आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बढ़ती प्यास- इंसानों से ज्यादा पी रहा पानी, डेटा सेंटर्स पानी की खपत से पर्यावरण पर मंडरा रहा खतरा।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के तेजी से विकास और उपयोग ने डेटा सेंटर्स की संख्या और आकार में भारी वृद्धि की है, जिससे पानी की खपत एक
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के तेजी से विकास और उपयोग ने डेटा सेंटर्स की संख्या और आकार में भारी वृद्धि की है, जिससे पानी की खपत एक प्रमुख पर्यावरणीय चिंता बन गई है। डेटा सेंटर्स में सर्वर्स को ठंडा रखने के लिए बड़ी मात्रा में पानी का उपयोग होता है, जिसमें मुख्य रूप से इवैपोरेटिव कूलिंग प्रक्रिया शामिल है जहां पानी वाष्पीकृत होकर गर्मी को बाहर निकालता है। इस प्रक्रिया में उपयोग किया गया अधिकांश पानी वाष्प बनकर वायुमंडल में चला जाता है और वापस नहीं आता, जिसे पानी की खपत माना जाता है। इसके अलावा, डेटा सेंटर्स को बिजली सप्लाई करने वाले पावर प्लांट्स भी पानी का उपयोग करते हैं, जो अप्रत्यक्ष खपत का बड़ा हिस्सा है। अध्ययनों के अनुसार, एआई कार्यों के कारण डेटा सेंटर्स की पानी की खपत तेजी से बढ़ रही है। एक अनुमान के मुताबिक, 2025 में एआई सिस्टम्स की पानी की खपत 765 अरब लीटर तक पहुंच सकती है, जो वैश्विक बोतलबंद पानी की वार्षिक खपत से अधिक है। यह खपत डायरेक्ट कूलिंग और इंडायरेक्ट बिजली उत्पादन दोनों से आती है। उदाहरण के लिए, चैटजीपीटी जैसे मॉडल्स में एक साधारण क्वेरी के लिए कुछ मिलीलीटर पानी की जरूरत पड़ती है, लेकिन अरबों क्वेरीज़ को मिलाकर यह मात्रा बहुत बड़ी हो जाती है।
डेटा सेंटर्स में कूलिंग के लिए मुख्य रूप से इवैपोरेटिव कूलिंग का उपयोग होता है, जिसमें पानी को गर्म हवा से गुजारकर वाष्पीकृत किया जाता है। इस प्रक्रिया में निकाला गया पानी का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा वाष्प बनकर खो जाता है। अमेरिका में डेटा सेंटर्स की डायरेक्ट पानी खपत 2023 में करीब 66 अरब लीटर थी, जो 2014 की तुलना में काफी अधिक है। वैश्विक स्तर पर डेटा सेंटर्स सालाना 560 अरब लीटर पानी का उपयोग करते हैं, और 2030 तक यह 1200 अरब लीटर तक पहुंच सकता है। एआई ट्रेनिंग और इंफरेंस दोनों पानी की खपत बढ़ाते हैं। जीपीटी-3 जैसे मॉडल की ट्रेनिंग में लाखों लीटर पानी की जरूरत पड़ती है, जबकि इंफरेंस में प्रति 10-50 क्वेरीज़ में 500 मिलीलीटर तक पानी खर्च हो सकता है। हालांकि, नए अनुमानों में प्रति क्वेरी पानी की खपत बहुत कम बताई गई है, लेकिन कुल मिलाकर अरबों उपयोगकर्ताओं के कारण यह प्रभावशाली है। कंपनियां जैसे माइक्रोसॉफ्ट और गूगल की पानी खपत में 2021-2022 से 34 प्रतिशत और 20 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जो मुख्य रूप से एआई कार्यों से जुड़ी है।
