'फुलस्टॉप नहीं, केवल कॉमा होता है', राज्यसभा से विदा हो रहे 59 सांसदों पर पीएम मोदी का प्रेरक संबोधन।
संसद के उच्च सदन यानी राज्यसभा में 59 सांसदों के कार्यकाल की समाप्ति पर आयोजित विदाई समारोह के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक
- राजनीति का सफर कभी खत्म नहीं होता: सार्वजनिक जीवन में निरंतरता का मंत्र देकर प्रधानमंत्री ने बढ़ाया जोश
- संसद के उच्च सदन में विदाई की बेला: प्रधानमंत्री ने सांसदों के अनुभव को बताया राष्ट्र की अनमोल विरासत
संसद के उच्च सदन यानी राज्यसभा में 59 सांसदों के कार्यकाल की समाप्ति पर आयोजित विदाई समारोह के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक अत्यंत मार्मिक और प्रेरणादायक संबोधन दिया। उन्होंने सदन को संबोधित करते हुए स्पष्ट किया कि सार्वजनिक जीवन और विशेषकर राजनीति में कभी भी 'फुलस्टॉप' या पूर्णविराम नहीं आता है। प्रधानमंत्री के अनुसार, एक सांसद का कार्यकाल समाप्त होना केवल एक औपचारिक बदलाव है, लेकिन जनसेवा की उनकी यात्रा निरंतर चलती रहती है। उन्होंने विदा हो रहे सदस्यों के योगदान की सराहना करते हुए कहा कि सदन से बाहर जाने का अर्थ यह कतई नहीं है कि उनकी भूमिका समाप्त हो गई है। उनके पास जो वर्षों का अनुभव है, वह समाज और देश के लिए एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाता रहेगा। प्रधानमंत्री ने सांसदों के विदाई के इस क्षण को भावुकता के बजाय भविष्य की नई संभावनाओं के रूप में प्रस्तुत किया।
उच्च सदन के भीतर सांसदों के योगदान पर चर्चा करते हुए प्रधानमंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि राज्यसभा एक निरंतर चलने वाला सदन है, जो कभी भंग नहीं होता। इसी प्रकार, राजनीति में सक्रिय रहने वाले व्यक्ति का संकल्प भी कभी भंग नहीं होना चाहिए। प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में इस बात को विशेष रूप से स्पष्ट किया कि जो सदस्य सदन से विदा ले रहे हैं, उनके पास विभिन्न क्षेत्रों का व्यापक अनुभव है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि सदन के भीतर चर्चाओं, बहसों और विधायी कार्यों के दौरान इन सांसदों ने जो परिपक्वता दिखाई है, वह आने वाले नए सांसदों के लिए एक उदाहरण है। प्रधानमंत्री ने विदा हो रहे सांसदों से आग्रह किया कि वे अपने इस अनुभव को केवल अपने तक सीमित न रखें, बल्कि इसे देश के अलग-अलग कोनों में जाकर जनता के साथ साझा करें।
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन के दौरान सांसदों के साथ बिताए गए समय को याद करते हुए कहा कि सदन की दीवारें उनके विचारों और तर्कों की गवाह रही हैं। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की खूबसूरती इसी में है कि विचार अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन देश के विकास का लक्ष्य एक ही होता है। प्रधानमंत्री ने सदन से विदा होने वाले सदस्यों को 'अनुभव का खजाना' बताया और कहा कि एक परिपक्व लोकतंत्र में अनुभव का कोई विकल्प नहीं होता। उन्होंने सांसदों को प्रोत्साहित करते हुए कहा कि अब वे सीधे तौर पर जनता के बीच जाकर अपने अनुभवों के आधार पर बदलाव ला सकते हैं। प्रधानमंत्री के अनुसार, सदन की चारदीवारी से बाहर निकलकर जन-आंदोलन और सामाजिक कार्यों में जुड़ना भी राष्ट्र निर्माण का ही एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
