68.6 लाख नाम हटे, 21.53 लाख नए जुड़े, कुल 7.42 करोड़ वोटर, बिहार SIR के बाद चुनाव आयोग ने जारी की अंतिम मतदाता सूची
अंतिम सूची में पुरुष मतदाता 3.92 करोड़, महिला 3.49 करोड़ और तीसरे लिंग के 1,275 हैं। लिंग अनुपात में सुधार हुआ है। पहले यह 918 था, अब 890 महिलाओं पर 1000 पुरुष। युवा मतदाताओं की संख्या
बिहार में विधानसभा चुनाव की तैयारी जोरों पर है। चुनाव आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बाद राज्य की अंतिम मतदाता सूची जारी कर दी है। इस प्रक्रिया में कुल 68.6 लाख नाम हटाए गए हैं, जबकि 21.53 लाख नए मतदाता जुड़ गए हैं। नतीजा यह हुआ कि राज्य में अब कुल 7.42 करोड़ मतदाता हैं। यह संख्या जनवरी 2025 की 7.89 करोड़ से कम है, लेकिन अगस्त की ड्राफ्ट सूची के 7.24 करोड़ से बढ़ी है। आयोग का कहना है कि यह पुनरीक्षण मतदाता सूची को सटीक और पारदर्शी बनाने के लिए किया गया था। लेकिन विपक्ष ने इसे पक्षपाती बताते हुए सवाल उठाए हैं। सूची 30 सितंबर 2025 को जारी हुई, और अब चुनाव कार्यक्रम की घोषणा का इंतजार है। यह सूची 2025 के विधानसभा चुनावों के लिए आधार बनेगी। आयोग ने वेबसाइट पर इसे अपलोड कर दिया है, जहां कोई भी व्यक्ति अपना नाम चेक कर सकता है।
विशेष गहन पुनरीक्षण की शुरुआत 25 जून 2025 को हुई। आयोग ने सभी 7.89 करोड़ मौजूदा मतदाताओं से फॉर्म भरवाए ताकि उनकी सत्यापन हो सके। अगस्त 1 को ड्राफ्ट सूची जारी हुई, जिसमें 65 लाख नाम हटा दिए गए। इनमें ज्यादातर मृत, स्थानांतरित या डुप्लिकेट नाम थे। ड्राफ्ट में 22 लाख नाम मृत बताए गए, 36 लाख स्थायी रूप से बाहर चले गए, और 7 लाख दो जगह दर्ज थे। दावा और आपत्ति की अवधि में 16.59 लाख लोगों ने फॉर्म 6 भरकर नाम जोड़ने की मांग की। साथ ही 2.17 लाख ने नाम हटाने के लिए आवेदन किया। इस प्रक्रिया के बाद अंतिम सूची में 3.66 लाख और नाम हटे, जबकि 21.53 लाख नए जुड़े। इनमें 14.1 लाख 18-19 साल के युवा हैं। आयोग के अनुसार, नाम हटाने के 99 प्रतिशत कारण मृत्यु, प्रवास या डुप्लिकेट थे। विदेशी या अवैध नामों का प्रतिशत नगण्य रहा।
अंतिम सूची में पुरुष मतदाता 3.92 करोड़, महिला 3.49 करोड़ और तीसरे लिंग के 1,275 हैं। लिंग अनुपात में सुधार हुआ है। पहले यह 918 था, अब 890 महिलाओं पर 1000 पुरुष। युवा मतदाताओं की संख्या बढ़ी है। 18-19 साल के 14.1 लाख नए वोटर जुड़े, जो लोकतंत्र के लिए सकारात्मक है। लेकिन कुछ जिलों में नाम हटाने की संख्या ज्यादा रही। पटना में ड्राफ्ट के मुकाबले 1.63 लाख नाम जुड़े, कुल 48.15 लाख वोटर हो गए। पूर्वी चंपारण में 47,188 नए जुड़े, लेकिन 7,834 हटे। मधुबनी और पूर्वी चंपारण में सबसे ज्यादा नाम हटे थे। आयोग ने कहा कि यह प्रक्रिया पारदर्शी थी। सभी राजनीतिक दलों को सूची की प्रतियां दी गईं। जिला मजिस्ट्रेट और चुनाव अधिकारी इसे वितरित करेंगे।
विपक्ष ने SIR पर शुरू से सवाल उठाए। कांग्रेस अध्यक्ष राजेश कुमार ने कहा कि नाम हटाने की संख्या जोड़ने से ज्यादा है, जो संदिग्ध है। उन्होंने आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाया। स्वराज इंडिया के योगेंद्र यादव ने ट्वीट किया कि 1 सितंबर के बाद कैसे 4.6 लाख नए नाम जुड़े। उन्होंने कहा कि यह स्पष्टिकरण चाहिए। विपक्ष का आरोप है कि दलित और गरीब वोटरों के नाम जानबूझकर हटाए गए। सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं लंबित हैं, जहां SIR की वैधता पर सुनवाई हो रही है। विपक्ष ने संसद में भी विरोध किया। आरजेडी और अन्य दलों ने कहा कि यह नागरिकता जांच जैसा है। लेकिन जनता दल यूनाइटेड के एमएलसी नीरज कुमार ने विपक्ष को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि विपक्ष का वोट चोरी का नारा गलत साबित हुआ। 21 लाख से ज्यादा नाम जुड़ गए, जो दलित और गरीबों के नाम हटाने के दावे को झुठला देता है।
