भारतीय सनातन धर्म में अखंड सौभाग्य और पति की दीर्घायु की कामना का सबसे महान पर्व, वट सावित्री व्रत की पौराणिक कथा और इसका धार्मिक महत्व
भारतीय सनातन संस्कृति और हिंदू धर्म में महिलाओं द्वारा किए जाने वाले तमाम कठिन व्रतों और उपवासों में वट सावित्री व्रत
- यमराज के अकाट्य विधान को भी अपने तपोबल से बदलने वाली सती सावित्री का चरित्र, जिसने मृत्यु के पाश से छुड़ाए अपने पति सत्यवान के प्राण
- वट वृक्ष के नीचे कठिन साधना और बुद्धिमत्ता से यमराज को पराजित करने की अमर गाथा, जिसके बिना अधूरा माना जाता है सौभाग्य का यह महापर्व
भारतीय सनातन संस्कृति और हिंदू धर्म में महिलाओं द्वारा किए जाने वाले तमाम कठिन व्रतों और उपवासों में वट सावित्री व्रत को अखंड सौभाग्य, पारिवारिक समृद्धि और वैवाहिक अटूटता का सबसे बड़ा और पवित्र प्रतीक माना जाता है। ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि को पूरी श्रद्धा, निष्ठा और उमंग के साथ मनाए जाने वाले इस महापर्व का धार्मिक आधार पूरी तरह से सती सावित्री और उनके पति सत्यवान की उस अलौकिक तथा कालजयी पौराणिक कथा पर टिका हुआ है, जिसने यह सिद्ध कर दिया था कि यदि पतिव्रता धर्म और संकल्प में सच्ची शक्ति हो, तो मृत्यु के देवता यमराज को भी अपने कड़े और अकाट्य विधान को बदलकर पीछे हटना पड़ता है। हिंदू शास्त्रों और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस विशिष्ट दिन पर वट वृक्ष यानी बरगद के पेड़ की पूजा-अर्चना करने और सूत के धागे को तने के चारों ओर लपेटने का विधान तब तक पूरी तरह से अपूर्ण और निष्फल माना जाता है, जब तक कि व्रती महिलाएं श्रद्धापूर्वक सावित्री और सत्यवान के इस पावन चरित्र और उनके संघर्ष की पूरी अमर कहानी का श्रवण या वाचन नहीं कर लेती हैं।
इस अलौकिक पौराणिक महागाथा की शुरुआत प्राचीन काल के मद्र देश से होती है, जहां अश्वपति नाम के एक परम प्रतापी, धर्मात्मा और न्यायप्रिय राजा का शासन हुआ करता था। राजा अश्वपति का जीवन हर प्रकार के सुख-वैभव से परिपूर्ण था, लेकिन संतान न होने के कारण उनके मन में हमेशा एक गहरा दुख और खालीपन बना रहता था। संतान प्राप्ति की तीव्र इच्छा के लिए उन्होंने कई वर्षों तक कठिन तपस्या की और प्रतिदिन गायत्री मंत्र के साथ यज्ञ-हवन किए, जिससे प्रसन्न होकर आदिमाता सावित्री ने उन्हें एक अत्यंत तेजस्वी और गुणवान पुत्री का वरदान दिया। राजा के घर जब इस दिव्य कन्या का जन्म हुआ, तो देवी सावित्री की कृपा के कारण ही इसका नाम 'सावित्री' रखा गया। समय बीतने के साथ सावित्री जैसे-जैसे बड़ी हुई, उसके रूप, लावण्य और उच्च नैतिक संस्कारों की कीर्ति चारों दिशाओं में फैल गई, लेकिन उसका तेज इतना प्रखर था कि कोई भी राजकुमार उससे विवाह का प्रस्ताव लेकर सामने आने का साहस नहीं कर पाता था, जिसके बाद राजा ने अपनी पुत्री को स्वयं अपना वर चुनने की अनुमति प्रदान की। हिंदू धर्म ग्रंथों में वट वृक्ष यानी बरगद के पेड़ को साक्षात त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) का