भारत में सीओपीडी के मरीजों की संख्या में तेज उछाल: वायु प्रदूषण और धूम्रपान से क्यों बन गया दूसरा प्रमुख मौत का कारण।
भारत में सांस की घातक बीमारी क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज यानी सीओपीडी के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन और
भारत में सांस की घातक बीमारी क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज यानी सीओपीडी के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन और लैंसेट की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, यह बीमारी अब देश में दूसरा सबसे बड़ा मौत का कारण बन चुकी है। 1990 में जहां यह आठवें स्थान पर थी, वहीं 2025 तक इसकी वजह से होने वाली मौतें 1.6 मिलियन तक पहुंच सकती हैं। सीओपीडी फेफड़ों को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचाती है, जिससे सांस लेने में तकलीफ होती है और व्यक्ति की जिंदगी कठिन हो जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि वायु प्रदूषण, बायोमास ईंधन का धुआं और धूम्रपान जैसे कारक इसके लिए जिम्मेदार हैं। भारत जैसे विकासशील देश में यह महामारी का रूप ले रही है, जहां हर साल लाखों लोग इसकी चपेट में आ रहे हैं। आइए, इस समस्या को विस्तार से समझते हैं।
सीओपीडी क्या है? यह एक ऐसी पुरानी फेफड़े की बीमारी है, जिसमें हवा के थैले क्षतिग्रस्त हो जाते हैं और सांस की नलियां सूज जाती हैं। इससे सांस फूलना, खांसी और बलगम की समस्या होती है। शुरुआत में यह हल्की लगती है, लेकिन समय के साथ गंभीर हो जाती है। विश्व स्तर पर सीओपीडी तीसरा सबसे बड़ा मौत का कारण है, लेकिन भारत में यह दूसरे स्थान पर पहुंच गया है। ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज स्टडी 2021 के अनुसार, भारत में 55 मिलियन से अधिक लोग इससे प्रभावित हैं। 30 वर्ष से ऊपर के लोगों में इसकी प्रचलन दर 7 से 10 प्रतिशत तक है। पुरुषों में यह ज्यादा देखा जाता है, लेकिन महिलाओं में भी तेजी से फैल रहा है। दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे प्रदूषित शहरों में मामले दोगुने हो चुके हैं।
क्यों बढ़ रहे हैं मामले? मुख्य कारण वायु प्रदूषण है। भारत में 53 प्रतिशत सीओपीडी के मामले बाहरी हवा के प्रदूषण से जुड़े हैं। पीएम 2.5 कण फेफड़ों में जाकर सूजन पैदा करते हैं। दिल्ली में सर्दियों में एयर क्वालिटी इंडेक्स 500 से ऊपर चला जाता है, जो सीओपीडी के मरीजों के लिए घातक है। एक अध्ययन के मुताबिक, लंबे समय तक प्रदूषण के संपर्क में रहने से फेफड़ों को स्थायी नुकसान होता है। इसके अलावा, घरेलू स्तर पर बायोमास ईंधन का उपयोग बड़ा खतरा है। ग्रामीण भारत में 70 प्रतिशत परिवार लकड़ी, गोबर या कोयले से खाना बनाते हैं। इस धुएं से निकलने वाले कण महिलाओं और बच्चों को सबसे ज्यादा प्रभावित करते हैं। लैंसेट ग्लोबल हेल्थ की रिपोर्ट कहती है कि बायोमास धुएं से 25 प्रतिशत सीओपीडी मामले बढ़ते हैं। धूम्रपान भी प्रमुख कारक है। भारत में 25 प्रतिशत पुरुष सिगरेट या बीड़ी पीते हैं, जो सीओपीडी का सीधा कारण बनता है। निष्क्रिय धूम्रपान से भी खतरा दोगुना हो जाता है।
