लघुकथा- आ अब लौट चलें… !

Short story: विमल अपने कमरे में अकेला बैठा था, तभी उसे गाँव से आया अपनी छोटी बहन का पत्र मिला। पत्र में लिखा था, "भैया, इस बार गर्मी की...

Jul 7, 2025 - 12:19
Jul 7, 2025 - 12:20
 0  155
लघुकथा-  आ अब लौट चलें… !

नलिनी श्रीवास्तव, नील

लघुकथा-

आ अब लौट चलें… !

विमल अपने कमरे में अकेला बैठा था, तभी उसे गाँव से आया अपनी छोटी बहन का पत्र मिला। पत्र में लिखा था, "भैया, इस बार गर्मी की छुट्टियों में आ जाना। माँ तुम्हें बहुत याद करती हैं। खेत सूख रहे हैं और कुआँ भी खाली हो गया है। सब तुम्हें याद करते हैं।"

पत्र पढ़ते ही विमल की आँखों में आँसू आ गए। उसे लगा जैसे किसी ने उसके अन्दर का खालीपन भर दिया हो। शहर की भागदौड़ में विमल लगभग खो सा गया था। गाँव छोड़े उसे कई साल हो गए थे। इन बीते सालों में उसने बहुत कुछ पाया था—एक छोटी सी नौकरी, एक कमरा, और कुछ शहरी दोस्त जो सिर्फ़ ज़रूरत पड़ने पर याद करते थे। लेकिन कुछ था जो इन सब के बावजूद भी खाली रह गया था।

हर सुबह वह भीड़ से भरी लोकल ट्रेन में धक्के खाता और हर शाम थका-हारा अपने छोटे से कमरे में लौट आता। उसे गाँव के खेत, पेड़ों की ठंडी छाँव, और माँ की ममतामयी आवाज़ याद आती। वह याद करता कैसे होली पर पूरा गाँव एक रंग में रंग जाता था और कैसे दिवाली पर हर घर दीयों की रोशनी से जगमगा उठता था। यहाँ शहर में त्योहार भी बस औपचारिकता बनकर रह गए थे। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। वह जिस चमक-धमक के पीछे भागा था, वह खोखली थी। असली खुशी तो उसके गाँव में, उसके अपनों के बीच थी। पत्र पढ़ते-पढ़ते अचानक जैसे उसके मन के कोने से आवाज़ आयी, “आ अब लौट चलें… !”

Also Read- लघुकथा:- सांवला रंग तो पुरुषों पर फबता है।” कहते हुए माँ....

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow