02 अक्टूबर विशेष : लाल बहादुर शास्त्री को ब्रिटिश जेल में कुल सात वर्ष बिताने पड़े, जानिए सादगी और साहस के प्रतीक शास्त्री के जीवन के अनकहे पहलू

बचपन से ही शास्त्री जी में साहस और जिम्मेदारी का भाव था। वे अपने चचेरे भाई बिंदेश्वरी प्रसाद के साथ वाराणसी चले गए, जहां उन्होंने ईस्ट सेंट्रल रेलवे इंटर कॉलेज औ

Oct 2, 2025 - 09:30
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02 अक्टूबर विशेष : लाल बहादुर शास्त्री को ब्रिटिश जेल में कुल सात वर्ष बिताने पड़े, जानिए सादगी और साहस के प्रतीक शास्त्री के जीवन के अनकहे पहलू

आज, दो अक्टूबर 2025 को, भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की जयंती है। उनका जन्म 1904 में हुआ था और वे एक ऐसे नेता थे जिन्होंने अपनी सादगी, ईमानदारी और देशभक्ति से लाखों लोगों के दिलों में जगह बनाई। शास्त्री जी का जीवन संघर्षों से भरा था, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। वे महात्मा गांधी के सिद्धांतों के प्रबल अनुयायी थे और स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाई। उनके नारे 'जय जवान जय किसान' ने आज भी देशवासियों को प्रेरित किया है। इस विशेष अवसर पर, आइए उनके जीवन की प्रमुख घटनाओं, उपलब्धियों और विरासत को विस्तार से जानें।

लाल बहादुर शास्त्री का जन्म दो अक्टूबर 1904 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय नामक एक छोटे से रेलवे शहर में हुआ था। यह स्थान वाराणसी से मात्र सात मील दूर है। उनके पिता शारदा प्रसाद श्रीवास्तव एक स्कूल शिक्षक थे, जो बाद में प्रयागराज के राजस्व कार्यालय में क्लर्क बन गए। लेकिन शास्त्री जी के जन्म के डेढ़ वर्ष बाद ही उनके पिता की मृत्यु हो गई। यह एक कठिन समय था। उनकी मां रामदुलारी देवी ने तीन बच्चों की जिम्मेदारी संभाली। बड़े भाई-बहन कालसी देवी और छोटी बहन सुंदरी देवी के साथ वे नानीहाल चले गए। वहां उनके नाना मुनशी हजारी लाल, जो एक हेडमास्टर थे, ने उनका पालन-पोषण किया। परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी, लेकिन शिक्षा पर कभी समझौता नहीं किया गया।

बचपन से ही शास्त्री जी में साहस और जिम्मेदारी का भाव था। वे अपने चचेरे भाई बिंदेश्वरी प्रसाद के साथ वाराणसी चले गए, जहां उन्होंने ईस्ट सेंट्रल रेलवे इंटर कॉलेज और हरिश्चंद्र हाई स्कूल में पढ़ाई की। स्कूल जाने के लिए उन्हें कई मील पैदल चलना पड़ता था, लेकिन जूते न होने पर भी वे कभी शिकायत नहीं करते थे। 1917 में बिंदेश्वरी प्रसाद के तबादले के बाद पूरा परिवार वाराणसी आ गया। शास्त्री जी की प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही हुई, जहां उन्होंने संस्कृत और हिंदी सीखी। वे स्वामी विवेकानंद और महात्मा गांधी की रचनाओं से गहराई से प्रभावित हुए।

1921 में, जब वे मात्र 16 वर्ष के थे, तो गांधी जी के असहयोग आंदोलन ने उनके जीवन को बदल दिया। उन्होंने अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ दी और स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। यह फैसला उनके परिवार के लिए दुखद था, लेकिन शास्त्री जी अडिग रहे। उन्हें गिरफ्तार किया गया, लेकिन नाबालिग होने के कारण छोड़ दिया गया। इसके बाद वे काशी विद्यापीठ में दाखिला ले लिया, जो गांधी जी द्वारा स्थापित एक राष्ट्रवादी संस्थान था। वहां उन्होंने दर्शनशास्त्र और नैतिकता में प्रथम श्रेणी से स्नातक किया। विद्यापीठ ने उन्हें 'शास्त्री' की उपाधि दी, जो उनके नाम का हिस्सा बन गई। यह उपाधि उनके विद्वान होने का प्रमाण थी।

