एक कहानी:- मनमर्ज़ी.... समुद्र के किनारे टहलते हुए उसके पैरों से कुछ टकरा गया। वह झुक कर....

समुद्र के किनारे टहलते हुए उसके पैरों से कुछ टकरा गया। वह झुक कर उसे तलाशने लगी। थोड़ी सी रेत हटाई ही थी कि वह बाहर झांकने लगा। छोटा सा शंख....

Jul 3, 2025 - 16:07
Jul 3, 2025 - 16:38
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एक कहानी:- मनमर्ज़ी.... समुद्र के किनारे टहलते हुए उसके पैरों से कुछ टकरा गया। वह झुक कर....

लेखिका- ज्योत्सना सिंह, लखनऊ

एक कहानी 

मनमर्ज़ी

समुद्र के किनारे टहलते हुए उसके पैरों से कुछ टकरा गया। वह झुक कर उसे तलाशने लगी। थोड़ी सी रेत हटाई ही थी कि वह बाहर झांकने लगा। छोटा सा शंख था। उसे हाथ में उठाकर वह सोचने लगी- “कहाँ से आया यह? समुद्र की लहरों के साथ बह कर आया है या किसी ने उसे यहाँ छुपा दिया है? जैसे उसने खुद को सबसे छुपा लिया है।”

बीते समय ने जैसे ही उसे कुरेदने की कोशिश की उसने वैसे ही उस पर मुट्ठी भर रेत डाल दी। वापस जाने के लिए मुड़ गई। उसके कदम तेज होते जा रहे थे। जैसे पुरानी वे सभी बातें उसका पीछा करते हुए अपने कदम धरती चली आ रही हैं। वह उनसे आगे निकल जाना चाहती थी। 

सीढ़ियां चढ़ वह अपने फ़्लैट नंबर एक सौ तेरह के सामने आकर खड़ी हो गई। जीन्स की जेब से उसने चाबी निकाली ताला खोलने के लिए जैसे ही चाबी घुमाई वैसे ही आज फिर ताला फँस गया- “उफ़ ये ताला भी।” बड़बड़ाते हुए उसने दूसरे हाथ से दरवाज़े को खींचना चाहा तब उसे एहसास हुआ कि वह उस शंख को अपने साथ ही लेती आई है। वह शंख नीचे रखने लगी तभी उसे उसकी कही बात ऐसे सुनाई दी जैसे वह उसके अरीब-क़रीब ही कहीं खड़ा हो और कह रहा हो- “अजीब हो यार तुम कुछ भी नहीं समझती हो कहा न शंख कभी भी ज़मीन में नहीं रखते।” उसके हाथ जहाँ के तहाँ रुक गए उसने अपनी ठोड़ी और गर्दन के बीच में शंख को दबाते हुए दरवाज़ा खींचा और झटका देकर चाबी घुमाई फँसा हुआ ताला खुल गया साथ ही साथ उसके मन के बंद दरवाज़े में भी हल्की सी दराज़ खुल गई।उसने किचेन से एक प्लेट उठकर शंख उसमें रख दिया और खुद आराम कुर्सी पर अधलेटी सी होकर उन्हीं दराज़ों में न चाहते हुए भी झांकने लगी।

सबसे पहले उसे अम्मा का कच्चा-पक्का लिपा-पुता महकता हुआ सा आंगना दिखने लगा। जहाँ मिट्टी की ख़ुशबू से घर का कोना-कोना वैसा ही सोंधी सी महक ओढ़े हुए रहता था जैसा कि किसी गाँव का कच्चा घर। उसके पापा की वकालत का काला कोट बस उतना ही काला था जितना उनका पसीना उसे भिगो पाता था। दाल-रोटी तो वह अपनी खेती-बारी से भी खा सकते थे पर उन्हें कानूनी धाराओं से उलझे रहने का शौक़ था। जब एक-दो केस के साथ ही शहर के पेपरों में उनका नाम छप गया तब वह गाँव से उठकर शहर चले आए। सोचा चलो एक पंथ दो काज हो जाएगें वकालत भी चल निकलेगी और बिटिया भी पढ़ जाएगी। हुआ भी वही वह उस आधे शहरी आधे देहाती माहौल में अधकचरी मानसिकता के साथ बड़ी होने लगी। अम्मा पूजा-अर्चना के लिए आवाज़ लगाती तो वह कहती- “तुम्हारे ये भगवान तो पापा की कचहरी में खुद झूठ और सच के झंझट में पड़े रहते हैं।पहले उन्हें वहाँ से बचाव फिर मैं तुम्हारे साथ घंटी बजा लूँगी।” उसकी इस तरह की बे सर-पैर की दलील सुन पापा जहाँ ठहाका लगाते वहीं अम्मा कहती- “पंडितो के यहाँ जन्म लेकर भी जो नास्तिक विचार घुसा दिए हो बिटिया में, ब्याह के बाद ताने तुम ही सुनोगे वकील साहब।” 

