बंगाल चुनाव के नतीजों पर संजय राउत का बड़ा प्रहार, ममता बनर्जी की रणनीति को बताया गलत।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने भारतीय राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। 15 साल से सत्ता
- 'राहुल गांधी की बात मान लेतीं ममता तो न होता यह हाल', हार के बाद विपक्ष में मची रार
- गठबंधन से दूरी और अकेले लड़ने का फैसला पड़ा भारी, राहुल गांधी की दूरदर्शिता पर राउत की मुहर
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने भारतीय राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। 15 साल से सत्ता पर काबिज तृणमूल कांग्रेस की करारी हार और भारतीय जनता पार्टी की ऐतिहासिक जीत के बाद विपक्षी गठबंधन के भीतर से ही तीखी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। इसी क्रम में शिवसेना (यूबीटी) के वरिष्ठ नेता और सांसद संजय राउत ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर कड़ा प्रहार किया है। उन्होंने इस हार का मुख्य कारण ममता बनर्जी द्वारा कांग्रेस नेतृत्व और विशेष रूप से राहुल गांधी की बातों को अनसुना करना बताया है। पश्चिम बंगाल के चुनावी रण में भारतीय जनता पार्टी ने अभूतपूर्व प्रदर्शन करते हुए 294 सदस्यीय विधानसभा में 207 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया है। इस जीत के साथ ही ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस महज 80 सीटों पर सिमट गई, जो 2021 के मुकाबले एक बहुत बड़ी गिरावट है। इस हार के बाद विपक्षी खेमे में खलबली मच गई है और गठबंधन के घटक दल अब एक-दूसरे की गलतियां गिनाने में लग गए हैं। संजय राउत ने मुंबई में मीडिया से बात करते हुए स्पष्ट रूप से कहा कि अगर ममता बनर्जी ने अहंकार त्याग कर राहुल गांधी के साथ गठबंधन किया होता, तो आज बंगाल के नतीजे कुछ और ही होते। उन्होंने ममता के अकेले चुनाव लड़ने के फैसले को उनकी राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी भूल करार दिया है।
संजय राउत ने राहुल गांधी की प्रशंसा करते हुए उन्हें एक 'दूरदर्शी' नेता बताया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी लंबे समय से देश को आगाह कर रहे थे कि चुनाव जीतने के लिए किस तरह की रणनीतियों का इस्तेमाल किया जा रहा है। राउत के अनुसार, राहुल गांधी ने ममता बनर्जी को बार-बार बातचीत के लिए बुलाया था और एक संयुक्त मोर्चा बनाने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ने इसे नजरअंदाज कर दिया। राउत ने इसे 'गंभीर अपराध' की संज्ञा देते हुए कहा कि जब आप दुश्मन की ताकत का सही आकलन नहीं करते और अपने सहयोगियों को छोटा समझते हैं, तो अंततः हार ही हाथ लगती है। उन्होंने तर्क दिया कि मतों के बिखराव ने अंततः विरोधी दल को मजबूती प्रदान की। बंगाल के नतीजों में एक और चौंकाने वाली बात मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अपनी ही सीट भवानीपुर से हार रही। उन्हें उनके पूर्व सहयोगी और अब विरोधी खेमे के दिग्गज नेता शुभेंदु अधिकारी ने करीब 15,000 से अधिक मतों के अंतर से पराजित किया। इस हार को लेकर संजय राउत ने टिप्पणी की कि जब शीर्ष नेतृत्व ही अपनी सीट नहीं बचा पाता, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि जनता का विश्वास डगमगा चुका है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस और वामदलों के साथ गठबंधन न करने की जिद ने ही तृणमूल के पारंपरिक वोट बैंक में सेंधमारी का रास्ता साफ किया। अगर गठबंधन होता, तो अल्पसंख्यक और धर्मनिरपेक्ष वोटों का विभाजन रुक सकता था।
मतों के ध्रुवीकरण और बिखराव का खेल
इस चुनाव में पश्चिम बंगाल के उन जिलों में भी तृणमूल कांग्रेस को भारी नुकसान उठाना पड़ा है, जिन्हें उसका गढ़ माना जाता था। मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर जैसे मुस्लिम बहुल इलाकों में भी इस बार तृणमूल का दबदबा वैसा नहीं रहा जैसा 2021 में था। यहां कांग्रेस और अन्य छोटे दलों के अलग चुनाव लड़ने से विपक्ष के वोट बंट गए, जिसका सीधा फायदा बहुमत पाने वाले दल को मिला। संजय राउत इसी गणित की ओर इशारा कर रहे थे कि एकता के बिना मजबूत किले भी ढह जाते हैं। संजय राउत ने चुनावों में धांधली के आरोपों को भी हवा दी। उन्होंने राहुल गांधी के उस बयान का समर्थन किया जिसमें उन्होंने कहा था कि कई राज्यों में चुनाव 'चोरी' किए जा रहे हैं। राउत ने दावा किया कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में जिस तरह से मतदाता सूचियों से नाम काटे गए और विशेष पुनरीक्षण के नाम पर लाखों लोगों को मताधिकार से वंचित किया गया, वह लोकतंत्र की हत्या है। उन्होंने कहा कि केवल मतदान के दिन ही नहीं, बल्कि चुनाव की तैयारी के दौरान ही खेल शुरू कर दिया गया था। उनके अनुसार, राहुल गांधी ने पहले ही इन खतरों के प्रति सचेत किया था, लेकिन क्षेत्रीय नेताओं ने अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के आगे इन चेतावनियों को दरकिनार कर दिया।
चुनाव परिणाम आने के बाद ममता बनर्जी ने भी निर्वाचन आयोग पर गंभीर आरोप लगाए थे और इसे 'नैतिक हार' के बजाय 'लूट' बताया था। हालांकि, संजय राउत ने इस पर पलटवार करते हुए कहा कि केवल आरोप लगाने से काम नहीं चलेगा। उन्होंने सवाल उठाया कि जब चुनाव से पहले एकता की बात हो रही थी, तब तृणमूल कांग्रेस ने सहयोग क्यों नहीं किया? राउत ने कहा कि विपक्षी गठबंधन (INDIA) का भविष्य अभी भी उज्ज्वल है, लेकिन इसके लिए सभी दलों को अपने मतभेदों को भुलाकर एक साथ आना होगा। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर आने वाले समय में भी इसी तरह की गुटबाजी जारी रही, तो अन्य राज्यों में भी विपक्षी दलों को इसी तरह के झटकों का सामना करना पड़ सकता है। पश्चिम बंगाल की राजनीति में आए इस बड़े बदलाव ने राष्ट्रीय राजनीति के समीकरणों को भी प्रभावित किया है। 15 साल की सत्ता विरोधी लहर (एंटी-इंकंबेंसी) और भ्रष्टाचार के आरोपों ने तृणमूल कांग्रेस की जड़ों को कमजोर कर दिया था। इसके बावजूद, ममता बनर्जी को भरोसा था कि उनकी 'माटी-मानुष' की अपील काम कर जाएगी। लेकिन आंकड़ों से पता चलता है कि महिला मतदाताओं और युवाओं का एक बड़ा वर्ग इस बार बदलाव के पक्ष में खड़ा था। संजय राउत का मानना है कि इस बदलाव की आहट राहुल गांधी को पहले ही मिल गई थी, इसीलिए वे बार-बार समझौते की मेज पर बैठने की बात कर रहे थे।
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