चुनाव आयोग ने सफाई दी कि SIR नियमित प्रक्रिया है। हर राज्य में समय-समय पर पुनरीक्षण होता है। बिहार में आखिरी SIR 2015 में हुआ था। 2025 में इसे विशेष बनाया गया क्योंकि चुनाव नजदीक थे। आयोग ने कहा कि नाम हटाना मतदाता सूची की शुद्धि के लिए जरूरी है। डुप्लिकेट नामों से वोटिंग में गड़बड़ी हो सकती है। प्रवासित मतदाताओं को नए स्थान पर स्थानांतरित किया जाता है। मृत नाम हटाने से संसाधन बचते हैं। ड्राफ्ट स्टेज पर 65 लाख नाम हटे, लेकिन आपत्ति अवधि में कई बहाल हुए। कुल मिलाकर 68.6 लाख हटे, लेकिन 21.53 लाख जुड़ने से नेट प्रभाव कम हुआ। आयोग ने 36,000 से ज्यादा नाम जोड़ने के दावे स्वीकार किए। 2.17 लाख आपत्तियों में से ज्यादातर सही पाई गईं। यह प्रक्रिया ईसीआई की वेबसाइट पर ट्रैक की जा सकती है।
अब मतदाता सूची जारी होने के बाद अगला कदम चुनाव कार्यक्रम की घोषणा है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि 6-7 अक्टूबर तक तारीखें आ सकती हैं। बिहार में 243 सीटें हैं, और गठबंधनों की जंग तेज है। एनडीए और महागठबंधन अपनी रणनीति बना रहे हैं। युवा वोटरों की बढ़ती संख्या विपक्ष के लिए फायदेमंद हो सकती है। लेकिन नाम हटाने का विवाद चुनावी माहौल गर्म कर रहा है। आयोग ने अपील की है कि मतदाता अपना नाम चेक करें। वोटर्स.ईसीआई.जीओवी.आईएन पर जाकर एपीआईसी नंबर या मोबाइल से सत्यापन करें। मोबाइल ऐप या एसएमएस से भी नाम पता चलेगा। अगर नाम न हो, तो फॉर्म 6 भरें। आयोग ने कहा कि अंतिम सूची में बदलाव नहीं होगा।
यह पुनरीक्षण बिहार के लोकतंत्र को मजबूत बनाने का प्रयास है। लेकिन पारदर्शिता पर सवाल उठे हैं। विपक्ष का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता कम थी, जिससे कई वोटर फॉर्म नहीं भर सके। आयोग ने बीएलओ (बूथ लेवल ऑफिसर) लगाकर घर-घर सत्यापन कराया। फिर भी कुछ असुविधा हुई। पटना जैसे शहरी जिलों में ज्यादा प्रभाव पड़ा। लेकिन कुल मिलाकर सूची सटीक हो गई। अब चुनाव आयोग को सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई का इंतजार है। अगर कोर्ट ने SIR को वैध कहा, तो विवाद शांत हो सकता है। अन्यथा नया मोड़ आ सकता है।
राजनीतिक दल अब अंतिम सूची का विश्लेषण कर रहे हैं। एनडीए का दावा है कि शुद्ध सूची से उनका वोट बैंक मजबूत होगा। विपक्ष कहता है कि हटाए गए नामों के परिवार वोट डालने से वंचित हुए। लेकिन आयोग के आंकड़े दिखाते हैं कि युवा और महिला वोटर बढ़े हैं। 18-19 साल के 14.1 लाख नए वोटर चुनाव को रोमांचक बनाएंगे। बिहार में वोटिंग प्रतिशत पहले से ऊंचा रहता है। 2020 में यह 57 प्रतिशत था। उम्मीद है कि SIR से यह और बढ़ेगा।
कुल मिलाकर, अंतिम मतदाता सूची जारी होना एक महत्वपूर्ण कदम है। 68.6 लाख नाम हटने और 21.53 लाख जुड़ने से सूची साफ हुई। लेकिन विवाद बरकरार है। विपक्ष कोर्ट जाएं या नहीं, चुनाव तय समय पर होंगे। बिहार की जनता अब नई सूची से वोट डालने को तैयार है। आयोग ने पारदर्शिता का वादा किया है। उम्मीद है कि निष्पक्ष चुनाव होंगे।
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