कन्नन गोपीनाथन का आईएएस से इस्तीफा अभी भी प्रक्रिया में, जानें क्यों सरकार ने अब तक नहीं दी है अंतिम मंजूरी?
अखिल भारतीय सेवा नियमावली (All India Services Rules) के अनुसार, किसी भी आईएएस अधिकारी का इस्तीफा देना और उसका स्वीकार
- भारतीय प्रशासनिक सेवा नियमावली और इस्तीफे की शर्तें: क्या कोई अधिकारी बिना स्वीकृति के छोड़ सकता है अपनी सेवा?
- प्रशासनिक गतिरोध: कन्नन गोपीनाथन के त्यागपत्र पर टिकीं निगाहें, अनुशासनात्मक कार्यवाही बनी आधिकारिक बाधा
अखिल भारतीय सेवा नियमावली (All India Services Rules) के अनुसार, किसी भी आईएएस अधिकारी का इस्तीफा देना और उसका स्वीकार होना एक निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत होता है। कन्नन गोपीनाथन ने जब अपना इस्तीफा सौंपा था, तब वे दादरा और नगर हवेली में बिजली और गैर-पारंपरिक ऊर्जा सचिव के पद पर तैनात थे। नियम कहते हैं कि एक अधिकारी को अपना त्यागपत्र राज्य सरकार या केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासन को सौंपना होता है, जो इसे अपनी टिप्पणी के साथ केंद्र सरकार के कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को भेजता है। जब तक केंद्र सरकार इस पर आधिकारिक मुहर नहीं लगा देती और इसे राजपत्र (Gazette) में अधिसूचित नहीं कर देती, तब तक वह व्यक्ति तकनीकी रूप से सेवा में ही माना जाता है। गोपीनाथन के मामले में, इस्तीफा देने के तुरंत बाद उन पर कर्तव्यों में लापरवाही और अनुशासनहीनता के आरोप में आरोप पत्र (Charge Sheet) दायर कर दिया गया था, जिसने इस पूरी प्रक्रिया को जटिल बना दिया है। सरकारी नियमों के मुताबिक, यदि किसी अधिकारी के खिलाफ कोई विभागीय जांच या अनुशासनात्मक कार्यवाही लंबित है, तो सरकार को उसका इस्तीफा स्वीकार न करने का पूरा अधिकार है। कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग के दिशा-निर्देशों में यह स्पष्ट है कि लोकहित में या प्रशासनिक कारणों से इस्तीफे को तब तक रोका जा सकता है जब तक कि संबंधित अधिकारी पर लगे आरोपों का निपटारा न हो जाए। गोपीनाथन के मामले में सरकार का पक्ष रहा है कि उन्होंने आधिकारिक आदेशों की अवहेलना की और बिना अनुमति के मुख्यालय छोड़ दिया। इसी आधार पर उनके खिलाफ जांच शुरू की गई थी। नियम यह भी कहते हैं कि यदि कोई अधिकारी इस्तीफा स्वीकार होने से पहले ही काम पर आना बंद कर देता है, तो उसे 'अनधिकृत अनुपस्थिति' माना जाता है, जो अपने आप में सेवा नियमावली का उल्लंघन है।
इस्तीफे की प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आता है जब अधिकारी पर वित्तीय देनदारियां या सरकारी बकाया होता है। आईएएस अधिकारियों को उनके प्रशिक्षण और सेवा के दौरान कई प्रकार के भत्ते और सुविधाएं मिलती हैं। यदि कोई अधिकारी अपनी अनिवार्य सेवा अवधि पूरी करने से पहले इस्तीफा देता है, तो उसे प्रशिक्षण पर हुए खर्च की वसूली का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, गोपीनाथन ने अपनी सेवा के सात साल पूरे कर लिए थे, लेकिन उन पर लगे प्रशासनिक आरोपों ने उनकी 'विजिलेंस क्लीयरेंस' (Vigilance Clearance) को रोक दिया है। विजिलेंस