स्वदेशी न्यायशास्त्र की वकालत: जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, विदेशी फैसलों पर निर्भरता अब अनावश्यक, भारत के अपने निर्णय पर्याप्त

जस्टिस सूर्यकांत का यह विचार वर्तमान न्यायिक बहस का हिस्सा है। हाल ही में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा भेजे गए संदर्भ पर सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ ने फैस

Nov 23, 2025 - 15:28
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स्वदेशी न्यायशास्त्र की वकालत: जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, विदेशी फैसलों पर निर्भरता अब अनावश्यक, भारत के अपने निर्णय पर्याप्त
स्वदेशी न्यायशास्त्र की वकालत: जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, विदेशी फैसलों पर निर्भरता अब अनावश्यक, भारत के अपने निर्णय पर्याप्त

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के भावी मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने शनिवार को 'स्वदेशी न्यायशास्त्र' की मजबूत वकालत की। उन्होंने कहा कि 75 वर्षों में सुप्रीम कोर्ट ने हजारों ऐतिहासिक फैसले देकर न्यायिक ज्ञान का विशाल भंडार अर्जित कर लिया है। ऐसे में किसी मुद्दे पर राय बनाते समय दूसरे देशों के निर्णयों पर निर्भर क्यों रहना चाहिए, जहां भौगोलिक, सामाजिक, राजनीतिक और स्थानीय परिस्थितियां बिल्कुल भिन्न होती हैं। यह बयान उन्होंने अपने आधिकारिक निवास पर मीडिया से अनौपचारिक बातचीत के दौरान दिया। जस्टिस सूर्यकांत 25 नवंबर को 53वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ लेंगे। उनका यह कथन वर्तमान मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई के हालिया बयान से प्रेरित लगता है, जिन्होंने राष्ट्रपति के संदर्भ पर सुनवाई में एक भी विदेशी फैसले का हवाला न देकर 'स्वदेशी व्याख्या' का उपयोग करने की बात कही थी। जस्टिस सूर्यकांत ने मुद्दों की लंबी कतार को कम करने के प्रति आशावाद भी जताया।

यह बातचीत 22 नवंबर 2025 को हुई, जब जस्टिस सूर्यकांत का कार्यभार ग्रहण करने का समय नजदीक आ गया था। वर्तमान सीजेआई बीआर गवई 24 नवंबर को सेवानिवृत्त हो रहे हैं। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने स्वतंत्रता के बाद से ही मजबूत न्यायिक दर्शन विकसित किया है। हमारे फैसले न केवल भारत में मानक बने हैं, बल्कि अन्य देशों के न्यायालय भी इन्हें उद्धृत करते हैं। फिर भी, कई बार भारतीय अदालतें विदेशी निर्णयों का सहारा लेती हैं, जो उचित नहीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि स्वदेशी न्यायशास्त्र का मतलब विदेशी विचारों को पूरी तरह नकारना नहीं, बल्कि प्राथमिकता अपनी परंपराओं और संदर्भों को देना है। यह कदम अदालत को और मजबूत बनाएगा। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, "जब हमने अपना न्यायिक ज्ञान अर्जित कर लिया, तो विदेशी फैसलों पर निर्भरता क्यों?" यह बयान भारतीय न्याय व्यवस्था में 'भारतीयता' की भावना को मजबूत करने का संकेत देता है।

जस्टिस सूर्यकांत का यह विचार वर्तमान न्यायिक बहस का हिस्सा है। हाल ही में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा भेजे गए संदर्भ पर सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ ने फैसला सुनाया। इसमें कोर्ट ने राष्ट्रपति और राज्यपालों पर विधेयकों को मंजूरी देने के लिए समय सीमा लगाने के सुप्रीम कोर्ट के अप्रैल के फैसले को गलत ठहराया। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुनवाई के दौरान कहा कि जस्टिस गवई और जस्टिस सूर्यकांत के नेतृत्व में अदालत में 'भारतीयता की ताजी हवा' बह रही है। सीजेआई गवई ने जवाब में कहा कि इस मामले में एक भी विदेशी फैसला उद्धृत नहीं किया गया। हमने पूरी तरह स्वदेशी व्याख्या का सहारा लिया। मेहता ने कहा कि भारतीय और विदेशी कानूनी व्यवस्थाओं में भेद स्पष्ट करना जरूरी है। विदेशी फैसले कभी-कभी भारतीय संदर्भ से मेल नहीं खाते। यह फैसला संवैधानिक लचीलापन पर जोर देता है। कोर्ट ने कहा कि समय सीमा लगाना अनुचित था, क्योंकि संविधान में ऐसी कोई बाध्यता नहीं।

