अश्वगंधा के उपयोग पर FSSAI की नई गाइडलाइन, सेहत के नाम पर कहीं आप जहर तो नहीं खा रहे?

भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने हाल ही में आयुर्वेद की सबसे प्रसिद्ध जड़ी-बूटियों में से एक, अश्वगंधा के व्यावसायिक

Apr 22, 2026 - 11:56
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अश्वगंधा के उपयोग पर FSSAI की नई गाइडलाइन, सेहत के नाम पर कहीं आप जहर तो नहीं खा रहे?
अश्वगंधा के उपयोग पर FSSAI की नई गाइडलाइन, सेहत के नाम पर कहीं आप जहर तो नहीं खा रहे?
  • सावधान! हर किसी के लिए सुरक्षित नहीं है अश्वगंधा, खाद्य सुरक्षा नियामक ने पैकेट पर चेतावनी लिखना किया अनिवार्य
  • आयुर्वेद का 'सुपरफूड' अब नियमों के दायरे में: अश्वगंधा सप्लीमेंट्स को लेकर सरकार ने कड़े किए मानक, तय की निर्धारित मात्रा

भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने हाल ही में आयुर्वेद की सबसे प्रसिद्ध जड़ी-बूटियों में से एक, अश्वगंधा के व्यावसायिक उपयोग और इसके उपभोग को लेकर बेहद महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। बाजार में हेल्थ सप्लीमेंट्स और न्यूट्रास्युटिकल्स की बढ़ती मांग के बीच, नियामक ने पाया है कि अश्वगंधा का अनियंत्रित और अत्यधिक उपयोग स्वास्थ्य के लिए जोखिम भरा हो सकता है। नए निर्देशों के अनुसार, अब उन सभी कंपनियों को अपने उत्पादों पर स्पष्ट चेतावनी और विस्तृत जानकारी देनी होगी जो अश्वगंधा को एक घटक के रूप में इस्तेमाल कर रही हैं। यह कदम उपभोक्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने और उन्हें इस शक्तिशाली जड़ी-बूटी के संभावित दुष्प्रभावों के प्रति सचेत करने के लिए उठाया गया है। अब तक इसे केवल एक लाभकारी जड़ी-बूटी माना जाता था, लेकिन वैज्ञानिक शोधों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह पर FSSAI ने इसके नियमन की आवश्यकता महसूस की है। अश्वगंधा, जिसे वैज्ञानिक रूप से 'विथानिया सोमनिफेरा' कहा जाता है, अपने तनाव कम करने और शारीरिक शक्ति बढ़ाने वाले गुणों के लिए जाना जाता है। हालांकि, FSSAI के नए दिशा-निर्देशों में विशेष रूप से उन संवेदनशील समूहों का उल्लेख किया गया है जिन्हें इसके सेवन से बचना चाहिए या डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए। नियामक ने स्पष्ट किया है कि गर्भवती महिलाओं, स्तनपान कराने वाली माताओं और उन व्यक्तियों को जिन्हें लीवर या गुर्दे से संबंधित समस्याएं हैं, अश्वगंधा युक्त सप्लीमेंट्स का सेवन करते समय अत्यंत सावधानी बरतनी चाहिए। कंपनियों को अब अपने उत्पादों के लेबल पर बड़े अक्षरों में यह लिखना होगा कि "गर्भवती महिलाएं इस उत्पाद का सेवन न करें" या "चिकित्सीय परामर्श के बाद ही उपयोग करें"। यह निर्देश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अश्वगंधा में मौजूद सक्रिय तत्व शरीर के हार्मोनल संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं, जो कुछ स्थितियों में प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं।

क्यों जरूरी है सावधानी?

