कानपुर देहात के औद्योगिक क्षेत्र में वेतन वृद्धि को लेकर भड़का असंतोष, फैक्ट्रियों के बाहर श्रमिकों ने किया उग्र प्रदर्शन।
उत्तर प्रदेश के प्रमुख औद्योगिक जनपदों में शुमार कानपुर देहात से औद्योगिक अशांति और श्रमिक असंतोष की एक बेहद
- पांच सौ से अधिक मजदूरों ने एक साथ काम बंद कर ठप किया उत्पादन, प्रबंधन के खिलाफ नारेबाजी से गूंजा पूरा इलाका
- प्रशासनिक अधिकारियों और भारी पुलिस बल की मौजूदगी में वार्ता का दौर शुरू, सुरक्षा के लिहाज से पीएसी की टुकड़ियां तैनात
उत्तर प्रदेश के प्रमुख औद्योगिक जनपदों में शुमार कानपुर देहात से औद्योगिक अशांति और श्रमिक असंतोष की एक बेहद बड़ी खबर सामने आई है। यहाँ के एक प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र में स्थित विभिन्न विनिर्माण इकाइयों और फैक्ट्रियों में कार्यरत लगभग 500 से अधिक श्रमिकों ने अपनी मासिक सैलरी बढ़ाने और बुनियादी कामकाजी सुविधाओं में सुधार की मांग को लेकर अचानक काम पूरी तरह से बंद कर दिया। फैक्ट्रियों के भीतर काम ठप होने के बाद सभी श्रमिक संगठित होकर मुख्य द्वारों के बाहर जमा हो गए और उन्होंने मिल प्रबंधन तथा प्रशासनिक उदासीनता के खिलाफ बेहद तीखा और उग्र विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। इस बड़े हंगामे के कारण औद्योगिक क्षेत्र की मुख्य सड़कों पर आवागमन बुरी तरह प्रभावित हुआ और विनिर्माण क्षेत्र में करोड़ों रुपये के दैनिक उत्पादन का भारी नुकसान होने की आशंका गहरा गई है। घटना की संवेदनशीलता को देखते हुए स्थानीय जिला प्रशासन और पुलिस के आला अधिकारी भारी बल के साथ मौके पर पहुंच गए हैं।
इस व्यापक श्रमिक आंदोलन और तालाबंदी जैसी स्थिति की पृष्ठभूमि काफी समय से तैयार हो रही थी। औद्योगिक क्षेत्र की इन फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूरों का आरोप है कि पिछले कई वर्षों से लगातार बढ़ती जा रही कमरतोड़ महंगाई के बावजूद मिल प्रबंधन द्वारा उनके मूल वेतन और महंगाई भत्ते में किसी भी प्रकार की तर्कसंगत बढ़ोतरी नहीं की गई है। श्रमिक लंबे समय से प्रबंधन के वरिष्ठ अधिकारियों के समक्ष लिखित और मौखिक रूप से अपनी वेतन विसंगतियों को दूर करने की शांतिपूर्ण गुहार लगा रहे थे, लेकिन हर बार उन्हें केवल खोखले आश्वासनों के अलावा कुछ हासिल नहीं हुआ। अंततः धैर्य का बांध टूटने के बाद शनिवार की सुबह जैसे ही पहली शिफ्ट के मजदूर काम पर पहुंचे, उन्होंने मशीनों को चालू करने से साफ इनकार कर दिया और देखते ही देखते यह आंदोलन पूरी फैक्ट्री और आसपास की अन्य सहायक इकाइयों में भी जंगल की आग की तरह फैल गया। कानपुर और उसके आसपास के औद्योगिक क्षेत्रों में श्रम कानूनों के उल्लंघन और न्यूनतम मजदूरी दरों को लेकर अक्सर विवाद सामने आते रहते हैं। औद्योगिक विकास के दावों के बीच जब जमीनी स्तर पर काम करने वाले मजदूरों की बुनियादी आर्थिक जरूरतों की अनदेखी की जाती है, तो इस प्रकार के बड़े आंदोलन खड़े होते हैं। यह स्थिति न केवल कानून व्यवस्था के लिए चुनौती बनती है, बल्कि क्षेत्र की औद्योगिक साख और नए निवेश के माहौल को भी गंभीर रूप से प्रभावित करती है।