वास स्थल माना गया है। इसकी विशाल जटाएं, गहरी जड़ें और सैकड़ों वर्षों की लंबी आयु इसे अमरता और स्थिरता का प्रतीक बनाती हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, जब यमराज सत्यवान के प्राण हरकर ले जा रहे थे, तब सावित्री ने अपने पति के अचेतन शरीर को इसी वट वृक्ष की छांव में सुरक्षित रखा था, यही कारण है कि इस व्रत में बरगद के पेड़ की पूजा का विशेष और अनिवार्य महत्व है।
सावित्री अपने मंत्रियों और अंगरक्षकों के साथ एक उचित और सुयोग्य जीवनसाथी की खोज में देश के विभिन्न राज्यों, नगरों और घने जंगलों में स्थित ऋषियों के आश्रमों के भ्रमण पर निकल पड़ी। इसी यात्रा के दौरान उसकी मुलाकात द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान से हुई, जो शाल्व देश के राजा थे, लेकिन शत्रुओं द्वारा उनका राज्य छीन लिए जाने के कारण वे अंधे हो चुके थे और अपनी पत्नी तथा पुत्र के साथ जंगलों में बेहद सादगीपूर्ण कुटिया बनाकर रह रहे थे। सत्यवान अपने माता-पिता की सेवा में पूरी तरह से समर्पित थे और उनका चरित्र बेहद शांत, विनीत और धर्मपरायण था। सत्यवान के इन्हीं उच्च मानवीय गुणों, उनकी सादगी और माता-पिता के प्रति अगाध भक्ति को देखकर सावित्री ने मन ही मन उन्हें अपने पति के रूप में स्वीकार कर लिया और वापस आकर अपने पिता को अपने इस अंतिम निर्णय से अवगत कराया।
जब सावित्री राजा अश्वपति के दरबार में अपने वर के चयन की घोषणा कर रही थीं, ठीक उसी समय वहां देवर्षि नारद का आगमन हुआ। सावित्री की पसंद को सुनकर देवर्षि नारद अचानक अत्यंत चिंतित और गंभीर हो गए और उन्होंने राजा अश्वपति को सचेत करते हुए एक अत्यंत दुखद भविष्यवाणी की। नारद मुनी ने बताया कि यद्यपि सत्यवान सर्वगुण संपन्न हैं और उनका चरित्र राजा भोज जैसा उदार है, लेकिन आनुवंशिक और ज्योतिषीय गणना के अनुसार वे अल्पायु हैं और आज से ठीक एक वर्ष के भीतर उनकी मृत्यु निश्चित है। इस भयानक और हृदयविदारक सत्य को जानने के बाद राजा अश्वपति पूरी तरह से घबरा गए और उन्होंने सावित्री को अपना विचार बदलने और किसी अन्य दीर्घायु राजकुमार को चुनने के लिए बहुत समझाया, लेकिन सावित्री अपने फैसले पर अडिग रही और उसने कहा कि भारतीय नारी अपने जीवन में केवल एक ही बार पति का वरण करती है।
पिता की विवशता और देवर्षि नारद की उस भयानक भविष्यवाणी को शिरोधार्य करते हुए सावित्री का विवाह अत्यंत साधारण तरीके से वन में ही सत्यवान के साथ संपन्न हो गया। विवाह के पश्चात सावित्री ने राजसी ठाट-बाट और कीमती वस्त्रों का पूरी तरह त्याग कर दिया और अपनी अंधी सास तथा ससुर की सेवा में खुद को पूरी तरह झोंक दिया। वह दिन-रात अपने पति के साथ रहकर वन के कठिन जीवन को हँसते-हँसते जीने लगी, लेकिन उसके मन में देवर्षि नारद द्वारा बताई गई वह अंतिम तिथि एक कांटे की तरह हमेशा चुभती रहती थी। जैसे-जैसे वह नियत दिन नजदीक आने लगा, सावित्री ने अपने पति के प्राणों की रक्षा के लिए तीन दिन पूर्व से ही 'त्रिगुण व्रत' यानी अत्यंत कठिन निराहार उपवास और कठोर तपस्या शुरू कर दी, जिससे उसका अंतर्मन आध्यात्मिक ऊर्जा और सतीत्व की शक्ति से पूरी तरह से संपन्न हो गया।