कॉलबेल की घनघनाहट से उसकी तंद्रा भंग हुई। उसने दरवाज़ा खोला उसका अंडा रोल लिए नीचे के ठेले वाला लड़का खड़ा था। हाथ का पैकेट उसकी तरफ़ बढ़ाते हुए बोला- “दीदी, खा लो अभी गरम है। मालिक भी ठेला बढ़ा रहा है। आज बिक्री कम होती है।आज गुरुवार है न तभी से।” उसने अंडा रोल पकड़ते हुए कहा- “ सब दिन भगवान के ही होते हैं।” उसने कहा- “ होते तो हैं दीदी, पर बहुत से लोग मंगलावार और गुरुवार को नहीं खाते हैं।” उसने कंधे उचकाते हुए उसे पैसे दिए और दरवाज़ा बंद कर लिया। अभी थोड़ी देर पहले तक वह जहाँ थी कॉलबेल की आवाज़ से वह वहाँ से बाहर आ गई थी मगर उस लड़के की बात ने उसके बंद दरीचे में फिर से सुराख़ कर दिया। “ अरे, यार मैं खाने को मना नहीं करता पर दिन और तिथि-त्यौहार तो थोड़ा देख लिया करो।” इस बार उसके सामने उसके माएके का वह कच्चा-पक्का आँगन नहीं खुला था। अब की उसके सामने आ खड़ा हुआ था उसकी सनातनी ससुराल का चौकपुरा चौबारा। जहाँ अन्न-जल तभी मुँह को जाता था जब स्नान-ध्यान आरती- हवन सब हो जाता।

वह किसी से कुछ कहे भी तो कैसे अर्पित उसकी अपनी पसंद था। पापा ने कहा भी था- “अर्पित की प्राइवेटजॉब है। सुन्दरलाल की प्रैक्टिस अच्छी चलती है।वकील भी सरकारी है। घर-परिवार भी देखा सुना है, तुम खुश रहोगी।” तब एक न सुनी थी उसने अपने पापा की बल्की सुन्दरलाल के नाम का मज़ाक बनाते हुए कहा भी था- “पापा, मैंने देखा है आपके सुंदरलाल को कितने सुंदर हैं। मैं और अर्पित एक ही कंपनी में हैं। फिर हमें अकेले ही तो रहना है। साउथ से उसके अम्मा-अप्पा दिल्ली नहीं आकर रहने वाले।आप ने मुझे एमबीए यहाँ रहकर सुन्दरलाल की रोटी सेंकने के लिए करवाया था क्या? मैं अपनी नौकरी नहीं छोड़ने वाली।” उसकी अम्मा ने वकील साहब को बहुत समझाया कि बेटी को थोड़ा वक्त दो और समझाओ वह समझ जाएगी। पर वकील साहब को बिटिया की किसी बात से आज तक ऐतराज़ हुआ ही नहीं था अतः आज भी नहीं हुआ। 

अर्पित और उसके प्रेम की पींग शादी होते ही जमीन पर आ लगी।छोटी-छोटी बातें बड़ी तकरार में बदलने लगीं थीं। वैसे अर्पित को उसके मांसाहारी होने से कोई ऐतराज नहीं था। उसका बस इतना ही कहना था कि- “जब अम्मा-अप्पा साथ रहे तब तक मत खाओ और उनका मन रखने के लिए ही सही थोड़ी सी पूजा-पाठ कर लिया करो सात्विक होना कोई अपराध नहीं है।” अर्पित का इस तरह से बोलना उसे लगने लगा था कि उसके स्वतंत्र विचारों का हनन हो रहा है। फिर वह स्वयं सिद्धा है अपने पैरों पर खड़ी है। वह क्यों किसी के लिए खुद को बदले। उसने प्यार को दरकिनार किया और अपने मानवीय अधिकारों के लिए मुखर हो गई। प्रेम में अहम का ज्वार-भाटा आ गया और वह दोनों ही अपने-अपने तट से जा लगे।

