छठ पर्व विशेष : भगवान् सूर्य एवम् षष्ठी देवी की उपासना का ऐतिहासिक संदर्भ।
छठ पर्व, यानी सुख-समृद्धि और मनोवांछित फल प्राप्ति के लिए की जानेवाली भगवान् सूर्य एवम् षष्ठी (कार्तिकेय की पत्नी देवसेना) देवी की उपासना का उल्लेख क्रमशः ऋग्वेद
लेख - विवेकानन्द सिंह
छठ पर्व, यानी सुख-समृद्धि और मनोवांछित फल प्राप्ति के लिए की जानेवाली भगवान् सूर्य एवम् षष्ठी (कार्तिकेय की पत्नी देवसेना) देवी की उपासना का उल्लेख क्रमशः ऋग्वेद और स्कंद पुराण के अलावा कई अन्य पुराणों में भी मिलता है। कार्तिक माह, शुक्लपक्ष के चतुर्थी से सप्तमी तिथि तक मनाये जानेवाले इस अतिप्राचीन पर्व की विशेषता यह है कि इसमें सूर्य के दोनों स्वरूपों, यानी अस्ताचलगामी सूर्य एवम् उदयाचल सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। इस पर्व में पुरुष और महिला समान रूप से शामिल होते हैं, लेकिन व्रतधारियों में महिलाओं की संख्या अधिक होती है। कहा जाता है कि इस लोकपर्व की शुरुआत बिहार प्रान्त से हुई है, लेकिन कालान्तर में आस्था के इस पर्व की पहुँच भारत के विभिन्न शहरों से होते हुए दुनिया के भिन्न-भिन्न शहरों तक हो गई है।
ईस्ट इण्डिया कम्पनी काल के गवर्नर-जनरल ऑफ़ इण्डिया, जॉर्ज ईडन की छोटी बहन, फैनी ईडन द्वारा आज से 188 वर्ष पूर्व लिखित एक संस्मरण में पटना के किसी घाट पर हो रहे छठ-पूजा का विवरण देखने को मिलता है। 04-5 नवम्बर, 1837 को छठपर्व के अवसर पर फैनी ईडन अपनी बड़ी बहन, एमिली ईडन के साथ पटना के गंगातट पर मौजूद थीं, जिसका ज़िक्र उन्होंने 'टाइगर्स, दरबार्स एण्ड किंग्स फैनी ईडन'स इण्डियन जर्नल्स 1837-38' में किया है। उन्होंने लिखा है कि - 4 नवम्बर - आज नदी के किनारे बहुत खूबसूरत लग रहे थे, क्योंकि यहाँ के मूल निवासियों की भीड़ थी, जो अपने पवित्र दिन के कपड़े पहने हुए थे, उनके हाथों में फलों और सब्जियों की टोकरियाँ थीं, वह गंगा को सूर्यास्त तक देखते रहे और फिर अपनी टोकरियों को धोने लगे। वे सभी यहाँ हर सम्भव रंग के चूड़े में लिपटे हुए हैं, यहाँ तक कि छोटे बच्चे भी जिनके चेहरे का केवल एक हिस्सा बाहर झाँक रहा था, उनके पास चमकीले नारंगी और गुलाबी रंग के कपड़े थे, जिनके किनारे लाल रंग के थे। (अँग्रेज़ी से अनुवादित)
यद्यपि प्रत्येक हिन्दू तीज-त्योहारों एवम् रीति-रिवाजों में गीतों की प्रमुखता है, लेकिन छठ में किसी कर्मकाण्ड या किसी मन्त्र की नहीं, बल्कि लोकगीतों की ही प्रधानता है। इन लोकगीतों के बिना लोकपर्व छठ की परिकल्पना नहीं की जा सकती है, यह गीत अन्य अवसरों पर गाए जानेवाले गीतों से भिन्न हैं, भोजपुरी, मगही, मैथिली, अंगिका और बज्जिका आदि लोक-बोलियों में गाए जानेवाले पारम्परिक गीतों में बोलियों का अन्तर है, परन्तु सबके भाव समान होते हैं। इन पारंपरिक लोकगीतों के अलावा दर्शन देहू न अपार हे दीनानाथ।..., केलवा के पात पर उगेलन सुरुजमल झांके–झुके।..., ए छोड़ु छोड़ु ए बाँझिनी छोड़ु रे दुआरी।..., मलहोरिन बिटिया नीबू लेई आव; सरीफा लेई आव।..., कोपि कोपि बोलेली छठिय मइया; सुनऽ ए महादेव।..., ए कवन देव पोखरा खनावेले; घटिया बान्हावेले।..., केरवा जे फरेला घवद से; ओपर सुगा मेंड़राए... आदि-इत्यादि अगणित गीत सदियों से लोकमानस में व्याप्त हैं, जो छठ-पूजा के अवसर पर बिना किसी वाद्ययन्त्र के सहयोग के ही गाए जाते थे, लेकिन अब इन्हें भिन्न-भिन्न वाद्ययन्त्रों के साथ प्रस्तुत किया जाने लगा है।
छठ के कर्णप्रिय लोकगीतों को आमजन तक पहुँचाने में जिन गायक/गायिकाओं ने अपना योगदान दिया है, उसमें प्रमुख रूप से विद्यावती सिन्हा, पद्मश्री विंध्यवासिनी देवी, कुमुद अखौरी, पद्मश्री और पद्मभूषण शारदा सिन्हा, पद्मश्री मालिनी अवस्थी, अनुराधा पौडवाल, अजीत अकेला, बेला सुलेखा, भरत शर्मा व्यास, कल्पना पटवारी, देवी, पवन सिंह, गोपाल राय, विष्णु ओझा, दिनेशलाल यादव, अलका याग्निक, रीतेश पाण्डेय, खेसारी लाल, राकेश मिश्रा, कल्लू, अनू दूबे, चन्दन तिवारी, सरिता सरगम, मैथिली ठाकुर, डॉ. नीतू कुमारी नूतन और अंजलि भारद्वाज, डिंपल भूमि आदि का नाम शामिल है। यहाँ एक बात का उल्लेख आवश्यक है कि आज छठ गीतों के नवांगतुक गायकों या गायिकाओं को वह लोकप्रियता नहीं मिल पा रही है, जो पूर्ववर्ती कलाकारों को प्राप्त थी, इसके पीछे के कारणों पर प्रकाश डालते हुए औरंगाबाद की लोकगायिका डिंपल भूमि ने कहा कि पहले के कलाकार अपनी मिट्टी, परंपरा और संस्कृति से जुड़े थे, जिसके चलते उनकी गायकी में वो खुशबू झलकती थी। एक व्रती की श्रद्धा, उसका दुःख, उसकी आशाएं और उसका उल्लास स्पष्ट दिखता था। परन्तु आज के कलाकार अपनी मूल संस्कृति से उखड़े हुए हैं, फलत: उनके गीतों में वह भाव नहीं मिलता, जो उन्हें जनमानस की भावनाओं से जोड़ सके।
26 सितंबर, 2025 को रेडियो पर प्रसारित मन की बात के 126वें एपिसोड में प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने छठ महापर्व की विश्वव्यापी महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह पर्व न केवल देश के विभिन्न हिस्सों में उत्साह के साथ मनाया जाता है, बल्कि अब यह वैश्विक स्तर पर भी अपनी पहचान बना रहा है, उन्होंने कहा कि भारत सरकार छठ महापर्व को यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सूची में शामिल करने की कोशिश कर रही है।
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