क्लीयरेंस के बिना DoPT किसी भी इस्तीफे को आगे नहीं बढ़ाता है। यही कारण है कि वर्षों बीत जाने के बाद भी उनका नाम आधिकारिक तौर पर सेवामुक्त अधिकारियों की सूची में शामिल नहीं हो सका है। अखिल भारतीय सेवा (अनुशासन और अपील) नियम, 1969 के नियम 3 के तहत, केंद्र सरकार के पास यह शक्ति है कि वह किसी भी अधिकारी को निलंबित कर सकती है या उसके इस्तीफे को लंबित रख सकती है यदि उसके विरुद्ध गंभीर कदाचार की जांच चल रही हो। इसके अलावा, यदि कोई अधिकारी त्यागपत्र देने के बाद राजनीति में शामिल होता है या सार्वजनिक रूप से सरकार की आलोचना करता है, तो सरकार इसे सेवा शर्तों का उल्लंघन मानकर पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों को रोकने की कार्यवाही भी कर सकती है।
इस पूरे मामले का एक अन्य पहलू यह है कि क्या कोई अधिकारी इस्तीफा देने के बाद वापस सेवा में लौट सकता है। नियमों के अनुसार, यदि किसी अधिकारी ने इस्तीफा दे दिया है और वह स्वीकार नहीं हुआ है, तो वह अपना इस्तीफा वापस लेने की गुहार लगा सकता है, बशर्ते सरकार इसके लिए सहमत हो। लेकिन गोपीनाथन के मामले में, उन्होंने स्पष्ट किया है कि वे अपने निर्णय पर अडिग हैं। दूसरी ओर, सरकार ने उन्हें काम पर लौटने के नोटिस भी जारी किए थे, जिन्हें उन्होंने अस्वीकार कर दिया। कानूनन, यदि कोई अधिकारी लगातार पांच वर्षों तक अनधिकृत रूप से अनुपस्थित रहता है, तो उसे 'सेवानिवृत्त' मान लिया जाता है, लेकिन यह प्रक्रिया भी अनुशासनात्मक कार्यवाही के अधीन होती है और इसमें अधिकारी को मिलने वाले लाभ शून्य हो सकते हैं।
प्रशासनिक दृष्टिकोण से देखें तो इस तरह के मामलों में देरी का उद्देश्य एक मिसाल कायम करना भी होता है ताकि अन्य अधिकारी सेवा की गरिमा और अनुशासन को हलके में न लें। सेवा नियमावली यह सुनिश्चित करती है कि कोई भी लोक सेवक अपनी मर्जी से कभी भी जिम्मेदारी छोड़कर नहीं भाग सकता, विशेषकर तब जब उन पर कोई जिम्मेदारी सौंपी गई हो। गोपीनाथन ने बाढ़ राहत कार्यों के दौरान केरल में जो सक्रियता दिखाई थी, उसकी प्रशंसा हुई थी, लेकिन उनके इस्तीफे के बाद की परिस्थितियों ने उन्हें एक विवादास्पद मोड़ पर खड़ा कर दिया। अब यह मामला केवल एक इस्तीफे का नहीं, बल्कि सरकारी नियमों की व्याख्या और उनके प्रवर्तन का उदाहरण बन गया है। न्यायिक हस्तक्षेप की संभावना भी इस मामले में हमेशा बनी रहती है। यदि कोई अधिकारी महसूस करता है कि उसका इस्तीफा दुर्भावनापूर्ण तरीके से रोका गया है, तो वह केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) या उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है। अतीत में ऐसे कई उदाहरण रहे हैं जहां न्यायालयों ने सरकार को निर्देश दिया है कि वह एक निश्चित समय सीमा के भीतर इस्तीफे पर निर्णय ले। हालांकि, यदि सरकार यह साबित कर देती है कि अधिकारी के खिलाफ जांच जायज है और वह प्रक्रिया में देरी नहीं कर रही है, तो अदालतें भी प्रशासनिक स्वायत्तता में दखल देने से बचती हैं। गोपीनाथन का मामला वर्तमान में इसी कानूनी खींचतान के बीच फंसा हुआ है।
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