मौत का तांडव: दो शहरों में लगी भीषण आग ने छीनीं 17 जिंदगियां, 6 मासूमों की भी मौत।
देश के दो अलग-अलग कोनों में हुए भीषण अग्निकांडों ने एक बार फिर सुरक्षा मानकों और आपातकालीन सेवाओं की तत्परता पर बड़े सवाल खड़े कर
- शॉर्ट सर्किट और सिस्टम की सुस्ती का घातक मेल: अग्नि त्रासदियों ने फिर झकझोरा देश
- धधकती लपटों के बीच दमकल की देरी पड़ी भारी: राख के ढेर में तब्दील हुए आशियाने और सपने
देश के दो अलग-अलग कोनों में हुए भीषण अग्निकांडों ने एक बार फिर सुरक्षा मानकों और आपातकालीन सेवाओं की तत्परता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। इन दो दर्दनाक घटनाओं में कुल 17 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी, जिनमें छह मासूम बच्चे भी शामिल थे जो अपनी पूरी जिंदगी देखने से पहले ही आग की भेंट चढ़ गए। प्राथमिक जांच और चश्मदीदों के बयानों से जो जानकारी निकलकर सामने आ रही है, उसके अनुसार इन हादसों का मुख्य कारण बिजली का शॉर्ट सर्किट बताया जा रहा है। हालांकि, मौतों का आंकड़ा बढ़ने के पीछे केवल आग ही जिम्मेदार नहीं थी, बल्कि दमकल विभाग की कथित देरी और संसाधनों की कमी ने भी जलते हुए लोगों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। इन घटनाओं ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि घनी आबादी वाले इलाकों में अग्नि सुरक्षा के इंतजाम आज भी भगवान भरोसे ही चल रहे हैं। पहली घटना एक रिहाइशी इलाके में स्थित बहुमंजिला इमारत की है, जहां रात के सन्नाटे में अचानक आग की लपटें उठने लगीं। लोग जब तक कुछ समझ पाते, जहरीले धुएं ने पूरी बिल्डिंग को अपनी चपेट में ले लिया था। बताया जा रहा है कि बिजली के मुख्य बोर्ड में हुए शॉर्ट सर्किट के कारण निकली चिंगारी ने पास में रखे ज्वलनशील सामान को पकड़ लिया और देखते ही देखते पूरी सीढ़ी आग का दरिया बन गई। इसके चलते ऊपर की मंजिलों पर सो रहे लोगों के पास बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं बचा। खिड़कियों से उठती मदद की पुकारें और चीखें आसपास के लोगों को झकझोर रही थीं, लेकिन बिना सुरक्षा उपकरणों के किसी के लिए भी अंदर दाखिल होना संभव नहीं था। इस भयावह मंजर ने स्थानीय प्रशासन की उस तैयारी की पोल खोल दी, जिसका दावा अक्सर कागजों पर किया जाता है।
दूसरी घटना एक व्यवसायिक सह रिहाइशी परिसर की है, जहां सुरक्षा मानकों की अनदेखी भारी पड़ गई। यहां एक साथ कई परिवार रहते थे और नीचे की दुकानों में बिजली का लोड क्षमता से अधिक था। शुरुआती जांच में यह पाया गया कि पुरानी वायरिंग और खराब रखरखाव की वजह से शॉर्ट सर्किट हुआ, जिसने तेजी से फैलते हुए ऊपर के कमरों को अपनी गिरफ्त में ले लिया। इस हादसे में सबसे ज्यादा नुकसान बच्चों को हुआ, जो गहरी नींद में होने के कारण समय पर उठ नहीं पाए और दम घुटने से उनकी मौत हो गई। घटनास्थल पर मौजूद लोगों का आरोप है कि दमकल की गाड़ियां समय पर नहीं पहुंचीं और जब आईं तो उनके पास संकरी गलियों में अंदर जाने के लिए पर्याप्त पाइप या उपकरण नहीं थे। विशेषज्ञों का कहना है कि 80% से अधिक अग्निकांडों की जड़ में बिजली की खराब वायरिंग होती है। ओवरलोडिंग और घटिया गुणवत्ता वाले तार गर्मी पाकर पिघल जाते हैं, जिससे आग लग जाती है। रिहाइशी इलाकों में नियमित फायर ऑडिट का न होना इन हादसों को आमंत्रण देता है। हादसे के बाद राहत और बचाव कार्य की जो तस्वीरें सामने आईं, वे विचलित करने वाली थीं। मलबे से निकाले गए शवों की हालत देखकर बचाव दल के कर्मियों की भी आंखें नम हो गईं। मृतकों में शामिल छह बच्चों की शिनाख्त करना परिजनों के लिए सबसे मुश्किल घड़ी थी। प्रशासन ने मुआवजे का ऐलान तो कर दिया है, लेकिन उन माता-पिता के आंसू पोंछना नामुमकिन है जिन्होंने अपनी आंखों के सामने अपने नौनिहालों को आग में झुलसते देखा। अस्पतालों में भर्ती घायलों की स्थिति भी नाजुक बनी हुई है, जिनमें से कई लोग 60% से अधिक जल चुके हैं। इन हादसों ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर कब तक हम व्यवस्थागत खामियों की कीमत इंसानी जानों से चुकाते रहेंगे।
दमकल विभाग की भूमिका को लेकर भी जनता में भारी आक्रोश देखने को मिल रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि सूचना देने के काफी देर बाद फायर टेंडर मौके पर पहुंचे। इसके अलावा, अग्नि शमन दल के पास आधुनिक सीढ़ियों और ऑक्सीजन मास्क की कमी भी खली, जिसके कारण रेस्क्यू ऑपरेशन में काफी समय लग गया। दमकल विभाग का अपना तर्क है कि संकरी गलियों और अवैध निर्माण की वजह से गाड़ियों को घटनास्थल तक ले जाने में काफी मशक्कत करनी पड़ी। लेकिन यह सवाल अनुत्तरित ही रह गया कि जब प्रशासन को पता है कि शहर की गलियां संकरी हैं, तो छोटे फायर टेंडर या बाइक एंबुलेंस जैसी सुविधाएं पहले से तैनात क्यों नहीं की गईं? यह सुस्ती और तालमेल की कमी ही थी जिसने मौत के आंकड़े को दहाई के पार पहुंचा दिया। इन दोनों अग्निकांडों के बाद अब पुलिस और संबंधित विभाग अपनी औपचारिक जांच में जुट गए हैं। कई जगहों पर अवैध रूप से चल रही फैक्ट्रियों और गोदामों को सील करने की कार्रवाई शुरू की गई है, लेकिन यह सब 'सांप निकल जाने के बाद लकीर पीटने' जैसा प्रतीत होता है। यदि समय रहते इन इमारतों का फायर एनओसी (NOC) चेक किया गया होता और बिजली विभाग ने लोड की नियमित जांच की होती, तो शायद आज ये 17 लोग हमारे बीच होते। जांच समितियों का गठन कर दिया गया है, जो अपनी रिपोर्ट सौंपेंगी, लेकिन अक्सर देखा गया है कि ऐसी रिपोर्टें फाइलों में दबकर रह जाती हैं और अगली किसी बड़ी दुर्घटना का इंतजार होने लगता है।
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