दिल्ली दंगों की साजिश मामले में शरजील इमाम की जमानत याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली पुलिस का विरोध, भड़काऊ वीडियो दिखाकर की अपील।
नई दिल्ली। 2020 के उत्तर-पूर्व दिल्ली दंगों से जुड़े साजिश के मामले में जेएनयू छात्र और कार्यकर्ता शरजील इमाम की जमानत याचिका पर सुप्रीम
नई दिल्ली। 2020 के उत्तर-पूर्व दिल्ली दंगों से जुड़े साजिश के मामले में जेएनयू छात्र और कार्यकर्ता शरजील इमाम की जमानत याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। 20 नवंबर 2025 को हुई सुनवाई में दिल्ली पुलिस ने जमानत का कड़ा विरोध किया। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) एसवी राजू ने कोर्ट में शरजील के कथित भड़काऊ भाषणों के वीडियो दिखाए, जो उन्होंने दंगों से ठीक पहले सीएए-एनआरसी विरोधी प्रदर्शनों के दौरान दिए थे। इन वीडियो में शरजील को असम को भारत से काटने और चक्का जाम जैसे बयान देते दिखाया गया। पुलिस का कहना है कि ये बयान दंगों की साजिश का हिस्सा थे और शरजील की रिहाई से जांच प्रभावित होगी। शरजील की पैरवी कर रहे वकील कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि पांच साल से अधिक की हिरासत के बाद जमानत मिलनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई को आगे बढ़ा दिया है। यह मामला देशव्यापी बहस का विषय बना हुआ है।
2020 के फरवरी में दिल्ली के उत्तर-पूर्व इलाकों में हुए दंगों ने पूरे देश को झकझोर दिया था। 23 फरवरी से शुरू हुए दंगों में 53 लोग मारे गए, जिनमें ज्यादातर मुस्लिम थे, और सैकड़ों घायल हुए। दंगे जाफराबाद मेट्रो स्टेशन के आसपास चक्का जाम के दौरान भड़के, जो सीएए-एनआरसी के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन का रूप था। लेकिन जल्द ही यह हिंसा में बदल गया। दुकानें जलाई गईं, घरों पर हमले हुए और पुलिस पर भी आरोप लगे। दिल्ली पुलिस ने दंगों को 'पूर्व नियोजित साजिश' करार दिया। यूएपीए (गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम) के तहत दर्ज मामले में शरजील इमाम, उमर खालिद, गुलफिशा फातिमा और मीरा हाइदर जैसे छात्र कार्यकर्ताओं को आरोपी बनाया गया। पुलिस का दावा है कि ये लोग प्रदर्शनों के बहाने हिंसा भड़काने की योजना बना रहे थे। शरजील को जनवरी 2020 में गिरफ्तार किया गया था, जब उनके शाहीन बाग के भाषण वायरल हो गए।
शरजील इमाम जेएनयू से पीएचडी छात्र हैं। वे अल्पसंख्यक अधिकारों और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर सक्रिय रहे। दिसंबर 2019 में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ देशव्यापी प्रदर्शन शुरू हुए। शरजील ने जामिया मिलिया इस्लामिया और शाहीन बाग जैसे स्थानों पर भाषण दिए। उनके एक भाषण में कहा गया था, 'अगर हम सब मिलकर असम को भारत से काट दें, तो सरकार को झुकना पड़ेगा।' यह बयान वायरल होने पर बिहार, असम, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में एफआईआर दर्ज हुईं। पुलिस ने इन्हें राजद्रोह (आईपीसी धारा 124ए) और यूएपीए के तहत अपराध बताया। शरजील ने कहा कि उनके बयान संदर्भ से हटकर लिए गए थे और वे शांतिपूर्ण विरोध की बात कर रहे थे। लेकिन कोर्ट ने इसे भड़काऊ माना।