अन्य जोखिम कारक भी कम नहीं। बचपन में निमोनिया या कम वजन जन्म से फेफड़े कमजोर हो जाते हैं। टीबी के बाद फेफड़ों का क्षतिग्रस्त होना एक बड़ा कारण है। भारत में टीबी के 2.6 मिलियन मामले सालाना होते हैं, और कई मरीजों में सीओपीडी विकसित हो जाता है। आनुवंशिक समस्या जैसे अल्फा-1 एंटीट्रिप्सिन की कमी भी भूमिका निभाती है। शहरीकरण से धूल और रसायनों का संपर्क बढ़ा है। मजदूर वर्ग में धूल भरी नौकरियों से 16 प्रतिशत मामले जुड़े हैं। उम्र बढ़ने के साथ खतरा अधिक होता है। 40 वर्ष से ऊपर के लोगों में प्रचलन 13 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। कोविड-19 महामारी ने स्थिति बिगाड़ दी। कई मरीजों में वायरस ने फेफड़ों को कमजोर कर सीओपीडी को ट्रिगर किया।
मौतों का आंकड़ा चौंकाने वाला है। 2016 में भारत में सीओपीडी से 8 लाख मौतें हुईं, जो 2025 तक 16 लाख तक पहुंच सकता है। यह हृदय रोग के बाद दूसरा स्थान है। प्रति लाख आबादी पर 64 मौतें होती हैं। विकलांग जीवन वर्षों की हानि में यह तीसरा स्थान रखता है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी से स्थिति खराब है। अधिकांश मरीज देर से डॉक्टर के पास पहुंचते हैं, जब बीमारी उन्नत हो चुकी होती है। एक समुदाय आधारित अध्ययन के अनुसार, जागरूकता की कमी से 50 प्रतिशत मरीजों को सही इलाज नहीं मिलता। महिलाओं में बायोमास धुएं से जुड़े मामले 40 प्रतिशत बढ़े हैं।
सीओपीडी के लक्षण पहचानना जरूरी है। लगातार खांसी, सांस फूलना, सीने में जकड़न और थकान इसके संकेत हैं। शुरुआत में ये सामान्य लगते हैं, लेकिन अनदेखा करने से हार्ट अटैक या फेफड़े का कैंसर हो सकता है। निदान के लिए स्पाइरोमेट्री टेस्ट जरूरी है। यह फेफड़ों की क्षमता मापता है। डॉक्टर सलाह देते हैं कि 45 वर्ष से ऊपर के हर व्यक्ति को सालाना यह टेस्ट कराना चाहिए। इलाज में इनहेलर, ब्रोंकोडाइलेटर और स्टेरॉयड दवाएं दी जाती हैं। ऑक्सीजन थेरेपी और फेफड़े की सर्जरी भी विकल्प हैं। लेकिन रोकथाम ही सबसे अच्छा उपाय है। धूम्रपान छोड़ना, स्वच्छ ईंधन का उपयोग और प्रदूषण से बचाव जरूरी।
सरकार और विशेषज्ञ क्या कर रहे हैं? स्वास्थ्य मंत्रालय ने राष्ट्रीय श्वसन रोग कार्यक्रम शुरू किया है। इसमें जागरूकता अभियान और मुफ्त स्क्रीनिंग शामिल हैं। विश्व सीओपीडी दिवस 20 नवंबर को मनाया जाता है, जहां फोकस रोकथाम पर होता है। विशेषज्ञ कहते हैं कि एलपीजी गैस को बढ़ावा देकर बायोमास उपयोग कम किया जा सकता है। उज्ज्वला योजना इसी दिशा में है, लेकिन इसे तेज करना होगा। शहरी क्षेत्रों में एयर प्यूरीफायर और मास्क का प्रचार हो। डिजिटल हेल्थ ऐप्स से मरीजों की निगरानी संभव है। एक रिपोर्ट के अनुसार, समय पर इलाज से 30 प्रतिशत मौतें रोकी जा सकती हैं।
भारत में सीओपीडी का बोझ आर्थिक रूप से भी भारी है। इलाज पर सालाना 35,000 करोड़ रुपये खर्च होते हैं। उत्पादकता हानि से अर्थव्यवस्था को नुकसान। ग्रामीण महिलाएं सबसे ज्यादा प्रभावित हैं, जो परिवार की कमाई को प्रभावित करती हैं। वैश्विक स्तर पर 391 मिलियन लोग इससे जूझ रहे हैं, लेकिन भारत का हिस्सा 14 प्रतिशत है। लैंसेट की 2021 स्टडी कहती है कि यदि प्रदूषण नियंत्रित न हुआ, तो 2030 तक मामले दोगुने हो जाएंगे।
रोकथाम के उपाय सरल हैं। धूम्रपान न करें, दूसरों के धुएं से बचें। घर में चूल्हा बदलकर गैस या बिजली का उपयोग करें। व्यायाम और स्वस्थ आहार से फेफड़े मजबूत रखें। प्रदूषण वाले दिनों में बाहर कम निकलें। बच्चों को बचपन से स्वच्छ हवा दें। डॉक्टरों का कहना है कि जागरूकता से 50 प्रतिशत मामले रोके जा सकते हैं। स्कूलों और कार्यस्थलों पर अभियान चलाएं।
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