खेती का अभिशाप- 1262 किलो प्याज बेचने के बाद किसान की जेब में आए शून्य रुपये, उल्टा देना पड़ा एक रुपया
इस मामले की तकनीकी बारीकियों को देखें तो यह कृषि विपणन प्रणाली की विफलता को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। किसान प्रकाश गलंदर ने जब अपना प्याज व्यापारी को सौंपा, तो उस पर हमाली (मजदूरी), तुलाई (वजन करने का शुल्क), भराई
- मेहनत की मिट्टी में मिली कीमत, छत्रपति संभाजीनगर में ढाई लाख की लागत लगाने वाले किसान को मंडी ने थमाया कर्ज का बिल
- अन्नदाता की बेबसी का चरम: प्याज की फसल बेचने पर नहीं निकले भाड़े के पैसे, कृषि विभाग ने शुरू की पंचनामे की कार्यवाही
महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर जिले से कृषि संकट और किसानों की बदहाली की एक ऐसी हृदयविदारक घटना सामने आई है, जिसने पूरी कृषि व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां के एक किसान प्रकाश गलंदर ने महीनों की हाड़-तोड़ मेहनत के बाद अपनी प्याज की फसल तैयार की थी, लेकिन जब वे उसे बेचने मंडी पहुँचे, तो उन्हें जो मिला वह किसी सदमे से कम नहीं था। किसान ने मंडी में कुल 1 टन 2 क्विंटल और 62 किलो (कुल 1262 किलो) प्याज की बिक्री की। पूरी फसल बेचने के बाद मंडी की रसीद के अनुसार कुल बिक्री मूल्य 1,262 रुपये बना। हालांकि, इस मामूली रकम से किसान के घर की खुशियां लौटने के बजाय उसे एक नई मुसीबत का सामना करना पड़ा। मंडी के विभिन्न खर्चों को घटाने के बाद किसान की कमाई शून्य रही और उसे अपनी जेब से 1 रुपया अतिरिक्त देना पड़ा।
इस मामले की तकनीकी बारीकियों को देखें तो यह कृषि विपणन प्रणाली की विफलता को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। किसान प्रकाश गलंदर ने जब अपना प्याज व्यापारी को सौंपा, तो उस पर हमाली (मजदूरी), तुलाई (वजन करने का शुल्क), भराई और सबसे महत्वपूर्ण 'भाड़ा' (परिवहन खर्च) के शुल्क लगाए गए। इन सभी मंडी खर्चों का कुल योग 1,263 रुपये निकलकर आया। चूंकि प्याज की कुल बिक्री से केवल 1,262 रुपये प्राप्त हुए थे, इसलिए गणितीय रूप से किसान को अपनी मेहनत का फल मिलने के बजाय मंडी प्रशासन को ही 1 रुपया चुकाना पड़ा। यह स्थिति उस किसान के लिए मानसिक और आर्थिक रूप से अत्यंत पीड़ादायक साबित हुई, जिसने अपनी उपज से कर्ज चुकाने और परिवार की जरूरतों को पूरा करने का सपना देखा था।
प्रकाश गलंदर ने अपनी चार एकड़ जमीन पर प्याज की बुवाई की थी। इस खेती के दौरान उन्होंने बीज, खाद, कीटनाशक, जुताई और सिंचाई जैसे महत्वपूर्ण कार्यों पर करीब ढाई से तीन लाख रुपये की भारी-भरकम राशि खर्च की थी। प्याज की फसल को तैयार करने में न केवल पैसा लगता है, बल्कि इसमें पूरे परिवार का श्रम भी शामिल होता है। इतनी बड़ी लागत लगाने के बाद जब बाजार में प्याज के दाम कौड़ियों के भाव रह गए, तो किसान की आर्थिक कमर पूरी तरह टूट गई। ढाई लाख रुपये निवेश करने के बाद जब प्रतिफल के रूप में कर्ज का बोझ और एक रुपये का बकाया हाथ आया, तो यह घटना पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बन गई और किसानों के आक्रोश का कारण बनी। कृषि लागत और बाजार मूल्य के बीच का यह अंतर इतना गहरा है कि किसान अब खेती को घाटे का सौदा मानने लगे हैं। प्रकाश गलंदर जैसे हजारों किसान हर साल इस उम्मीद में बुवाई करते हैं कि बाजार में सही दाम मिलेंगे, लेकिन बिचौलियों और मंडी के भारी-भरकम शुल्कों के जाल में उनकी मेहनत स्वाहा हो जाती है।
मामला जैसे ही सार्वजनिक हुआ और स्थानीय स्तर पर विरोध प्रदर्शन शुरू हुए, प्रशासन हरकत में आया। कृषि विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों और कर्मचारियों की एक टीम ने तत्काल किसान प्रकाश गलंदर के घर और उनके खेत का दौरा किया। विभाग द्वारा वहां 'पंचनामा' करने की कार्यवाही शुरू की गई है, ताकि नुकसान का सटीक आकलन किया जा सके और रिपोर्ट शासन को भेजी जा सके। प्रशासन का यह कदम भले ही पीड़ित किसान के जख्मों पर मरहम लगाने की कोशिश हो, लेकिन यह उस बुनियादी समस्या का समाधान नहीं है जो बार-बार महाराष्ट्र के प्याज उत्पादक किसानों के सामने आती है। पंचनामे के माध्यम से यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है कि किसान को सरकारी सहायता या किसी विशेष फंड से राहत दी जा सके।
प्याज की कीमतों में होने वाली यह भारी गिरावट अक्सर आपूर्ति और मांग के असंतुलन के कारण होती है, लेकिन इसका खामियाजा हमेशा उत्पादक किसान को ही भुगतना पड़ता है। छत्रपति संभाजीनगर और नासिक जैसे जिलों में प्याज प्रमुख नकदी फसल है, जिस पर लाखों परिवारों का गुजारा टिका है। जब थोक बाजारों में प्याज के दाम गिरते हैं, तो सरकार अक्सर निर्यात शुल्क या अन्य व्यापारिक प्रतिबंधों का सहारा लेती है, जिसका सीधा असर किसान की जेब पर पड़ता है। प्रकाश गलंदर के मामले ने यह भी दिखाया है कि मंडी शुल्क की दरें कई बार उपज की कीमत से भी अधिक हो जाती हैं, जिससे किसान के पास घर लौटने के लिए बस किराया तक नहीं बचता।
इस घटना के बाद किसान संगठनों ने सरकार से प्याज के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) या एक निश्चित 'फ्लोर प्राइस' तय करने की मांग तेज कर दी है। किसानों का तर्क है कि यदि लागत मूल्य और मंडी खर्च को मिलाकर एक न्यूनतम दाम सुनिश्चित नहीं किया गया, तो कृषि क्षेत्र से युवाओं का मोह पूरी तरह भंग हो जाएगा। प्रकाश गलंदर की रसीद, जिसमें उन्हें 1 रुपया बकाया देने को कहा गया, अब सोशल मीडिया पर कृषि संकट के एक वैश्विक प्रतीक के रूप में साझा की जा रही है। यह रसीद बताती है कि कैसे एक अन्नदाता अपनी ही जमीन पर उगाई गई फसल के बोझ तले दब जाता है।
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