पानी की यह खपत विशेष रूप से उन क्षेत्रों में समस्या पैदा कर रही है जहां पहले से पानी की कमी है। अमेरिका के कई डेटा सेंटर्स पानी की तनावग्रस्त क्षेत्रों में स्थित हैं, जहां बिजली उत्पादन के लिए पानी-गहन प्लांट्स का उपयोग होता है। इंडायरेक्ट खपत डायरेक्ट से अधिक होती है, लगभग 60 प्रतिशत। कुछ क्षेत्रों में डेटा सेंटर्स स्थानीय पानी सप्लाई का बड़ा हिस्सा उपयोग कर रहे हैं, जिससे स्थानीय समुदायों पर दबाव पड़ता है। एआई की बढ़ती मांग से डेटा सेंटर्स की संख्या बढ़ रही है, और कई नए सेंटर्स पानी की कमी वाले क्षेत्रों में बनाए जा रहे हैं। इससे पानी की कमी, सूखा और जलवायु परिवर्तन की समस्याएं बढ़ सकती हैं। अनुमान है कि अमेरिकी डेटा सेंटर्स की पानी खपत दशक के अंत तक 10 मिलियन अमेरिकियों की वार्षिक खपत के बराबर हो सकती है। वैश्विक स्तर पर एआई की पानी खपत 2027 तक 4.2 से 6.6 अरब क्यूबिक मीटर तक पहुंच सकती है।
डेटा सेंटर्स की कूलिंग में पानी का उपयोग मुख्य रूप से ताजे पानी से होता है, जो पीने योग्य होता है। चिप निर्माण में भी पानी की जरूरत पड़ती है। कंपनियां 2030 तक पानी पॉजिटिव बनने का लक्ष्य रख रही हैं, अर्थात वे जितना पानी उपयोग करेंगे उससे अधिक वापस पर्यावरण में डालेंगी। कुछ नए डिजाइन्स में जीरो इवैपोरेशन कूलिंग का उपयोग हो रहा है, जहां पानी को क्लोज्ड लूप में रीसर्कुलेट किया जाता है। लिक्विड कूलिंग जैसी तकनीकें पानी की खपत कम कर सकती हैं, क्योंकि ये सीधे चिप्स से गर्मी निकालती हैं और इवैपोरेशन की जरूरत कम करती हैं। एयर कूलिंग या इमर्शन कूलिंग भी विकल्प हैं। डेटा सेंटर्स को पानी प्रचुर क्षेत्रों में स्थानांतरित करने या नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग बढ़ाने से पानी और कार्बन फुटप्रिंट कम हो सकता है।
एआई की पानी खपत का अधिकांश हिस्सा बिजली उत्पादन से जुड़ा है, इसलिए ग्रिड को डीकार्बनाइज करने से अप्रत्यक्ष पानी खपत कम होगी। कुछ अध्ययनों में मिडवेस्टर्न अमेरिकी राज्यों को एआई इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए उपयुक्त बताया गया है, जहां पानी और नवीकरणीय ऊर्जा उपलब्ध है। पारदर्शिता की कमी एक समस्या है, क्योंकि कंपनियां पूरी जानकारी नहीं देतीं। एआई का पर्यावरणीय प्रभाव स्थानीय और वैश्विक दोनों स्तरों पर है। पानी की कमी वाले क्षेत्रों में डेटा सेंटर्स बनाने से स्थानीय जल स्रोतों पर दबाव पड़ता है। वैश्विक बोतलबंद पानी की खपत से अधिक एआई की पानी खपत होने के अनुमान चिंता बढ़ाते हैं। हालांकि, एआई खुद पानी प्रबंधन में मदद कर सकता है, जैसे सिंचाई अनुकूलन या रिसाव पता लगाना।
कुल मिलाकर, एआई की बढ़ती पानी खपत पर्यावरण के लिए चुनौती है, विशेष रूप से जलवायु परिवर्तन और पानी की कमी के संदर्भ में। डेटा सेंटर्स की डिजाइन, स्थान और ऊर्जा स्रोतों में बदलाव से इस प्रभाव को कम किया जा सकता है। अनुमान बताते हैं कि उचित योजना से कार्बन और पानी खपत में काफी कमी संभव है।
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