- अनुभव का मूल्य और लोकतंत्र की शक्ति
संसदीय लोकतंत्र में अनुभव एक ऐसी शक्ति है जो कठिन से कठिन कानून निर्माण की प्रक्रिया को सरल बना देती है। विदा हो रहे सांसदों ने कई ऐतिहासिक फैसलों और सुधारों में अपनी सक्रिय सहभागिता निभाई है। प्रधानमंत्री ने सदन के रिकॉर्ड में दर्ज उनकी बातों को भावी पीढ़ियों के लिए एक संदर्भ ग्रंथ की तरह बताया, जो संसदीय परंपराओं को समझने में मदद करेगा। सदन में विदाई की इस घड़ी को प्रधानमंत्री ने एक नए अध्याय की शुरुआत बताया। उन्होंने कहा कि अक्सर लोग रिटायरमेंट को अंत मान लेते हैं, लेकिन एक राजनीतिक कार्यकर्ता के लिए रिटायरमेंट जैसा कोई शब्द नहीं होता। उन्होंने सांसदों को यह विश्वास दिलाया कि उनके सुझाव और उनकी दृष्टि हमेशा सरकार और नीति निर्माताओं के लिए महत्वपूर्ण रहेगी। प्रधानमंत्री ने इस बात को विशेष रूप से रखा कि देश की विविधता को सदन में स्वर देने वाले ये सांसद जब अपने गृह राज्यों में लौटेंगे, तो वे वहां के विकास में नई ऊर्जा फूंकेंगे। उन्होंने उम्मीद जताई कि सदन से मिली शिक्षा और यहां के कड़े अनुशासन का लाभ वे अपने भविष्य के सामाजिक कार्यों में भी उठाएंगे।
प्रधानमंत्री ने राज्यसभा की गरिमा और इसके स्थाई स्वरूप का उल्लेख करते हुए कहा कि विदा होने वाले सदस्य सदन के उस गौरवशाली इतिहास का हिस्सा बन गए हैं, जिसने देश को नई दिशा दी है। उन्होंने सांसदों के कार्यकाल के दौरान हुए महत्वपूर्ण बिलों पर चर्चा और उनके रचनात्मक विरोध का भी सम्मान किया। प्रधानमंत्री के अनुसार, विरोध भी लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करता है, बशर्ते वह राष्ट्रहित के उद्देश्यों से प्रेरित हो। उन्होंने सांसदों को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि उनकी विदाई केवल इस सदन से हो रही है, लेकिन वे देश के भविष्य के निर्माण में एक सक्रिय भागीदार बने रहेंगे। इस दौरान सदन का माहौल काफी गरिमामय और सौहार्दपूर्ण रहा, जहां पक्ष और विपक्ष के सदस्यों ने एक-दूसरे के प्रति सम्मान व्यक्त किया। अपने वक्तव्य के अंतिम चरणों में प्रधानमंत्री ने डिजिटल युग का जिक्र करते हुए सांसदों से अपील की कि वे अपने अनुभवों को आधुनिक माध्यमों से भी लोगों तक पहुंचाएं। उन्होंने कहा कि आज के समय में ज्ञान को साझा करना बहुत आसान है और विदा होने वाले सांसदों को अपनी यादें और संसदीय अनुभव लिखने चाहिए। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि भले ही आज ये 59 सदस्य सदन की कार्यवाही का हिस्सा नहीं रहेंगे, लेकिन उनके द्वारा उठाए गए मुद्दे और उनके द्वारा दिए गए सुझावों की गूंज इस सदन में हमेशा सुनाई देती रहेगी। उन्होंने सभी सदस्यों के उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु होने की कामना की ताकि वे लंबे समय तक राष्ट्र की सेवा में अपना योगदान देते रहें।
Also Read- ममता बनर्जी ने राष्ट्रपति प्रोटोकॉल विवाद पर दी सफाई, से पहले बंगाल को निशाना बनाने का लगाया आरोप।
What's Your Reaction?