शास्त्री जी का वैवाहिक जीवन भी सादगी का प्रतीक था। 1927 में उनका विवाह मिर्जापुर की ललिता देवी से हुआ। शादी में कोई आडंबर नहीं था। दहेज के रूप में केवल एक चरखा और खादी का कपड़ा दिया गया। ललिता जी ने जीवन भर उनका साथ दिया और घर को सादगी से संभाला। दंपति के छह पुत्र-पुत्रियां हुईं। शास्त्री जी हमेशा परिवार को बताया करते थे कि सुख-दुख में सबको बराबर भागीदार बनना चाहिए।

स्वतंत्रता संग्राम में शास्त्री जी की भूमिका उल्लेखनीय रही। 1921 से ही वे कांग्रेस के स्वयंसेवक बने। वे लाला लाजपत राय द्वारा स्थापित 'सेवा भारती सोसाइटी' के आजीवन सदस्य बने और मुजफ्फरपुर में हरिजन कल्याण के लिए कार्य किया। 1930 में गांधी जी के दांडी मार्च ने पूरे देश को झकझोर दिया। शास्त्री जी ने कई विद्रोही अभियान चलाए। इसके लिए उन्हें ब्रिटिश जेल में कुल सात वर्ष बिताने पड़े। 1928 में डेढ़ वर्ष और 1940 में एक वर्ष की सजा मिली। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्होंने इलाहाबाद से गुप्त निर्देश जारी किए। नेहरू जी के घर से ही वे कार्यकर्ताओं को मार्गदर्शन देते रहे। 1937 और 1946 में वे संयुक्त प्रांत के विधानसभा चुनाव जीते। उनका योगदान सामाजिक समानता और अहिंसा पर आधारित था। वे गांधी जी के सिद्धांतों को जीवन में उतारते थे।

स्वतंत्रता के बाद शास्त्री जी का राजनीतिक सफर तेजी से आगे बढ़ा। 1946 में वे उत्तर प्रदेश सरकार में संसदीय सचिव बने। गोविंद बल्लभ पंत के अधीन पुलिस और परिवहन मंत्री रहे। उन्होंने महिलाओं को बस कंडक्टर बनाने का पहला कदम उठाया। भीड़ नियंत्रण के लिए लाठी के बजाय पानी की बौछार का उपयोग शुरू किया। 1947 के सांप्रदायिक दंगों और शरणार्थी पुनर्वास में उनकी भूमिका सराहनीय रही। 1951 में वे दिल्ली चले गए और ऑल इंडिया कांग्रेस कमिटी के महासचिव बने। 1952, 1957 और 1962 के चुनावों में कांग्रेस की जीत में उनका बड़ा हाथ था।

केंद्रीय मंत्रिमंडल में शास्त्री जी ने कई महत्वपूर्ण पद संभाले। 1952 से 1956 तक वे रेल मंत्री रहे। इस दौरान उन्होंने इंटीग्रल कोच फैक्ट्री की स्थापना की। लेकिन 1956 में दो रेल दुर्घटनाओं में सैकड़ों लोगों की मौत के बाद उन्होंने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए दो बार इस्तीफा दिया। पहली बार नेहरू जी ने ठुकरा दिया, लेकिन दूसरी बार स्वीकार कर लिया। यह उनकी ईमानदारी का प्रमाण था। बाद में वे वाणिज्य और उद्योग मंत्री बने। 1961 से 1963 तक गृह मंत्री रहे। इस पद पर उन्होंने भ्रष्टाचार रोकथाम समिति गठित की। असम और पंजाब में भाषा आंदोलनों को सुलझाने के लिए 'शास्त्री फॉर्मूला' बनाया। 1964 में नेहरू जी की बीमारी के समय वे बिना पोर्टफोलियो के मंत्री बने।

