महंगाई का एक और करारा झटका, अमूल के बाद अब मदर डेयरी ने भी बढ़ाए दूध के दाम, आम आदमी की रसोई का बजट बिगड़ा।
भारतीय घरेलू बाजार में महंगाई की तपिश एक बार फिर महसूस की जा रही है, क्योंकि देश की प्रमुख डेयरी कंपनियों ने
- दूध की कीमतों में 2 रुपये प्रति लीटर का इजाफा, फुल क्रीम अब 72 रुपये और टोंड मिल्क 60 रुपये के पार पहुँचा
- बढ़ती लागत ने बढ़ाई डेयरी उत्पादों की कीमत, मदर डेयरी के इस फैसले से देशभर के मध्यम वर्गीय परिवारों पर बढ़ा आर्थिक बोझ
भारतीय घरेलू बाजार में महंगाई की तपिश एक बार फिर महसूस की जा रही है, क्योंकि देश की प्रमुख डेयरी कंपनियों ने दूध की कीमतों में बढ़ोतरी का सिलसिला शुरू कर दिया है। हाल ही में अमूल द्वारा अपनी दरों में वृद्धि करने के तत्काल बाद, मदर डेयरी ने भी अपने दूध के दामों में 2 रुपये प्रति लीटर की वृद्धि की घोषणा कर दी है। इस फैसले ने देश के करोड़ों उपभोक्ताओं को सीधे तौर पर प्रभावित किया है, जो पहले से ही खाद्य वस्तुओं की बढ़ती कीमतों से जूझ रहे थे। दूध एक ऐसी अनिवार्य वस्तु है, जिसकी खपत लगभग हर घर में प्रतिदिन होती है, इसलिए इसकी कीमतों में मामूली बदलाव भी व्यापक आर्थिक प्रभाव डालता है। ताजा वृद्धि के बाद बाजार में उपलब्ध दूध के विभिन्न वेरिएंट्स की कीमतें अब नए उच्चतम स्तर पर पहुंच गई हैं। मदर डेयरी द्वारा जारी की गई नई दरों के अनुसार, फुल क्रीम दूध की कीमत अब 70 रुपये प्रति लीटर से बढ़कर 72 रुपये प्रति लीटर हो गई है। वहीं, मध्यम वर्गीय परिवारों में सबसे अधिक उपयोग होने वाले टोंड मिल्क की कीमत भी 58 रुपये से बढ़ाकर 60 रुपये प्रति लीटर कर दी गई है। इसके अतिरिक्त, डबल टोंड मिल्क और गाय के दूध की कीमतों में भी समान अनुपात में वृद्धि की गई है। दिल्ली-एनसीआर और आसपास के क्षेत्रों में मदर डेयरी की आपूर्ति का एक बहुत बड़ा हिस्सा है, जिसके कारण इन इलाकों के निवासियों पर इस फैसले का सबसे अधिक और तात्कालिक प्रभाव पड़ा है। सुबह-सुबह दूध के केंद्रों पर पहुंचे लोगों के लिए यह खबर उनके मासिक खर्चों की योजना को प्रभावित करने वाली साबित हुई है।
डेयरी कंपनियों का तर्क है कि दूध उत्पादन की लागत में पिछले कुछ महीनों में भारी वृद्धि हुई है, जिसे अब उपभोक्ताओं के साथ साझा करना अनिवार्य हो गया है। पशु चारे की कीमतों में हुई बढ़ोतरी, परिवहन लागत में वृद्धि और प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग) के दौरान होने वाले खर्चों ने कंपनियों के मुनाफे पर दबाव बनाया था। चारे की उपलब्धता कम होने और गर्मियों के मौसम में दूध के उत्पादन में प्राकृतिक गिरावट आने के कारण डेयरी क्षेत्र को परिचालन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इसके अतिरिक्त, कच्चे दूध की खरीद दरों में भी वृद्धि हुई है, क्योंकि किसानों को पशुपालन जारी रखने के लिए अब अधिक निवेश करना पड़ रहा है। यही कारण है कि कंपनियां अब अपने घाटे को कम करने के लिए खुदरा कीमतों में बदलाव कर रही हैं। दूध की कीमतों में होने वाली यह वृद्धि केवल दूध के पैकेट तक ही सीमित नहीं रहती, बल्कि इसका असर दूध से बने अन्य उत्पादों जैसे पनीर, दही, घी और मिठाइयों पर भी पड़ता है। आने वाले दिनों में रेस्तरां और चाय की दुकानों पर भी सेवाओं की कीमतों में बढ़ोतरी होने की संभावना है, क्योंकि इन व्यवसायों के लिए दूध एक मुख्य इनपुट सामग्री है।
आर्थिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो दूध के दामों में बढ़ोतरी ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था को अलग-अलग तरीके से प्रभावित करती है। एक ओर जहां किसानों को दूध के बदले अधिक दाम मिलने की उम्मीद जगती है, वहीं दूसरी ओर शहरी उपभोक्ताओं के लिए यह शुद्ध रूप से एक अतिरिक्त खर्च है। औसत भारतीय परिवार के बजट में दूध और डेयरी उत्पादों का हिस्सा काफी महत्वपूर्ण होता है। जब भी इस तरह की वृद्धि होती है, तो निम्न और मध्यम आय वर्ग के परिवारों को अपनी अन्य प्राथमिकताओं में कटौती करनी पड़ती है। विशेषज्ञों का मानना है कि खाद्य मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के सरकारी प्रयासों के बीच डेयरी क्षेत्र का यह कदम महंगाई के आंकड़ों को और ऊपर ले जा सकता है।
बाजार में प्रतिस्पर्धा और आपूर्ति श्रृंखला के प्रबंधन को लेकर भी अब सवाल उठने लगे हैं। आमतौर पर देखा गया है कि जब भी अमूल जैसा कोई बड़ा ब्रांड कीमतों में बदलाव करता है, तो मदर डेयरी और अन्य क्षेत्रीय डेयरी ब्रांड भी उसी राह पर चलते हैं। इस प्रवृत्ति के कारण बाजार में उपभोक्ताओं के पास विकल्प सीमित हो जाते हैं। आपूर्ति श्रृंखला में आने वाली बाधाएं, जैसे कि ईंधन की ऊंची कीमतें, पैकेजिंग सामग्री के बढ़ते दाम और बिजली दरों में बदलाव, अंततः उपभोक्ता की जेब पर ही भारी पड़ती हैं। कंपनियों का कहना है कि वे इस वृद्धि का एक बड़ा हिस्सा सीधे उत्पादकों (किसानों) को दे रही हैं ताकि दुग्ध उत्पादन की निरंतरता बनी रहे और डेयरी उद्योग टिकाऊ बना रहे। सामाजिक स्तर पर भी इस वृद्धि के प्रभावों की चर्चा तेज हो गई है। बच्चों के पोषण के लिए दूध को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है और बढ़ती कीमतों के कारण गरीब परिवारों के लिए बच्चों को पर्याप्त पोषण प्रदान करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि दूध की कीमतों में बार-बार होने वाली वृद्धि से प्रोटीन की खपत पर असर पड़ सकता है। सरकार द्वारा संचालित कल्याणकारी योजनाओं और आंगनवाड़ी केंद्रों में भी दूध की आपूर्ति के लिए अब अधिक बजटीय प्रावधानों की आवश्यकता होगी। बाजार में मौजूद खुली डेयरी और स्थानीय दूध विक्रेताओं ने भी अब अपनी कीमतों को ब्रांडेड कंपनियों के समकक्ष ले जाने की तैयारी शुरू कर दी है, जिससे राहत की कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही है।
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