फैक्ट्रियों के मुख्य द्वारों के बाहर जमा हुए पांच सौ से अधिक प्रदर्शनकारी श्रमिकों का आक्रोश उस समय और ज्यादा बढ़ गया जब मिल प्रबंधन के कुछ सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें वहां से जबरन हटाने का प्रयास किया। इसके बाद मजदूरों ने एकजुटता दिखाते हुए फैक्ट्री परिसर के सामने ही धरना शुरू कर दिया और अपनी मांगों के समर्थन में गगनभेदी नारेबाजी करने लगे। श्रमिकों की मुख्य मांगों में न्यूनतम वेतन को मौजूदा बाजार दरों के अनुरूप सम्मानजनक बनाना, ओवरटाइम कार्य का नियमानुसार दोगुना भुगतान करना, भविष्य निधि और ईएसआई जैसी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को पूरी तरह से लागू करना तथा कार्यस्थल पर पीने के साफ पानी और कैंटीन जैसी बुनियादी सुविधाएं सुनिश्चित करना शामिल है। मजदूरों का साफ तौर पर कहना है कि जब तक उनकी इन जायज मांगों पर प्रबंधन कोई ठोस और लिखित समझौता नहीं करता, तब तक कोई भी श्रमिक टूल-डाउन हड़ताल खत्म कर काम पर वापस नहीं लौटेगा।
औद्योगिक क्षेत्र में इतने बड़े पैमाने पर हंगामे और कामबंदी की सूचना मिलते ही स्थानीय कोतवाली पुलिस के साथ-साथ जिला मुख्यालय से अतिरिक्त पुलिस बल और प्रांतीय आर्म्ड कांस्टेबुलरी (पीएसी) की कई टुकड़ियों को तुरंत मौके पर रवाना किया गया। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों ने स्थिति को नियंत्रण में लेने के लिए सबसे पहले प्रदर्शनकारी श्रमिकों को समझा-बुझाकर शांत करने का प्रयास किया और उन्हें आश्वस्त किया कि किसी भी परिस्थिति में कानून व्यवस्था को हाथ में नहीं लेने दिया जाएगा। सुरक्षा के लिहाज से फैक्ट्रियों के प्रशासनिक भवनों और मुख्य उत्पादन इकाइयों के आसपास कड़ा पहरा बिठा दिया गया है ताकि किसी भी प्रकार की तोड़फोड़ या अप्रिय वारदात को रोका जा सके। स्थानीय थाना प्रभारी खुद लाउडस्पीकर के माध्यम से मजदूरों से शांति बनाए रखने और अपनी बात को लोकतांत्रिक तरीके से रखने की अपील करते नजर आए।
मामले के शांतिपूर्ण और त्वरित समाधान के लिए जिला श्रम विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों और उपजिलाधिकारी की अगुवाई में एक त्रिपक्षीय वार्ता का दौर फैक्ट्री के मुख्य प्रशासनिक ब्लॉक के भीतर शुरू किया गया है। इस वार्ता में प्रदर्शनकारी श्रमिकों के पांच प्रतिनिधि सदस्यों को शामिल किया गया है जो मिल प्रबंधन के शीर्ष अधिकारियों और निदेशकों के सामने मजदूरों का पक्ष मजबूती से रख रहे हैं। प्रशासनिक अधिकारी इस बात का प्रयास कर रहे हैं कि दोनों पक्षों के बीच एक बीच का रास्ता निकाला जा सके ताकि श्रमिकों की आर्थिक चिंताओं का भी समाधान हो और फैक्ट्रियों में ठप पड़ा उत्पादन भी जल्द से जल्द दोबारा शुरू किया जा सके। हालांकि, मिल प्रबंधन का तर्क है कि वैश्विक मंदी और कच्चे माल की बढ़ती कीमतों के कारण इस समय अचानक वेतन में बहुत बड़ी वृद्धि करना उनके लिए वित्तीय रूप से व्यवहार्य नहीं होगा।
इस अचानक हुई कामबंदी के कारण संबंधित फैक्ट्रियों को भारी व्यावसायिक नुकसान उठाना पड़ रहा है, क्योंकि इन इकाइयों में तैयार होने वाला माल देश के विभिन्न हिस्सों के साथ-साथ विदेशों में भी निर्यात किया जाता है। आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) बाधित होने के कारण कई बड़े ऑर्डर्स के रद्द होने का खतरा भी मंडराने लगा है, जिससे फैक्ट्री मालिकों की चिंताएं काफी बढ़ गई हैं। स्थानीय व्यापार मंडल और औद्योगिक एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने भी इस स्थिति पर अपनी गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि इस तरह के गतिरोध से पूरे जिले के औद्योगिक विकास की रफ्तार धीमी पड़ जाती है। वे भी अपनी तरफ से मध्यस्थता करने और इस विवाद को जल्द से जल्द सुलझाने के प्रयासों में जुटे हुए हैं ताकि आर्थिक पहिया दोबारा घूम सके।
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