मुझे बस मुंबई वाला फ्लैट और 12 करोड़ रुपये का गुजारा भत्ता चाहिए, 18 महीने की शादी के बाद 12 करोड़ की मांग पर SC की तल्ख़ टिप्पणी। 

Maharashtra News: महाराष्ट्र की एक महिला ने अपनी 18 महीने की शादी के बाद सुप्रीम कोर्ट में एक करोड़ रुपये मासिक गुजारा भत्ता और मुंबई में एक फ्लैट...

Jul 23, 2025 - 11:20
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मुझे बस मुंबई वाला फ्लैट और 12 करोड़ रुपये का गुजारा भत्ता चाहिए, 18 महीने की शादी के बाद 12 करोड़ की मांग पर SC की तल्ख़ टिप्पणी। 
मुझे बस मुंबई वाला फ्लैट और 12 करोड़ रुपये का गुजारा भत्ता चाहिए, 18 महीने की शादी के बाद 12 करोड़ की मांग पर SC की तल्ख़ टिप्पणी। 

महाराष्ट्र की एक महिला ने अपनी 18 महीने की शादी के बाद सुप्रीम कोर्ट में एक करोड़ रुपये मासिक गुजारा भत्ता और मुंबई में एक फ्लैट की मांग की, जिसने न केवल अदालत को हैरान किया, बल्कि देश भर में इस मामले की चर्चा को जन्म दिया। यह हाई-प्रोफाइल तलाक का मामला सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने आया। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने महिला की शिक्षा और रोजगार क्षमता पर सवाल उठाए, जबकि पति के वकील ने उनकी मांगों को अत्यधिक और अव्यावहारिक बताया। इस मामले में दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।

यह मामला एक दंपति के बीच वैवाहिक विवाद से जुड़ा है, जिनकी शादी मात्र 18 महीने चली। महिला, जो एक आईटी प्रोफेशनल और एमबीए डिग्री धारक है, ने सुप्रीम कोर्ट में गुजारा भत्ते की मांग के साथ याचिका दायर की। उनकी मांगों में मुंबई के कल्पतरु कॉम्प्लेक्स में एक बिना किसी कर्ज वाला फ्लैट, 12 करोड़ रुपये का एकमुश्त गुजारा भत्ता, और एक बीएमडब्ल्यू कार शामिल थी। महिला ने अपनी मांगों को इस आधार पर सही ठहराया कि उनका पति बहुत अमीर है और उनकी आर्थिक स्थिति ऐसी मांगों को पूरा करने में सक्षम है। दूसरी ओर, पति ने दावा किया कि महिला ने उनकी मानसिक स्थिति को लेकर गलत आरोप लगाए और उनकी शादी को शून्य घोषित करने की मांग की। पति ने यह भी कहा कि महिला ने पहले आपसी सहमति से तलाक के लिए समझौता किया था, जिसमें एक फ्लैट देने की बात तय हुई थी, लेकिन अब वह इससे पीछे हट रही है।

सुनवाई के दौरान महिला ने स्वयं अपनी पैरवी की और कोर्ट से कहा, “मुझे बस मुंबई वाला फ्लैट और 12 करोड़ रुपये का गुजारा भत्ता चाहिए।” इस पर मुख्य न्यायाधीश गवई ने हैरानी जताते हुए पूछा, “आपकी शादी सिर्फ 18 महीने चली और आप हर महीने एक करोड़ रुपये और एक बीएमडब्ल्यू कार चाहती हैं?” कोर्ट ने महिला की उच्च शिक्षा और पेशेवर योग्यता पर ध्यान देते हुए उनसे आत्मनिर्भर होने की सलाह दी।

  • कोर्ट की टिप्पणियां और दलीलें

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में मुख्य न्यायाधीश गवई ने महिला की मांगों को अव्यावहारिक और अतिशयोक्तिपूर्ण बताया। उन्होंने कहा, “आप एक आईटी विशेषज्ञ हैं और आपने एमबीए किया है। बेंगलुरु, हैदराबाद जैसे शहरों में आप जैसे प्रोफेशनल्स की बहुत मांग है। आप काम क्यों नहीं करतीं?” कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि एक पढ़ी-लिखी महिला को पति के गुजारा भत्ते पर निर्भर रहने के बजाय खुद कमाने की कोशिश करनी चाहिए। मुख्य न्यायाधीश ने महिला को दो विकल्प दिए: या तो बिना किसी कर्ज वाला फ्लैट स्वीकार करें या 4 करोड़ रुपये की एकमुश्त राशि लेकर नौकरी तलाशें।

