शहरी परिवहन की सूरत बदलने के लिए जल मेट्रो परियोजना का व्यापक खाका तैयार, देश के 18 प्रमुख शहरों में शुरू होगी 'वाटर मेट्रो'।
भारत सरकार देश के शहरी परिवहन ढांचे को आधुनिक, टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल बनाने के लिए एक अत्यंत महत्वाकांक्षी
- राष्ट्रीय जल मेट्रो नीति 2026 के मसौदे को मिली केंद्रीय मंजूरी, पहले चरण में अयोध्या, वाराणसी और प्रयागराज समेत 5 शहरों में थमेगा सड़कों का जाम
- पारंपरिक मेट्रो के मुकाबले बेहद किफायती और पर्यावरण अनुकूल होगी वाटर मेट्रो, अत्याधुनिक इलेक्ट्रिक बोट्स और फ्लोटिंग जेटी से चमकेंगे देश के अंतर्देशीय जलमार्ग
भारत सरकार देश के शहरी परिवहन ढांचे को आधुनिक, टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल बनाने के लिए एक अत्यंत महत्वाकांक्षी योजना पर काम कर रही है। केंद्रीय पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय ने देश के विभिन्न राज्यों में फैले 18 प्रमुख शहरों में जल मेट्रो परिवहन प्रणाली शुरू करने की दिशा में अपने कदमों को काफी तेज कर दिया है। केरल के कोच्चि में जल मेट्रो परियोजना की शानदार सफलता और वहां मिले बेहतरीन अनुभवों से सीख लेते हुए केंद्र सरकार अब इस प्रणाली को एक राष्ट्रीय स्तर के ढांचे के रूप में विस्तारित करने जा रही है। इसके तहत राष्ट्रीय जल मेट्रो नीति 2026 के मसौदे को तैयार कर विभिन्न मंत्रालयों के बीच आपसी परामर्श के लिए भेज दिया गया है, जो इस बात का स्पष्ट संकेत है कि देश में जल-आधारित शहरी परिवहन व्यवस्था को एक औपचारिक और कानूनी रूप देने की तैयारी अंतिम चरण में पहुंच चुकी है।
इस विशाल और दूरदर्शी परियोजना के क्रियान्वयन को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए इसे कई चरणों में विभाजित किया गया है। केंद्र सरकार की वर्तमान योजना के अनुसार, इस परियोजना के पहले चरण में देश के पांच अत्यंत महत्वपूर्ण और रणनीतिक शहरों को शामिल किया गया है, जिनमें उत्तर प्रदेश के तीन प्रमुख सांस्कृतिक व धार्मिक केंद्र यानी अयोध्या, वाराणसी और प्रयागराज विशेष रूप से शामिल हैं। इनके साथ ही जम्मू-कश्मीर की ग्रीष्मकालीन राजधानी श्रीनगर, बिहार की राजधानी पटना और असम का प्रमुख व्यापारिक केंद्र गुवाहाटी भी प्रथम चरण की इस सूची का हिस्सा हैं। इन शहरों का चयन उनके भौगोलिक महत्व, वहां बहने वाली नदियों में जल की निरंतर उपलब्धता और वहां पर्यटन व दैनिक यात्रियों की भारी तादाद को ध्यान में रखकर किया गया है, ताकि शुरुआती दौर में ही इसके सकारात्मक परिणाम सामने आ सकें।
परियोजना की तकनीकी और आर्थिक व्यवहार्यता को जांचने के लिए भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण ने कोच्चि मेट्रो रेल लिमिटेड को एक व्यापक सर्वेक्षण और व्यवहार्यता अध्ययन की जिम्मेदारी सौंपी थी। इस तकनीकी टीम ने देश भर के सभी 18 चिन्हित स्थानों का सघन दौरा कर वहां की भौगोलिक परिस्थितियों, जलमार्गों की गहराई, यात्रियों की अनुमानित संख्या और मौजूदा सार्वजनिक परिवहन प्रणालियों के साथ इसके एकीकरण की संभावनाओं का बारीक मूल्यांकन किया है। इस विस्तृत अध्ययन के बाद तैयार की गई रिपोर्टों में से अधिकांश को सरकार द्वारा आधिकारिक रूप से स्वीकार कर लिया गया है, जिससे अब जमीन पर बुनियादी ढांचे के निर्माण का रास्ता पूरी तरह से साफ हो गया है। प्रथम चरण के सफल संचालन के बाद असम के तेजपुर और डिब्रूगढ़ जैसे शहरों को द्वितीय चरण में शामिल करने की योजना बनाई गई है।
