज अदा करने की अनुमति दी गई थी, जिससे अक्सर दोनों समुदायों के बीच तनाव की स्थिति बनी रहती थी। अब इस नए न्यायिक आदेश के प्रकाश में पुरातत्व विभाग और केंद्र सरकार को इस परिसर के भविष्य के उपयोग, वाग्देवी की मूल मूर्ति की पुनस्र्थापना और पर्यटकों के लिए इसके प्रबंधन को लेकर एक नई और विस्तृत नियमावली तैयार करनी होगी। स्थानीय प्रशासन ने एहतियात के तौर पर पूरे धार शहर और विशेष रूप से भोजशाला परिसर के आसपास सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम कर दिए हैं ताकि कोई भी उपद्रवी तत्व इस ऐतिहासिक फैसले का अनुचित लाभ उठाकर शांति व्यवस्था को भंग न कर सके।

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