धरती के स्वर्ग' कश्मीर में पर्यटन का स्वर्णिम युग, 2.35 करोड़ सैलानियों के आगमन से टूटा दशकों का रिकॉर्ड।
जम्मू-कश्मीर, जिसे सदियों से 'धरती का स्वर्ग' कहा जाता रहा है, आज अपने सबसे गौरवशाली और शांतिपूर्ण दौर से गुजर रहा है। पिछले कुछ
- आतंक के साये से मुक्त हुई कश्मीर घाटी, गुलमर्ग और पहलगाम की वादियों में गूंजी पर्यटकों की हंसी, अर्थव्यवस्था को मिला जबरदस्त बूस्ट
- सुरक्षित कश्मीर, समृद्ध कश्मीर: बुनियादी ढांचे में सुधार और 'होम-स्टे' नीति ने बदली पर्यटन की तस्वीर, साल भर गुलजार रहने लगे डेस्टिनेशन
जम्मू-कश्मीर, जिसे सदियों से 'धरती का स्वर्ग' कहा जाता रहा है, आज अपने सबसे गौरवशाली और शांतिपूर्ण दौर से गुजर रहा है। पिछले कुछ वर्षों में घाटी ने आतंक की उन बेड़ियों को पूरी तरह से काट फेंका है, जिन्होंने दशकों तक यहाँ के विकास और पर्यटन को अपनी जकड़ में रखा था। ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक साल में रिकॉर्ड 2.35 करोड़ से अधिक पर्यटकों ने जम्मू-कश्मीर का दीदार किया है, जो इस केंद्र शासित प्रदेश के इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है। श्रीनगर की डल झील से लेकर गुलमर्ग की बर्फीली चोटियों तक, हर तरफ सैलानियों का तांता लगा हुआ है। यह बदलाव केवल संख्यात्मक नहीं है, बल्कि यह कश्मीर के बदलते मिजाज और वहां बहाल हुई स्थायी शांति का प्रतीक है, जिसने दुनिया भर के यात्रियों के मन में सुरक्षा का भाव पैदा किया है।
पर्यटन उद्योग में आई इस अभूतपूर्व क्रांति ने स्थानीय अर्थव्यवस्था में नई जान फूंक दी है। कभी पत्थरबाजी और बंद के लिए चर्चा में रहने वाली सड़कें अब पर्यटकों की गाड़ियों और खिलखिलाते चेहरों से भरी रहती हैं। सरकार की 'ऑल-सीजन' पर्यटन नीति ने यह सुनिश्चित किया है कि कश्मीर अब केवल गर्मियों का ठिकाना न रहे, बल्कि सर्दियों में 'खेलो इंडिया विंटर गेम्स' और बर्फबारी का आनंद लेने के लिए भी पसंदीदा स्थान बन जाए। पर्यटन क्षेत्र अब जम्मू-कश्मीर के सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) में लगभग 7 प्रतिशत का योगदान दे रहा है और प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पाँच लाख से अधिक लोगों की आजीविका का मुख्य आधार बन गया है। हस्तशिल्प, शिकार, शिकारा और केसर के व्यापार में आई तेजी ने स्थानीय युवाओं के लिए स्वरोजगार के नए मार्ग प्रशस्त किए हैं।
होम-स्टे और विलेज टूरिज्म की नई लहर
कश्मीर में पर्यटन को केवल बड़े होटलों तक सीमित न रखकर अब दूर-दराज के गांवों तक पहुँचाया गया है। 'होम-स्टे' नीति के तहत स्थानीय लोगों ने अपने घरों के दरवाजे पर्यटकों के लिए खोल दिए हैं। इससे न केवल पर्यटकों को कश्मीर की असली संस्कृति और खान-पान का अनुभव मिल रहा है, बल्कि गांवों की आर्थिक स्थिति में भी व्यापक सुधार आया है। गुरेज और केरन जैसे सीमावर्ती क्षेत्रों में 'बॉर्डर टूरिज्म' का बढ़ता क्रेज इसका जीता-जागता उदाहरण है।