परियोजना के मानक और तकनीकी मापदंड
जल मेट्रो परियोजना को केवल उन क्षेत्रों में प्राथमिकता दी जाएगी जहां की भौगोलिक परिस्थितियां निरंतर या अर्ध-निरंतर जलमार्गों की सुविधा प्रदान करती हैं। इसके लिए मुख्य रूप से उन शहरों को चुना गया है जिनकी आबादी दस लाख से अधिक है और जहां परिवहन की मांग विशेष रूप से पर्यटन या औद्योगिक गलियारों में बहुत ज्यादा है। हालांकि, उन क्षेत्रों में इन कड़े नियमों में ढील दी जा सकती है जहां सड़कों पर वाहनों का दबाव अत्यधिक है या जो इलाके पूरी तरह से पानी से घिरे होने के कारण मुख्य भूमि से कटे हुए हैं।
इस नई परिवहन प्रणाली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह पारंपरिक भूमि-आधारित मेट्रो प्रणालियों की तुलना में बेहद कम पूंजी-गहन है। पारंपरिक मेट्रो लाइनों को बिछाने के लिए जहां हजारों करोड़ रुपये की लागत से ऊंचे पिलर, भूमिगत सुरंगें और बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण की आवश्यकता होती है, वहीं जल मेट्रो के लिए प्रकृति द्वारा प्रदान किए गए मौजूदा जलमार्गों का ही उपयोग किया जाता है। इसके लिए केवल नदियों या जलाशयों के किनारों पर न्यूनतम नागरिक बुनियादी ढांचे जैसे फ्लोटिंग जेटी और आधुनिक टर्मिनलों के निर्माण की आवश्यकता होती है। इसके कारण न केवल परियोजना के निर्माण की समयसीमा बेहद कम हो जाती है, बल्कि परिचालन लागत में भी भारी कमी आती है, जो इसे आर्थिक रूप से एक बेहद व्यावहारिक विकल्प बनाती है।
तकनीकी मोर्चे पर इस पूरी परियोजना को शत-प्रतिशत पर्यावरण के अनुकूल और हरित ऊर्जा पर आधारित रखने का निर्णय लिया गया है। जल मेट्रो के बेड़े में शामिल होने वाली सभी नावें और फैरी पूरी तरह से इलेक्ट्रिक या हाइब्रिड प्रणोदन प्रणालियों से संचालित होंगी, जिससे नदियों के पानी और आसपास के पर्यावरण में किसी भी प्रकार का कार्बन उत्सर्जन या ध्वनि प्रदूषण नहीं होगा। इन आधुनिक नौकाओं को चार्ज करने के लिए टर्मिनलों पर ही उच्च क्षमता वाले इलेक्ट्रिकल डॉक और चार्जिंग स्टेशन बनाए जाएंगे। यात्रियों की सुविधा के लिए इन नावों में स्वचालित किराया संग्रह प्रणाली (एएफसी) लागू की जाएगी, जिसके तहत यात्री अपने स्मार्ट कार्ड या मोबाइल ऐप के जरिए ठीक वैसे ही टिकट पंच कर सकेंगे जैसे वे सामान्य मेट्रो स्टेशनों पर करते हैं।
इस जल परिवहन क्रांति का एक बहुत बड़ा लाभ देश के पर्यटन उद्योग और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मिलने जा रहा है। अयोध्या में सरयू नदी, वाराणसी और प्रयागराज में गंगा नदी, पटना में गंगा और श्रीनगर की डल झील व झेलम नदी में जब ये चमचमाती वातानुकूलित जल मेट्रो नावें चलेंगी, तो यह न केवल स्थानीय लोगों के सफर के समय को आधा कर देंगी बल्कि पर्यटकों के लिए भी एक बेहद खूबसूरत और दर्शनीय अनुभव साबित होंगी। इसके अलावा, नदियों के खाली पड़े जलमार्गों का व्यावसायिक उपयोग होने से शहरों की मुख्य सड़कों पर लगने वाले भारी ट्रैफिक जाम से जनता को बड़ी राहत मिलेगी और ईंधन की भी भारी बचत होगी जिसका सीधा लाभ देश की अर्थव्यवस्था को मिलेगा।
What's Your Reaction?