आखिरकार वह संकट की घड़ी और नियत दिन भी आ पहुंचा, जब सत्यवान की जीवन लीला समाप्त होने वाली थी। उस दिन सत्यवान रोज की तरह जंगल में लकड़ियां काटने और फल-फूल एकत्र करने के लिए जाने लगा, तो सावित्री ने भी अपने ससुर से विशेष अनुमति ली और अपने पति के साथ वन जाने की जिद पर अड़ गई। जंगल में लकड़ी काटते समय अचानक सत्यवान के सिर में असहनीय दर्द होने लगा और वह अत्यधिक व्याकुल होकर पेड़ से नीचे उतर आया। सावित्री ने तनिक भी समय गंवाए बिना अपने पति के सिर को अपनी गोद में रख लिया और वट वृक्ष के नीचे बैठ गई, तभी वहां साक्षात मृत्यु के देवता यमराज अपने भयानक रूप में काल पाश लेकर प्रकट हुए। यमराज ने सत्यवान के शरीर से उसके सूक्ष्म प्राण को निकाला और दक्षिण दिशा की ओर बढ़ने लगे, जिसे देख सावित्री भी अपने तपोबल के सहारे यमराज के पीछे-पीछे चल पड़ी।
यमराज ने जब एक साधारण मानव स्त्री को अपने पीछे आते देखा, तो उन्होंने उसे वापस लौट जाने और अपने पति का अंतिम संस्कार करने की नसीहत दी। इस पर सावित्री ने अत्यंत विनम्रता और बुद्धिमत्तापूर्ण संवाद करते हुए कहा कि जहाँ पति जाते हैं, वहां पत्नी को जाना ही पड़ता है, यही सनातन धर्म का नियम है। सावित्री के इस अटूट पातिव्रत्य धर्म, तार्किक ज्ञान और मधुर वचनों से प्रसन्न होकर यमराज ने उसे सत्यवान के प्राणों को छोड़कर कोई भी तीन वरदान मांगने को कहा। सावित्री ने पहले वरदान में अपने ससुर की आंखों की रोशनी और खोया हुआ राज्य वापस मांगा, और दूसरे वरदान में अपने पिता के लिए सौ पुत्रों का वरदान प्राप्त किया। अंतिम और तीसरे वरदान में सावित्री ने चतुराई दिखाते हुए यमराज से स्वयं के लिए सौ यशस्वी पुत्रों की माता बनने का आशीर्वाद मांग लिया, जिसे यमराज ने बिना सोचे-समझे 'तथास्तु' कहकर स्वीकार कर लिया।
वरदान देने के तुरंत बाद जब यमराज आगे बढ़े, तो सावित्री ने उन्हें रोककर विनम्रतापूर्वक याद दिलाया कि एक पतिव्रता नारी अपने पति के बिना किसी अन्य पुरुष के सहयोग से पुत्रों को जन्म नहीं दे सकती, और चूंकि यमराज ने खुद उसे सौ पुत्रों की माता बनने का आशीर्वाद दिया है, इसलिए उन्हें अपने ही वचन की रक्षा के लिए सत्यवान के प्राणों को वापस लौटाना ही होगा। यमराज सावित्री की इस अद्भुत बुद्धिमत्ता, अकाट्य तर्कशक्ति और अगाध प्रेम के आगे पूरी तरह से निरुत्तर हो गए और उन्होंने सहर्ष सत्यवान के सूक्ष्म प्राणों को पाश से मुक्त कर दिया। सावित्री तुरंत वापस उसी वट वृक्ष के पास लौटी जहां सत्यवान का मृत शरीर रखा था, और जैसे ही उसने अपने पति के शरीर को छुआ, सत्यवान मानो गहरी नींद से जागते हुए जीवित हो उठा। यह पावन कथा संदेश देती है कि सच्ची निष्ठा और दृढ़ संकल्प से संसार की किसी भी विषम परिस्थिति पर विजय प्राप्त की जा सकती है।
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