आयुर्वेदिक ग्रंथों और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान दोनों का मानना है कि अश्वगंधा एक 'एडाप्टोजेन' है, जो शरीर को तनाव से लड़ने में मदद करता है। लेकिन, इसकी जड़ और पत्तियों के अर्क में विथनोलाइड्स जैसे यौगिक होते हैं, जो यदि अधिक मात्रा में लिए जाएं, तो गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल समस्याएं, उल्टी या लीवर एंजाइम में असंतुलन पैदा कर सकते हैं। FSSAI ने इसी वैज्ञानिक आधार पर इसकी खुराक और लेबलिंग को सख्त बनाया है।

नियामक ने अश्वगंधा की दैनिक खुराक की ऊपरी सीमा भी निर्धारित करने का निर्देश दिया है। अब सप्लीमेंट निर्माताओं को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके उत्पाद में अश्वगंधा की मात्रा सुरक्षित मानकों के भीतर हो और इसका स्पष्ट उल्लेख पैकेट के पीछे 'न्यूट्रिशनल इंफॉर्मेशन' कॉलम में किया जाए। अक्सर देखा गया है कि कंपनियां अपने उत्पादों को अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए उच्च सांद्रता (High Concentration) वाले अर्क का उपयोग करती हैं, जो लंबे समय तक लेने पर शरीर के आंतरिक अंगों पर दबाव डाल सकता है। FSSAI ने कंपनियों को यह भी हिदायत दी है कि वे अश्वगंधा के फायदों को लेकर भ्रामक दावे न करें। यदि कोई ब्रांड इसे किसी बीमारी के इलाज के रूप में प्रचारित करता है, तो उसके पास पर्याप्त नैदानिक साक्ष्य (Clinical Evidence) होने चाहिए, अन्यथा उन पर भारी जुर्माना लगाया जा सकता है।

एक और महत्वपूर्ण बिंदु जो इन निर्देशों में शामिल है, वह है कच्चे माल की गुणवत्ता और शुद्धता। FSSAI ने निर्माताओं को निर्देश दिया है कि वे केवल उन्हीं स्रोतों से अश्वगंधा खरीदें जो मानक गुणवत्ता परीक्षणों को पूरा करते हों। इसमें भारी धातुओं (जैसे सीसा, पारा और आर्सेनिक) और कीटनाशकों के अवशेषों की जांच अनिवार्य कर दी गई है। जड़ी-बूटियों के प्रसंस्करण के दौरान अक्सर स्वच्छता के मानकों की अनदेखी की जाती है, जिससे संक्रमण का खतरा रहता है। नए नियमों के तहत, कंपनियों को बैच-वार परीक्षण रिपोर्ट तैयार रखनी होगी ताकि आवश्यकता पड़ने पर नियामक इसकी जांच कर सके। इस कदम से बाजार में मौजूद मिलावटी और घटिया गुणवत्ता वाले अश्वगंधा उत्पादों पर लगाम लगने की उम्मीद है। FSSAI के इस निर्देश का असर उन उद्योगों पर व्यापक रूप से पड़ेगा जो चाय, कॉफी, एनर्जी ड्रिंक्स और यहां तक कि चॉकलेट में भी अश्वगंधा का उपयोग कर रहे हैं। अब इन 'फोर्टिफाइड' खाद्य पदार्थों को भी उसी कड़े लेबलिंग नियमों का पालन करना होगा। नियामक ने स्पष्ट किया है कि अश्वगंधा कोई साधारण मसाला नहीं है जिसे किसी भी मात्रा में किसी भी खाद्य पदार्थ में मिला दिया जाए। इसके औषधीय गुण इसे एक 'ड्रग' जैसी संवेदनशीलता प्रदान करते हैं, इसलिए इसका उपयोग खाद्य उत्पादों में केवल एक सीमित और सुरक्षित सीमा तक ही किया जा सकता है। उपभोक्ताओं को भी सलाह दी गई है कि वे पैकेट पर लिखे 'इंग्रेडिएंट्स' को ध्यान से पढ़ें और अपनी स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार ही चुनाव करें।

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