जमानत याचिका का सफर लंबा रहा है। शरजील ने 2020 में दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट में जमानत मांगी, लेकिन खारिज हो गई। अपील पर दिल्ली हाईकोर्ट ने भी मना कर दिया। सुप्रीम कोर्ट में पहली याचिका 2022 में दायर हुई। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच ने जुलाई 2023 में सुनवाई की, लेकिन फैसला सुरक्षित रखा। बाद में मामला जस्टिस संजय कुशलपाल सिंह और जस्टिस अरविंद कुमार की बेंच को ट्रांसफर हो गया। सितंबर 2025 में शरजील ने हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी। कोर्ट ने 18 नवंबर को सुनवाई की, जहां पुलिस ने कहा कि जांच पूरी हो चुकी है और कोई बदलाव नहीं आया। 20 नवंबर की सुनवाई में एएसजी राजू ने वीडियो दिखाए। एक वीडियो में शरजील युवाओं को संबोधित करते हुए कहते हैं, 'चक्का जाम करो, रेलवे ट्रैक पर बैठो, असम को काट दो।' पुलिस ने दावा किया कि ये बयान 15-20 फरवरी के बीच दिए गए, जब दंगे भड़कने वाले थे। एएसजी ने कहा, 'ये बुद्धिजीवी आतंकवादी हैं, जो जमीनी स्तर के अपराधियों से ज्यादा खतरनाक हैं।' उन्होंने उमर खालिद के भाषण भी दिखाए।
शरजील के वकील सिब्बल ने विरोध किया। उन्होंने कहा, 'प्रदर्शन आयोजित करना या भाग लेना अपराध नहीं। पांच साल से जेल में हैं, बिना ट्रायल के। अन्य सहआरोपी जैसे देवांगना कालिया और नताशा नरवाल को जमानत मिल चुकी है। समानता का सिद्धांत लागू होना चाहिए।' सिब्बल ने तर्क दिया कि वीडियो पुराने हैं और संदर्भ से बाहर हैं। शरजील ने गांधीवादी अहिंसा की बात की थी। कोर्ट में यह भी कहा गया कि जांच 2024 में पूरी हुई, इसलिए देरी हुई। लेकिन पुलिस ने कहा कि आरोपी जानबूझकर टालमटोल कर रहे थे। जस्टिस कुमार ने एएसजी से पूछा कि बयान कितने भड़काऊ हैं। एएसजी ने जवाब दिया कि ये राष्ट्र की संप्रभुता पर हमला थे। सुनवाई दोपहर बाद जारी रही। कोर्ट ने अगली तारीख 25 नवंबर तय की।
यह मामला केवल शरजील का नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का है। मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा कि यूएपीए का दुरुपयोग हो रहा है। विपक्षी नेता असदुद्दीन ओवैसी ने ट्वीट किया, 'शरजील की आवाज दबाई जा रही है।' भाजपा ने कहा कि दंगों के दोषी बच नहीं सकते। सोशल मीडिया पर FreeSharjeelImam ट्रेंड कर रहा है। शरजील की मां अफशा ने कहा कि बेटा निर्दोष है। उन्होंने कहा, 'वह पढ़ा-लिखा लड़का है, जो न्याय के लिए लड़ा।' जेएनयू छात्र संघ ने समर्थन मार्च निकाला।
दंगों की जांच में 700 से अधिक गिरफ्तारियां हुईं। चार्जशीट में 50 गवाह हैं। पुलिस का दावा है कि चरण चरण में साजिश रची गई। शाहीन बाग प्रदर्शन को कवर के रूप में इस्तेमाल किया गया। शरजील पर आरोप है कि उन्होंने फंडिंग और लॉजिस्टिक्स का इंतजाम किया। लेकिन उनके समर्थक कहते हैं कि सबूत कमजोर हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पहले कहा था कि लंबी हिरासत के बाद बेल पर विचार हो। 2023 में उमर खालिद की याचिका पर भी यही बहस हुई।
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