लघुकथा- जाली के पार …
Short Story: मीता (Meeta) खिड़की के पास बैठी उस धुँधले आसमान को देख रही थी, जहाँ सूरज डूबने की तैयारी कर रहा था पर बादलों ने उसकी....
लघुकथा-
लेखिका- नलिनी श्रीवास्तव नील
जाली के पार …
Short Story: मीता (Meeta) खिड़की के पास बैठी उस धुँधले आसमान को देख रही थी, जहाँ सूरज डूबने की तैयारी कर रहा था पर बादलों ने उसकी लाली को पूरी तरह से ढक लिया था। खिड़की के पार, सामने के घर में एक जाली लगी थी, एक चिड़िया प्रतिदिन आती और टूटी जाली से बाहर देखती रहती, कभी निकलने की कोशिश भी करती पर पंखों के घायल होने के डर से चुपचाप वापस उड़ जाती। न जाने इस जाली के इस पार खुले मटमैले बादलों में क्या देखती रहती।
आज भी मीता उस चिड़िया को बड़े ध्यान से देख रही थी। चिड़िया कुछ ज़्यादा ही उत्साहित लग रही थी, बदली छँट चुकी थी। थोड़ी सी मशक्कत के बाद चिड़िया टूटी जाली के पार थी। आसमान, अब पहले से अधिक विशाल और खुला लग रहा था… उसके पंख अब पूरी तरह से फैल सकते थे और वह हवा में नाच सकती थी।
मीता, जिसने बच्चों के विदेश जाने और पति के इस दुनिया में न रहने के बाद, बंगले में ख़ुद को क़ैद कर के अपना जीवन नीरस बना लिया था। कभी वह भी एक सामाजिक कार्यकर्ता थी।
लेकिन आज… ! उस चिड़िया ने सिर्फ एक जाली नहीं तोड़ी थी, अपने डर और संशय की बेड़ियों को भी तोड़ा था।
मीता ने देखा, जाली अभी भी वहीं थी पर वह चिड़िया उड़ चली थी, कहीं बहुत दूर अपने पंखों को आज़माने…!
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