दिल्ली की अदालतों में मुकदमों का अंबार, 'तारीख पर तारीख' के बोझ तले दबी राजधानी की न्याय प्रणाली

दिल्ली की अदालतों में मुकदमों के निस्तारण की गति और नए आने वाले मामलों के बीच का अंतर इतना गहरा है कि इसे पाटना असंभव सा प्रतीत होता है। एक वर्ष की अवधि के दौरान दिल्ली में केवल लगभग 50,000 मुकदमों का ही ट्रायल पूरा हो सका, जबकि इसी

May 9, 2026 - 09:20
 0  1
दिल्ली की अदालतों में मुकदमों का अंबार, 'तारीख पर तारीख' के बोझ तले दबी राजधानी की न्याय प्रणाली
दिल्ली की अदालतों में मुकदमों का अंबार, 'तारीख पर तारीख' के बोझ तले दबी राजधानी की न्याय प्रणाली

  • महिलाओं और साइबर अपराधों में न्याय की रफ्तार सुस्त, 96 फीसदी से अधिक मामलों में फैसले का लंबा इंतज़ार
  • पेंडेंसी के पहाड़ के बीच दम तोड़ती उम्मीदें, दिल्ली में हर साल लाखों नए मामलों के साथ गहराता न्यायिक संकट

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में न्याय की गुहार लगाने वालों के लिए स्थितियां बेहद चुनौतीपूर्ण बनी हुई हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) की वर्ष 2024 की ताजा रिपोर्ट ने दिल्ली की न्यायिक व्यवस्था की एक ऐसी चिंताजनक तस्वीर पेश की है, जो व्यवस्था में सुधार की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करती है। आंकड़ों के मुताबिक, दिल्ली की विभिन्न अदालतों में लंबित मुकदमों की संख्या 4.34 लाख से भी अधिक हो गई है। यह आंकड़ा न केवल प्रशासनिक बोझ को दर्शाता है, बल्कि उस आम नागरिक की पीड़ा को भी व्यक्त करता है जो वर्षों से अदालत के चक्कर काट रहा है। मुकदमों की इस विशाल संख्या ने अदालतों को मुकदमों के पहाड़ के नीचे दबा दिया है, जिससे त्वरित न्याय की अवधारणा एक सपना बनकर रह गई है।

सबसे अधिक विचलित करने वाली स्थिति उन संवेदनशील श्रेणियों में है, जहां समाज को त्वरित कार्रवाई की सबसे अधिक अपेक्षा होती है। रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के मामलों में पेंडेंसी दर यानी लंबित रहने की दर 96 प्रतिशत के आंकड़े को पार कर गई है। इसका अर्थ यह है कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा, उत्पीड़न और छेड़छाड़ जैसे गंभीर अपराधों में दर्ज होने वाले अधिकांश मामले कोर्ट की फाइलों में ही दबे रह जाते हैं। जब पीड़ितों को समय पर न्याय नहीं मिलता, तो अपराधियों के हौसले बुलंद होते हैं और न्याय प्रणाली पर से जनता का विश्वास डगमगाने लगता है। इसी तरह साइबर अपराधों की स्थिति भी कुछ अलग नहीं है, जहां तकनीकी जटिलताओं और साक्ष्यों के अभाव के कारण लंबित मामलों की दर 93 प्रतिशत से अधिक बनी हुई है।

दिल्ली की अदालतों में मुकदमों के निस्तारण की गति और नए आने वाले मामलों के बीच का अंतर इतना गहरा है कि इसे पाटना असंभव सा प्रतीत होता है। एक वर्ष की अवधि के दौरान दिल्ली में केवल लगभग 50,000 मुकदमों का ही ट्रायल पूरा हो सका, जबकि इसी अवधि में दर्ज होने वाले नए मामलों की संख्या इससे कई गुना अधिक थी। न्याय की यह धीमी गति 'जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड' यानी देर से मिला न्याय, न्याय न मिलने के बराबर है, वाली कहावत को चरितार्थ कर रही है। सीमित संख्या में जजों की उपलब्धता और न्यायिक बुनियादी ढांचे की कमी के कारण एक-एक मामले को अंतिम फैसले तक पहुँचने में दशकों का समय लग रहा है। दिल्ली में बढ़ते मुकदमों के बोझ को कम करने के लिए लोक अदालतों और मध्यस्थता केंद्रों के माध्यम से सुलह-समझौते की कोशिशें तो की जा रही हैं, लेकिन अपराधों की प्रकृति और संख्या को देखते हुए ये प्रयास समुद्र में ऊंट के मुंह में जीरे के समान साबित हो रहे हैं। गंभीर अपराधों में सुलह संभव नहीं होती, जिसके कारण मुख्य अदालतों पर दबाव कम नहीं हो पा रहा है।

साइबर अपराधों के क्षेत्र में दिल्ली की स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। डिजिटल इंडिया के दौर में जहां वित्तीय धोखाधड़ी और ऑनलाइन हैकिंग के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, वहीं हमारी न्यायिक और जांच प्रक्रिया उस गति से अपडेट नहीं हो पाई है। साइबर मामलों में जांच के लिए आवश्यक फॉरेंसिक रिपोर्ट और तकनीकी डेटा प्राप्त करने में लगने वाला समय मुकदमों की पेंडेंसी को और बढ़ा देता है। 93 प्रतिशत से अधिक लंबित दर यह बताती है कि डिजिटल अपराधी आधुनिक तकनीक का लाभ उठा रहे हैं, जबकि न्याय प्रणाली अभी भी पुरानी प्रक्रियाओं के जाल में उलझी हुई है। यही कारण है कि ठगी का शिकार हुए लोग अक्सर पुलिस और कोर्ट के चक्कर काटते-काटते थक जाते हैं।

दिल्ली में मुकदमों के इस अंबार के पीछे एक बड़ा कारण यह भी है कि यहां अपराधों की रिपोर्टिंग दर अन्य राज्यों की तुलना में काफी बेहतर है। ऑनलाइन एफआईआर और जागरूक नागरिकों के कारण मामले तो दर्ज हो रहे हैं, लेकिन उन पर सुनवाई के लिए पर्याप्त कोर्ट रूम और न्यायिक अधिकारियों की कमी है। दिल्ली की जिला अदालतों से लेकर उच्च न्यायालय तक, हर जगह मुकदमों की सूची इतनी लंबी है कि जजों के पास हर मामले को पर्याप्त समय देने की चुनौती बनी रहती है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक न्यायिक पदों को समय पर नहीं भरा जाएगा और तकनीक का समावेश नहीं होगा, तब तक लंबित मामलों की इस सूची को छोटा करना मुमकिन नहीं है। मुकदमों के इस भारी बोझ का असर दिल्ली की सामाजिक सुरक्षा पर भी पड़ता है। जब अपराधियों को पता होता है कि मामला सालों-साल चलेगा, तो उनके मन में कानून का डर कम हो जाता है। विशेष रूप से महिलाओं के खिलाफ अपराधों में देरी होने से गवाहों का मनोबल टूटता है और कई बार दबाव में आकर वे अपने बयानों से मुकर जाते हैं, जिसका सीधा फायदा आरोपी को मिलता है। यही वजह है कि दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में दोषसिद्धि की दर भी काफी कम बनी हुई है। न्याय की यह सुस्त चाल न केवल कानूनी हार है, बल्कि एक सभ्य समाज के रूप में हमारी नैतिक विफलता भी है।

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow