सुप्रीम कोर्ट ने बच्ची को पिता के खिलाफ भड़काने पर मां को लगाई फटकार।
Supreme Court News: सुप्रीम कोर्ट ने एक पति-पत्नी विवाद के मामले में बच्ची को पिता के खिलाफ भड़काने वाली मां को कड़ी नसीहत दी। कोर्ट ने कहा....
सुप्रीम कोर्ट ने एक पति-पत्नी विवाद के मामले में बच्ची को पिता के खिलाफ भड़काने वाली मां को कड़ी नसीहत दी। कोर्ट ने कहा, "आप कैसे एक बच्ची के दिमाग को खराब कर सकती हैं? आपने उसका भविष्य और करियर तबाह करने की कोशिश की है। इसका नतीजा आपको भुगतना पड़ सकता है।" यह मामला बच्ची की कस्टडी को लेकर था, जिसमें मां ने जिला अदालत के आदेश का पालन नहीं किया और बच्ची को पिता के खिलाफ उकसाया, जिसके चलते बच्ची ने अपने पिता पर डंडे से हमला कर दिया। इस घटना के बाद पिता ने सुप्रीम कोर्ट में अवमानना का केस दायर किया।
यह मामला सौरभ सोनी और उनकी पत्नी नीतिका धर के बीच चल रहे वैवाहिक विवाद से जुड़ा है। जिला अदालत ने आदेश दिया था कि नीतिका बच्ची की कस्टडी पिता सौरभ को सौंप दें। हालांकि, नीतिका ने इस आदेश का पालन नहीं किया। इसके बजाय, उन्होंने बच्ची को पिता के खिलाफ भड़काया। हालात इतने बिगड़ गए कि बच्ची ने अपने पिता की डंडे से पिटाई कर दी। इस घटना को लेकर सौरभ ने सुप्रीम कोर्ट में अवमानना का केस दायर किया।
सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई की अगुवाई वाली बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। कोर्ट ने नीतिका को फटकार लगाते हुए कहा कि वह बच्ची को इस विवाद में घसीट रही हैं, जिससे उसका मानसिक स्वास्थ्य और भविष्य खराब हो रहा है। कोर्ट ने यह भी बताया कि बच्ची ने पिता के साथ रहने के लिए एक करोड़ रुपये की मांग की, जो मां के उकसावे का नतीजा था।
मुख्य न्यायाधीश ने नीतिका से कहा, "आप बेवजह बच्ची को इस झगड़े में शामिल कर रही हैं। इससे उसका करियर और जिंदगी बर्बाद हो सकती है।" कोर्ट ने साफ किया कि बच्ची के हित को सबसे ऊपर रखा जाना चाहिए। उन्होंने नीतिका को चेतावनी दी कि अगर उन्होंने सहमति से बच्ची की कस्टडी पिता को नहीं सौंपी, तो अवमानना के मामले में उन्हें छह महीने तक जेल हो सकती है। सौरभ के वकील ने कोर्ट में कहा कि वह नीतिका के खिलाफ कोई सजा नहीं चाहते। उनका मकसद सिर्फ अपनी बेटी के साथ समय बिताना और उसका भविष्य सुरक्षित करना है। कोर्ट ने इस मामले को सुलझाने के लिए मध्यस्थता का आदेश दिया, ताकि दोनों पक्ष मिलकर बच्ची के हित में कोई रास्ता निकाल सकें।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में बच्ची के मानसिक स्वास्थ्य पर खास ध्यान दिया। कोर्ट ने कहा कि माता-पिता के बीच विवाद में बच्चों को शामिल करना उनके लिए हानिकारक है। यह मामला उन कई उदाहरणों में से एक है, जहां तलाक या वैवाहिक झगड़ों में बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। कोर्ट ने पहले भी ऐसे मामलों में बच्चे के हित को प्राथमिकता देने की बात कही है। उदाहरण के लिए, एक अन्य केस में सुप्रीम कोर्ट ने 12 साल के बच्चे की कस्टडी मां को दी थी, क्योंकि पिता के साथ रहने से बच्चे का मानसिक स्वास्थ्य खराब हो रहा था।
यह मामला दर्शाता है कि वैवाहिक विवादों में बच्चों का इस्तेमाल करना कितना गलत है। विशेषज्ञों का कहना है कि माता-पिता को अपने बच्चों को ऐसे झगड़ों से दूर रखना चाहिए। बच्चों के मानसिक विकास के लिए पौष्टिक भोजन और स्वस्थ माहौल जरूरी है। कुछ अध्ययनों के अनुसार, हरी सब्जियां, अंडे, और मेवे जैसे खाद्य पदार्थ बच्चों के दिमाग को तेज करने में मदद करते हैं। हालांकि, इस मामले में बच्ची का व्यवहार मां के उकसावे का नतीजा था, न कि किसी पोषण की कमी का। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला बच्चों के हित को प्राथमिकता देने का एक मजबूत संदेश देता है। माता-पिता को अपने निजी विवादों में बच्चों को शामिल करने से बचना चाहिए। इस मामले में कोर्ट ने मध्यस्थता का रास्ता सुझाया, जो बच्ची के लिए बेहतर भविष्य सुनिश्चित कर सकता है।
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