लघुकथा:- सांवला रंग तो पुरुषों पर फबता है।” कहते हुए माँ....
“सांवला रंग तो पुरुषों पर फबता है।” कहते हुए माँ ने शिवांगी का दुपट्टा पिनप किया और उसके हाथों में शर्बत की ट्रे पकड़ा दी पर उसके क़दम...
लेखिका- ज्योत्सना सिंह, ओमेक्स, गोमती नगर
लखनऊ।
“सांवला रंग तो पुरुषों पर फबता है।” कहते हुए माँ ने शिवांगी का दुपट्टा पिनप किया और उसके हाथों में शर्बत की ट्रे पकड़ा दी पर उसके क़दम आगे बढ़ने को तैयार ही नहीं थे। तभी पापा ने आकर उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा था- “शिवांगी, सुंदरता तन की नहीं मन की होती है फिर रुद्र तो डाक्टर ही मन का है।”
बेमन और बेमेल विवाह के बंधन में बंधी शिवांगी अपने पति रुद्र को सिर्फ कड़वाहट ही परोसती रही और वह मुस्कुराकर उसे अपने कंठ से लगाता रहा किंतु शिवांगी अपने दिल के सारे अरमान अपने नोटपैड पर टाइप करती और सोशलमीडिया पर अपने सौंदर्य के लिए मिले कॉमेंट कई बार पढ़कर गुरूर से भर उठती। उसने अपने इर्द-गिर्द एक आभासी ख़ाका बना लिया जिसमें वह अपना जीवन एक सुंदर साथी के साथ बिताने लगी थी। वह उसी साथी के साथ बातें करती। एक अज़ीब तरह के उन्माद में घिरी रहती। शिवरात्रि के अवसर पर इंस्टाग्राम पर ट्रेंड करती हुई अर्द्धनारीश्वर की तस्वीर देखकर वह बहुत विचलित हुई। आज उसने पहली बार रुद्र से स्नेहसिक्त शब्दों में पूछा-“रुद्र,यह तस्वीर क्या कहती है?”
“बहुत कुछ शिवांगी, स्त्री और पुरुष का सबसे सुंदर स्वरूप यही है। प्रेम की पराकाष्ठा यही तो है।”
“और विवाह?”
“एक दूसरे में विलय हो जाना ही विवाह है।”
“क्या रूप और रंग कोई मायने नहीं रखते।”
“जहाँ प्रेम होता है वहाँ सिर्फ़ समर्पण होता और समर्पण का कोई रूप रंग नहीं होता।” कहते हुए रुद्र ने अपनी बांहे फैला दी। कुछ ठहरकर शिवांगी ने अपने नोटपैड पर लिखा
‘श्याम साँवरे राधा गोरी’ और रुद्र के दामन में सिमट गई।
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