नौ जून 1964 को जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के बाद शास्त्री जी भारत के दूसरे प्रधानमंत्री बने। के. कामराज के समर्थन से वे मोरारजी देसाई पर भारी पड़े। उन्होंने नेहरू मंत्रिमंडल को ज्यादातर बरकरार रखा। इंदिरा गांधी को सूचना प्रसारण मंत्री बनाया। उनका कार्यकाल छोटा लेकिन प्रभावशाली रहा। 1965 में मद्रास में हिंदी विरोधी आंदोलन भड़का। शास्त्री जी ने अंग्रेजी को आधिकारिक भाषा बनाए रखने का आश्वासन देकर इसे शांत किया।

शास्त्री जी का सबसे बड़ा योगदान 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में था। पाकिस्तान ने कश्मीर पर कब्जा करने की कोशिश की। शास्त्री जी ने दृढ़ता से जवाब दिया। भारतीय सेना ने पाकिस्तान को करारी हार दी। इस दौरान उन्होंने 'जय जवान जय किसान' का नारा दिया। यह नारा सैनिकों और किसानों की महत्वता को रेखांकित करता था। युद्ध के बाद सोवियत संघ की मध्यस्थता से ताशकंद घोषणा पर हस्ताक्षर हुए। दस जनवरी 1966 को शास्त्री जी और पाकिस्तानी राष्ट्रपति अयूब खान ने शांति समझौता किया।

प्रधानमंत्री के रूप में शास्त्री जी ने आर्थिक नीतियों पर जोर दिया। देश में खाद्यान्न संकट था। उन्होंने हरित क्रांति की नींव रखी। पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में उच्च उपज वाली गेहूं की किस्में लाई गईं। इससे खाद्यान्न उत्पादन बढ़ा। उन्होंने खाद्य निगम की स्थापना की और निष्पक्ष मूल्य की दुकानें शुरू कीं। सफेद क्रांति को बढ़ावा दिया। 1965 में राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड बनाया, जिससे दूध उत्पादन में वृद्धि हुई। छोटे उद्योगों को प्रोत्साहन दिया। गरीबी उन्मूलन और आत्मनिर्भरता उनकी प्राथमिकताएं थीं।

शास्त्री जी की सादगी जगप्रसिद्ध थी। वे हमेशा धोती पहनते थे। 1961 में ब्रिटिश क्वीन के सम्मान में पहली बार पजामा पहना। अपने बेटे की नौकरी में अनियमितता पर उन्होंने कार्रवाई की। वे कविताएं लिखते थे, जो देशभक्ति से ओतप्रोत थीं। महिलाओं के सशक्तिकरण के पक्षधर थे।

लेकिन शास्त्री जी का जीवन एक रहस्यमयी मोड़ पर समाप्त हुआ। 11 जनवरी 1966 को ताशकंद में उनकी मृत्यु हो गई। आधिकारिक रूप से कारण हृदयाघात बताया गया। लेकिन कई सवाल अनुत्तरित हैं। पोस्टमार्टम नहीं हुआ। उनके शरीर पर नीले निशान दिखे। सोवियत खुफिया एजेंसी केजीबी ने उनके नौकर को हिरासत में लिया। कुछ सिद्धांतों में जहर देने या साजिश का जिक्र है। सीआईए या अन्य ताकतों की संलिप्तता की अफवाहें हैं। उनका बेटा सुनील शास्त्री ने भी सवाल उठाए। आज भी यह भारत के सबसे बड़े रहस्यों में से एक है।

शास्त्री जी की मृत्यु के बाद उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया। दिल्ली में विजय घाट उनका स्मारक है। मसूरी में लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी उनके नाम पर है। वाराणसी में उनका पैतृक घर संग्रहालय बनाया गया। उनकी विरासत सादगी, शांति और सेवा की है। वे साबित करते हैं कि छोटे कद का व्यक्ति बड़ा काम कर सकता है। आज के युवाओं को उनसे सीखना चाहिए कि ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा ही सच्ची शक्ति है। शास्त्री जी अमर रहें।

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