आतंकवाद पर कड़े प्रहार और सुरक्षा ग्रिड की मजबूती ने विदेशी पर्यटकों के विश्वास को भी बहाल किया है। इस वर्ष विदेशी सैलानियों की संख्या में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है, जो यह दर्शाता है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कश्मीर की छवि अब एक 'असुरक्षित क्षेत्र' से बदलकर 'ग्लोबल टूरिस्ट हॉटस्पॉट' की हो गई है। जी-20 पर्यटन कार्य समूह की बैठक के सफल आयोजन ने वैश्विक मंच पर यह संदेश दिया था कि कश्मीर अब बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजनों के लिए पूरी तरह तैयार है। श्रीनगर हवाई अड्डे पर अंतरराष्ट्रीय उड़ानों की बहाली और रात के समय विमानों के संचालन ने कनेक्टिविटी की बाधाओं को दूर कर दिया है, जिससे यात्रियों के लिए यात्रा अब और भी सुगम और किफायती हो गई है।
बुनियादी ढांचे के विकास की बात करें तो वर्तमान में राज्य भर में 1,300 से अधिक पर्यटन परियोजनाओं पर काम चल रहा है। इसमें नए रास्तों का निर्माण, ऐतिहासिक स्थलों का जीर्णोद्धार और पर्यटकों के लिए आधुनिक सुविधाओं का विस्तार शामिल है। पहलगाम, सोनमर्ग और अहरुबल जैसे प्रसिद्ध स्थलों के साथ-साथ अब 75 नए 'ऑफबीट' गंतव्यों को विकसित किया जा रहा है ताकि भीड़ का दबाव कम किया जा सके और पर्यटकों को कुछ नया अनुभव मिले। 'स्मार्ट सिटी' परियोजना के तहत श्रीनगर का कायाकल्प हो चुका है, जहाँ झेलम रिवरफ्रंट और पोलो व्यू मार्केट जैसे स्थल अब पर्यटकों के आकर्षण का मुख्य केंद्र बन गए हैं। सड़कों का जाल और टनल निर्माण ने लद्दाख और घाटी के बीच की दूरी को भी कम कर दिया है।
राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति ने इस बदलाव में मुख्य भूमिका निभाई है। धारा 370 के हटने के बाद जिस तरह से केंद्र सरकार ने सीधे हस्तक्षेप कर विकास कार्यों को गति दी, उसके सकारात्मक परिणाम अब धरातल पर नजर आ रहे हैं। प्रशासन ने 'इन्वेस्टमेंट समिट' के जरिए पर्यटन क्षेत्र में निजी निवेश को बढ़ावा दिया है, जिससे बड़े अंतरराष्ट्रीय होटल समूह अब कश्मीर की ओर रुख कर रहे हैं। युवाओं को कट्टरपंथ से दूर कर कौशल विकास और पर्यटन से जोड़ने की मुहिम रंग ला रही है। आज कश्मीर का युवा पत्थर के बजाय हाथ में कैमरा और गाइड बुक लेकर पर्यटकों का स्वागत कर रहा है, जो समाज में आए गहरे सकारात्मक परिवर्तन का परिचायक है।
सांस्कृतिक संवर्धन और सूफीवाद की परंपरा को पुनर्जीवित करने के लिए सरकार द्वारा आयोजित किए जा रहे सूफी उत्सव और ट्यूलिप फेस्टिवल अब वैश्विक कैलेंडर का हिस्सा बन चुके हैं। एशिया का सबसे बड़ा ट्यूलिप गार्डन हर साल लाखों लोगों को अपनी ओर खींच रहा है। पर्यटन विभाग ने अब 'वेडिंग टूरिज्म' और 'फिल्मी पर्यटन' पर भी ध्यान केंद्रित किया है, जिससे बॉलीवुड की बड़ी फिल्में एक बार फिर कश्मीर की वादियों में शूट होने लगी हैं। यह न केवल मनोरंजन जगत के लिए अच्छी खबर है, बल्कि इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के हजारों अवसर पैदा हो रहे हैं।
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