उसके इस रूखेपन से अर्पित टूट गया था वह फिर भी तार-तार रिश्ते बुन रहा था। तभी अर्पित का ट्रांस्फ़र उसके हेडआफिस चेन्नई हो गया। वह बहुत खुश हुआ उसने उसके ट्रांस्फ़र की बात भी बॉस से कर ली और चेन्नई अपने घर रहने के सपने संजोने लगा। तब उसने अपना साफ़ विरोध जताया और कहा- “मैं चेन्नई नहीं चल सकती।” जब अर्पित ने उसे बहुत मनाने की कोशिश की तब वह बोली- “एक शर्त पर चलूँगी हम अलग अपने फ्लैट में रहेंगे।” अपना रिश्ता और बाक़ी सब कुछ बचाने के लिए अर्पित ने कहा-“ जल्दी से जल्दी हम घर ख़रीद लेंगे।” 

फोन की घंटी के साथ ही वह फिर से वर्तमान में लौट आई। फोन बॉस का था उन्होंने कल होनी वाली मीटिंग की चर्चा की और सुबह वक्त पर पहुँचने की हिदायत देते हुए गुडनाइट के साथ फोन कट कर दिया। अचानक उसे अपने ही वर्तमान से खीझ होने लगी। सामने टेबल पर रखा अंडा रोल उठाकर उसने खाने के लिए खोला पर न जाने क्यों उसे उबकाई सी आई और उसने उसे बंद करके रख दिया। जाकर बिस्तर पर लेट गई सुबह होने के इंतज़ार में।नींद न जाने अतीत के किस कोने में जाकर अटक गई थी। वह चाह कर भी उसे वहाँ से अपने लिए निकालकर नहीं ला पा रही थी। करवट कर वह मुड़ी तो सामने लगे शीशे में अपने ही अक्स को देख कर मायूस ही गई। आज उसे खुद लग रहा था उदासी उसके चेहरे के हर कोने पर अपनी लकीरें खींच गई है। उसे अपनी ही पलकों पर अपना बीता हुआ कल नज़र आने लगा।

दिल्ली से प्रोमोशन लेकर वह अर्पित के साथ चेन्नई पहुँच गई। जाते ही उसने अर्पित से फ्लैट के लिए ज़िद्द पकड़ ली क्योंकि ससुराल का सात्विक जीवन जीना उसके लिए असंभव होता जा रहा था।उसकी और अर्पित की रोज ही घर के नियमों को लेकर खट-पट होने लगी थी। दिल्ली में अर्पित अपनी पूजा-पाठ करता पर उसे कभी फ़ोर्स नहीं करता था। यहाँ वह कहता था-“अम्मा की आरती के वक्त खड़ी हो जाया करो। या फिर पूजा के वक्त सर ढक लिया करो।” ये रोज की टोका-टाकी उनके रिश्तों के उफनते दूध में नींबू की दो बूँद का काम करता और पल-पल मनमोटाव का थक्का जमता जा रहा था। आख़िर उसने फ़ैसला ले लिया और अपना ट्रांस्फ़र मुंबई करवा लिया। यहाँ आकर उसने जिस घर में रहना का फ़ैसला लिया अर्पित ने उसमें भी एतराज़ किया-“क्या यार ये तेरह नंबर का घर ही लेना था। कोई और देख लेते हैं।” उसने बड़ी रुखाई से कहा था-“ तुम्हें नहीं मुझे रहना है यहाँ और मुझे इन सब से कोई फर्क नहीं पड़ता है।तेरह भी एक डिज़िट ही है।” धीरे-धीरे बातों की खाई बढ़ती गई जब भी वह मिलते कोई न कोई टकराव उनकी दरार को और गहरा कर देता। अर्पित साल भर हो गया उससे मिलने नहीं आया है। न ही वह चेन्नई गई। वक्त के साथ फोन नंबर भी डायल लिस्ट से गायब हो कर बस काल लॉग तक सीमित रह गया है। उसने लेटे-लेटे ही नंबर सर्च किया और अर्पित को मैसेज किया-“मैं अपना फ़्लैट बदल रही हूँ।कल चेन्नई तबादले के लिए भी अप्लाई कर दूँगी।”

मैसेज डिलीवर होते ही ब्लू टिक के साथ ही अर्पित का फोन आ गाय उसने भीगे हुए स्वर में कहा-“ आई॰ एम॰सारी।तुम्हें फ़्लैट या खुद को  बदलने की ज़रूरत नहीं है। मैं समझ गया हूँ प्यार बदलने का काम नहीं है। प्यार साथ चलने का नाम है।” भीगी पलकें बंद करते हुए उसने भी मन में ठान ली कि वह अपने रूखे व्यवहार को ज़रूर बदलेगी। सामने प्लेट में रखा शंख हल्की रौशनी में अपनी दुधिया रंग के साथ चमक रहा था।उसे लगा उसके ऊपर से भी जैसे मनमर्जी की रेत की पर्त हट गई हो।

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