इजरायल के मुद्दे पर पाकिस्तान को लश्कर-ए-तैयबा की खुली धमकी, स्वीकार करने पर दी पूरी तरह तबाह करने की चेतावनी
आतंकी कमांडर ने रैली में उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए अत्यधिक भड़काऊ और भावनात्मक रूप से संवेदनशील मुद्दों का सहारा लिया। उसने फिलिस्तीन संघर्ष, जिहाद और शहादत जैसे विषयों को उठाकर अपने समर्थकों में धार्मिक उन्माद फैलाने की कोशिश की। उसने दावा किया कि दुनिया की कोई भी महाशक्ति मुस्लिम राष्ट्रों को इजरायल को सं
- अमेरिकी प्रस्ताव के समर्थन की सोच पर भड़का आतंकी संगठन, शीर्ष नेतृत्व और सैन्य अधिकारियों की हत्या करने का दिया अल्टीमेटम
- वैश्विक दबाव और कूटनीतिक संकट के बीच पाकिस्तान के आंतरिक सुरक्षा तंत्र में खलबली, कट्टरपंथियों ने खोला मोर्चा
पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा और विदेश नीति को लेकर एक बेहद गंभीर और चौंकाने वाला मामला सामने आया है। आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के उप प्रमुख सैफुल्लाह कसुरी ने एक सार्वजनिक रैली में अपनी ही सरकार और सैन्य नेतृत्व को सीधे तौर पर बेहद भयानक परिणाम भुगतने की धमकी दी है। यह पूरा विवाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस हालिया प्रस्ताव के बाद गहराया है जिसमें उन्होंने पाकिस्तान सहित कई मुस्लिम बहुल देशों से इजरायल के साथ राजनयिक संबंध सामान्य करने और अब्राहम समझौते में शामिल होने की अपील की है। अमेरिकी प्रशासन के इस कदम के बाद पाकिस्तान के भीतर सक्रिय चरमपंथी और कट्टरपंथी संगठनों ने अपनी ही सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है, जिससे देश के शीर्ष राजनेताओं और सुरक्षा बलों के अधिकारियों के लिए एक नया संकट पैदा हो गया है।
ईद-उल-अजहा के अवसर पर आयोजित एक बड़ी जनसभा को संबोधित करते हुए लश्कर-ए-तैयबा के इस शीर्ष कमांडर ने सीधे तौर पर देश के प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख का नाम लिए बिना बेहद आक्रामक लहजे में चेतावनी दी। आतंकी सैफुल्लाह कसुरी ने कहा कि यदि पाकिस्तान की अग्रिम पंक्ति के नेतृत्व या किसी भी शीर्ष सैन्य अधिकारी ने अमेरिका के दबाव में आकर इजरायल को मान्यता देने या उसके साथ किसी भी तरह का गुप्त समझौता करने की बात दिमाग में भी लाई, तो उसे पूरी तरह से खत्म कर दिया जाएगा। उसने खुलेआम कहा कि ऐसा करने वाले किसी भी नेता या अधिकारी की हत्या कर दी जाएगी और उसे पूरी तरह से बर्बाद और नेस्तनाबूद कर दिया जाएगा। इस तरह की खुली और हिंसक धमकी के बाद पाकिस्तान के प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया है, क्योंकि यह देश के सबसे शक्तिशाली संस्थानों को दी गई एक सीधी चुनौती है।
आतंकी कमांडर ने रैली में उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए अत्यधिक भड़काऊ और भावनात्मक रूप से संवेदनशील मुद्दों का सहारा लिया। उसने फिलिस्तीन संघर्ष, जिहाद और शहादत जैसे विषयों को उठाकर अपने समर्थकों में धार्मिक उन्माद फैलाने की कोशिश की। उसने दावा किया कि दुनिया की कोई भी महाशक्ति मुस्लिम राष्ट्रों को इजरायल को संप्रभु राज्य के रूप में स्वीकार करने के लिए मजबूर नहीं कर सकती है। कसुरी ने यह भी कहा कि इजरायल के साथ शत्रुता की यह भावना हमेशा जारी रहेगी और इसे किसी भी राजनीतिक समझौते या कूटनीतिक बातचीत के जरिए बदला नहीं जा सकता। इस बयान ने यह साफ कर दिया है कि चरमपंथी ताकतें पाकिस्तान की विदेश नीति पर किस तरह अपना नियंत्रण बनाए रखने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। सुरक्षा मामलों से जुड़े कुछ विश्लेषक इस पूरी घटना को एक अलग नजरिए से भी देख रहे हैं। ऐसी संभावनाएं जताई जा रही हैं कि लश्कर जैसे संगठनों द्वारा दी जा रही यह खुली धमकी पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व की एक सोची-समझी चाल भी हो सकती है। इसका उपयोग करके पाकिस्तानी सेना अमेरिकी प्रशासन को यह दिखा सकती है कि देश के भीतर कट्टरपंथियों का दबाव इतना अधिक है कि उनके लिए इजरायल के साथ संबंधों को सामान्य करना आंतरिक रूप से आत्मघाती साबित हो सकता है।
इस पूरे विवाद के बीच आतंकी कमांडर ने पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच बढ़ते रक्षा सहयोग का भी विशेष रूप से उल्लेख किया। उसने दावा किया कि पाकिस्तान की सैन्य क्षमताएं और रणनीतिक पहुंच अब इतनी मजबूत हो चुकी हैं कि वे इस क्षेत्र में इजरायल के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला आसानी से कर सकती हैं। उसने इस सैन्य और रक्षा समझौते को पूरी मुस्लिम उम्माह यानी वैश्विक मुस्लिम समुदाय के लिए एक बड़ी शुरुआत बताया। कसुरी ने अपने भाषण में जोर देकर कहा कि यह रक्षात्मक मजबूती किसी एक शासक, राजनेता या सरकारी योजना का परिणाम नहीं है, बल्कि यह उन लाखों लोगों के बलिदान का नतीजा है जिन्होंने अपनी जान कुर्बान की है। इस तरह के तर्कों के जरिए वह जनता के बीच सरकार विरोधी और सेना विरोधी भावनाओं को हवा देने का प्रयास कर रहा था।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा अब्राहम समझौते को आगे बढ़ाने के लिए पाकिस्तान पर जो कूटनीतिक दबाव बनाया जा रहा है, वह इस्लामाबाद के लिए एक बेहद पेचीदा मामला बन चुका है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने पहले ही इस प्रस्ताव को खारिज करते हुए कहा था कि उनका देश अपनी बुनियादी विचारधाराओं के खिलाफ जाकर कभी भी ऐसा कोई समझौता स्वीकार नहीं करेगा। पाकिस्तान का आधिकारिक रुख हमेशा से यही रहा है कि जब तक फिलिस्तीन के मुद्दे का कोई न्यायसंगत और स्थाई समाधान नहीं मिल जाता, जिसमें 1967 से पहले की सीमाओं के साथ एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना शामिल हो, तब तक वे इजरायल को एक स्वतंत्र देश के रूप में कभी मान्यता नहीं देंगे। इस नीतिगत प्रतिबद्धता के बावजूद चरमपंथी संगठनों को डर है कि पर्दे के पीछे कोई बड़ी डील हो सकती है।
इस पूरे घटनाक्रम ने पाकिस्तान के लिए अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी मुश्किलें बढ़ा दी हैं। एक तरफ जहां पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे क्षेत्रीय संघर्ष में एक मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ उसके अपने ही घर में पल रहे सांप उसके नियंत्रण से बाहर होते दिख रहे हैं। वैश्विक बिरादरी में अपनी छवि सुधारने और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों से आर्थिक मदद पाने के लिए छटपटा रहा पाकिस्तान एक बार फिर आतंकवाद और कट्टरपंथ के जाल में बुरी तरह फंसता हुआ नजर आ रहा है। अगर सरकार इन आतंकियों के खिलाफ कोई सख्त कदम उठाती है तो उसे देश के भीतर बड़े पैमाने पर हिंसक विरोध प्रदर्शनों और राजनीतिक अस्थिरता का सामना करना पड़ सकता है, और यदि वह चुप रहती है तो वैश्विक स्तर पर उस पर आतंकवाद को पनाह देने के आरोप और मजबूत होंगे।
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