महिला ने अपनी दलील में कहा कि उनके पति ने उनकी नौकरी छुड़वाने में भूमिका निभाई और उनके खिलाफ एक एफआईआर दर्ज कराई, जिसके कारण उन्हें नौकरी मिलने में दिक्कत हो सकती है। इस पर कोर्ट ने आश्वासन दिया कि वे एफआईआर को रद्द करने का आदेश दे सकते हैं ताकि महिला की नौकरी की संभावनाएं प्रभावित न हों। मुख्य न्यायाधीश ने यह भी स्पष्ट किया कि महिला अपने पति के पिता की संपत्ति पर दावा नहीं कर सकती।

पति की ओर से वरिष्ठ वकील माधवी दीवान ने दलील दी कि महिला की मांगें अत्यधिक हैं। उन्होंने बताया कि पति की 2015-16 की वार्षिक आय 2.5 करोड़ रुपये थी, जिसमें 1 करोड़ रुपये का बोनस शामिल था। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि महिला के पास पहले से ही एक फ्लैट और दो कार पार्किंग स्थान हैं, जिनसे वह आय अर्जित कर सकती है। बीएमडब्ल्यू कार की मांग पर दीवान ने तंज कसते हुए कहा कि वह कार 10 साल पुरानी है और अब कबाड़ हो चुकी है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि महिला ने आपसी सहमति के समझौते का उल्लंघन किया और कानून का दुरुपयोग कर रही है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में आत्मनिर्भरता और लैंगिक समानता पर जोर दिया। मुख्य न्यायाधीश गवई ने कहा, “आप इतनी पढ़ी-लिखी हैं। आपको खुद के लिए मांगना नहीं चाहिए, बल्कि खुद कमाकर खाना चाहिए।” कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि गुजारा भत्ता पति को दंडित करने का साधन नहीं होना चाहिए, बल्कि इसका उद्देश्य पत्नी के लिए सम्मानजनक जीवन स्तर सुनिश्चित करना है। यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट के पहले के दिशानिर्देशों, जैसे ‘रजनीश बनाम नेहा’ (2020) मामले, के अनुरूप है, जिसमें गुजारा भत्ता तय करने के लिए आठ पैमाने निर्धारित किए गए थे। इनमें पति-पत्नी की सामाजिक-आर्थिक स्थिति, आय, रोजगार, और बच्चों की जरूरतें शामिल हैं।

इसके अलावा, दिल्ली हाई कोर्ट के मार्च 2025 के एक फैसले का भी जिक्र हुआ, जिसमें कहा गया था कि कानून आलस्य को बढ़ावा नहीं देता। कोर्ट ने यह रुख अपनाया कि पढ़ी-लिखी और सक्षम महिलाओं को गुजारा भत्ते पर निर्भर रहने के बजाय अपनी आजीविका कमानी चाहिए। इस मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने इसी तरह की सोच को दोहराया।

यह मामला न केवल कानूनी दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक रूप से भी कई सवाल खड़े करता है। गुजारा भत्ते की मांग को लेकर समाज में अक्सर यह धारणा बनती है कि कुछ लोग इसे पति की संपत्ति हड़पने के साधन के रूप में इस्तेमाल करते हैं। इस मामले में कोर्ट की टिप्पणियां इस धारणा को मजबूत करती हैं कि पढ़ी-लिखी और सक्षम महिलाओं को आत्मनिर्भर होना चाहिए। साथ ही, यह मामला लैंगिक समानता और आर्थिक स्वतंत्रता के महत्व को रेखांकित करता है।

हालांकि, महिला के दावे को पूरी तरह खारिज नहीं किया गया। कोर्ट ने उनके सामने विकल्प रखे, जैसे एक फ्लैट या 4 करोड़ रुपये की राशि, जो उनके भविष्य को सुरक्षित करने के लिए पर्याप्त हो सकता है। इसके साथ ही, कोर्ट ने दोनों पक्षों के बीच आपराधिक कार्यवाहियों को रोकने का निर्देश देने की बात कही ताकि मामला और जटिल न हो।

  • अन्य समान मामले

सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट्स में गुजारा भत्ते से जुड़े कई मामले हाल के वर्षों में चर्चा में रहे हैं। उदाहरण के लिए:

दिसंबर 2024: सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में पति को अपनी पत्नी को 5 करोड़ रुपये का एकमुश्त गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया, साथ ही बच्चे के भरण-पोषण के लिए 1 करोड़ रुपये का प्रावधान करने को कहा।

दिसंबर 2024: सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि गुजारा भत्ता पति की वर्तमान आर्थिक स्थिति के आधार पर तय किया जाना चाहिए, न कि उसकी संपत्ति की बराबरी के लिए।

मार्च 2025: दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि पढ़ी-लिखी और सक्षम महिलाओं को गुजारा भत्ते पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।

ये मामले दर्शाते हैं कि अदालतें अब गुजारा भत्ते को लेकर अधिक संतुलित और तर्कसंगत दृष्टिकोण अपना रही हैं।

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