जस्टिस सूर्यकांत ने इस संदर्भ में कहा कि स्वदेशी न्यायशास्त्र प्राकृतिक कदम है। सुप्रीम कोर्ट ने 75 वर्षों में हजारों ऐतिहासिक फैसले दिए हैं। ये फैसले सामाजिक न्याय, मौलिक अधिकारों और संवैधानिक व्याख्या पर आधारित हैं। उदाहरण के लिए, मेनका गांधी मामले में मौलिक अधिकारों की व्यापक व्याख्या या शाह बानो मामले में मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों पर फैसले। ये भारतीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर दिए गए। विदेशी फैसले, जैसे अमेरिकी या ब्रिटिश, यहां लागू न हों, क्योंकि सामाजिक संरचना अलग है। जस्टिस सूर्यकांत ने आशा जताई कि उनका 17 महीने का कार्यकाल मुद्दों की संख्या कम करने पर केंद्रित रहेगा। उन्होंने कहा कि हाल ही में एक तीन सदस्यीय पीठ ने 500 से ज्यादा लंबित मामलों का निपटारा किया। इसी तरह सेल्फ-डिस्पोजल मैकेनिज्म को मजबूत किया जाएगा।

यह बहस नई नहीं है। स्वतंत्रता के बाद भारतीय न्यायपालिका ने शुरू में ब्रिटिश और अमेरिकी फैसलों पर निर्भरता दिखाई, लेकिन धीरे-धीरे स्वदेशी दृष्टिकोण अपनाया। 1950 के दशक में डॉ. बीआर अंबेडकर ने संविधान सभा में कहा था कि भारतीय न्याय व्यवस्था को अपनी जड़ों से जुड़ना चाहिए। आजादी के 75 वर्ष बाद यह विचार और प्रासंगिक हो गया। जस्टिस सूर्यकांत का बयान इसी निरंतरता का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि भौगोलिक विविधता, सांस्कृतिक भिन्नता और राजनीतिक परिदृश्य के कारण विदेशी फैसले हमेशा फिट नहीं बैठते। उदाहरणस्वरूप, गोपनीयता के अधिकार पर भारतीय फैसले (जैसे पुत्तस्वामी मामले) ने विदेशी विचारों को अपनाया, लेकिन भारतीय संदर्भ में ढाला। स्वदेशी न्यायशास्त्र इसी संतुलन को मजबूत करेगा।

जस्टिस सूर्यकांत का सफर प्रेरणादायक है। वे हरियाणा के हिसार के रहने वाले हैं। उन्होंने हिसार में वकालत शुरू की, फिर पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में प्रैक्टिस की। 2007 में हाईकोर्ट के जज बने। 2018 में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे। 2019 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। उनके प्रमुख फैसलों में आर्टिकल 370 को रद्द करने का समर्थन, पेगासस जासूसी मामले की जांच और ट्रांसजेंडर अधिकारों पर फैसले शामिल हैं। एक मामले में उन्होंने महिला सरपंच को बहाल किया, लिंग भेदभाव पर टिप्पणी की। बार काउंसिल में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित करने का आदेश दिया। अगस्त 2024 में एक फैसले में कहा कि भारतीय कानून के विरुद्ध विदेशी फैसला बाध्यकारी नहीं। रोहन राजेश कोठारी मामले में अमेरिकी कोर्ट के फैसले को नजरअंदाज किया, क्योंकि वह भारतीय कानून से टकराता था।

शपथ ग्रहण समारोह भव्य होगा। भूटान, केन्या, मलेशिया, ब्राजील, मॉरीशस, नेपाल और श्रीलंका के मुख्य न्यायाधीश और जज दिल्ली पहुंचेंगे। यह कूटनीतिक महत्व का है। सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि जस्टिस सूर्यकांत का कार्यकाल भारतीय न्याय में नई ऊर्जा लाएगा। विपक्ष ने भी स्वागत किया। कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने कहा कि स्वदेशी न्यायशास्त्र अच्छा विचार है, लेकिन मौलिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित हो। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम न्यायपालिका को अधिक आत्मनिर्भर बनाएगा। लेकिन सावधानी बरतनी होगी, ताकि वैश्विक मानकों से कटाव न हो।

जस्टिस सूर्यकांत ने महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर कहा कि उन्होंने अभी सोचा नहीं। लेकिन उनके फैसलों से स्पष्ट है कि वे लिंग समानता के पक्षधर हैं। सुप्रीम कोर्ट में वर्तमान में तीन महिला जज हैं। उनका कार्यकाल लंबित मामलों को कम करने पर फोकस करेगा। वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में 80,000 से ज्यादा मामले लंबित हैं। निचली अदालतों में 4.5 करोड़। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि तकनीक का उपयोग बढ़ेगा, जैसे ई-कोर्टिंग।

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