इमामों, मुअज्जिनों और पुरोहितों को मिलने वाला मासिक मानदेय समाप्त, राज्य कैबिनेट की दूसरी बैठक में तुष्टिकरण की राजनीति पर कड़ा प्रहार।

पश्चिम बंगाल की नवगठित सरकार ने राज्य की प्रशासनिक और सामाजिक नीतियों में एक युगांतरकारी और बेहद बड़ा बदलाव

May 19, 2026 - 12:05
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इमामों, मुअज्जिनों और पुरोहितों को मिलने वाला मासिक मानदेय समाप्त, राज्य कैबिनेट की दूसरी बैठक में तुष्टिकरण की राजनीति पर कड़ा प्रहार।
इमामों, मुअज्जिनों और पुरोहितों को मिलने वाला मासिक मानदेय समाप्त, राज्य कैबिनेट की दूसरी बैठक में तुष्टिकरण की राजनीति पर कड़ा प्रहार।
  • पश्चिम बंगाल में नई सरकार का बड़ा प्रशासनिक नीतिगत फैसला, धर्म के आधार पर चलाई जा रही सभी वित्तीय सहायता योजनाएं बंद करने की मंजूरी
  • सरकारी खजाने के विवेकपूर्ण उपयोग पर बल, धार्मिक भत्तों की जगह सभी वर्गों के मेधावी छात्रों को छात्रवृत्ति देने की नई व्यवस्था लागू

पश्चिम बंगाल की नवगठित सरकार ने राज्य की प्रशासनिक और सामाजिक नीतियों में एक युगांतरकारी और बेहद बड़ा बदलाव करते हुए एक ऐतिहासिक निर्णय लिया है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की अध्यक्षता में राज्य सचिवालय 'नबन्ना' में संपन्न हुई कैबिनेट की दूसरी महत्वपूर्ण बैठक में यह आधिकारिक फैसला किया गया है कि राज्य में धर्म या धार्मिक श्रेणियों के आधार पर संचालित की जा रही सभी प्रकार की वित्तीय सहायता योजनाओं को पूरी तरह से बंद कर दिया जाएगा। सरकार के इस बड़े कदम को राज्य में लंबे समय से चली आ रही तथाकथित तुष्टिकरण की राजनीति पर एक निर्णायक प्रहार के रूप में देखा जा रहा है। शासन की ओर से यह स्पष्ट कर दिया गया है कि राज्य की धर्मनिरपेक्ष छवि को बनाए रखने और सरकारी खजाने के समतामूलक वितरण को सुनिश्चित करने के लिए यह कड़ा नीतिगत कदम उठाया जाना समय की मांग थी।

कैबिनेट द्वारा लिए गए इस प्रशासनिक निर्णय के तहत मुख्य रूप से उन योजनाओं को लक्षित किया गया है, जिनके माध्यम से विभिन्न धार्मिक स्थलों के प्रमोटरों या धार्मिक गुरुओं को सीधे सरकारी खजाने से मासिक आधार पर मानदेय अथवा वित्तीय भत्ते दिए जा रहे थे। इस नई नीति के प्रभावी होने के बाद पूर्ववर्ती सरकार द्वारा शुरू की गई इमामों, मुअज्जिनों और सनातन धर्म के पुरोहितों को दी जाने वाली मासिक वित्तीय सहायता को आगामी जून महीने से पूरी तरह से रोक दिया जाएगा। राज्य सरकार के सूचना एवं सांस्कृतिक कार्य विभाग के साथ-साथ अल्पसंख्यक मामलों और मदरसा शिक्षा विभाग द्वारा संचालित किए जा रहे ऐसे तमाम कार्यक्रम, जो किसी भी प्रकार की धार्मिक विशिष्टता या वर्गीकरण के आधार पर आधारित थे, वे केवल वर्तमान मई महीने के अंत तक ही लागू रहेंगे और एक जून से उनका अस्तित्व पूरी तरह समाप्त हो जाएगा।

सरकार की ओर से इस नीतिगत बदलाव की आधिकारिक घोषणा करते हुए महिला, बाल और सामाजिक कल्याण मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने प्रेस वार्ता में बताया कि राज्य की संचित निधि का उपयोग किसी विशिष्ट धार्मिक समुदाय को आर्थिक लाभ पहुंचाने के लिए नहीं किया जा सकता। उन्होंने स्पष्ट किया कि पिछली सरकार द्वारा मार्च महीने में ही इमामों के मानदेय को बढ़ाकर तीन हजार रुपये और मुअज्जिनों व पुरोहितों के भत्ते को दो हजार रुपये मासिक किया गया था, जिससे राज्य पर एक बड़ा वित्तीय बोझ पड़ रहा था। नई सरकार का मानना है कि करदाताओं के पैसे का उपयोग धार्मिक गतिविधियों के पोषण के बजाय सार्वजनिक कल्याण, स्वास्थ्य और ढांचागत विकास जैसी बुनियादी आवश्यकताओं को सुदृढ़ करने के लिए किया जाना चाहिए। इस निर्णय के संदर्भ में संबंधित विभागों को बजट आवंटन को संशोधित करने और आवश्यक अधिसूचना जारी करने के सख्त प्रशासनिक निर्देश भी दे दिए गए हैं।

कैबिनेट के इस बड़े निर्णय की मुख्य रूपरेखा

राज्य सरकार द्वारा धार्मिक आधार पर मिलने वाले भत्तों को बंद करने का यह निर्णय पूरी तरह से एक जून से प्रभावी होगा। हालांकि, सरकार ने यह पूरी तरह साफ कर दिया है कि इस नीतिगत बदलाव का असर राज्य के छात्रों को मिलने वाली किसी भी प्रकार की शैक्षणिक छात्रवृत्ति या मेधावी योजनाओं पर बिल्कुल नहीं पड़ेगा। विद्यार्थियों को दी जाने वाली सभी कल्याणकारी और प्रोत्साहन योजनाएं बिना किसी धार्मिक भेदभाव के पहले की तरह ही सुचारू रूप से चलती रहेंगी, बल्कि उनके बजटीय दायरे को और अधिक विस्तृत किया जाएगा।

धार्मिक तुष्टिकरण की नीति को पूरी तरह समाप्त करने के साथ ही इस कैबिनेट बैठक में सामाजिक न्याय और न्यायिक आदेशों के अनुपालन को लेकर एक और बहुत बड़ा फैसला लिया गया। राज्य सरकार ने वर्ष 2010 से लेकर 2024 के बीच राज्य की अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी सूची में शामिल की गई तमाम विसंगतिपूर्ण उपजातियों की सूची को तत्काल प्रभाव से निरस्त करने की मंजूरी दे दी है। यह कदम कलकत्ता उच्च न्यायालय के उस ऐतिहासिक निर्णय के तहत उठाया गया है, जिसमें न्यायालय ने पूर्व में किए गए व्यापक ओबीसी वर्गीकरण को असंवैधानिक ठहराया था, क्योंकि उसमें एक विशेष समुदाय के बड़े हिस्से को बिना किसी वैज्ञानिक सर्वे के आरक्षण के दायरे में शामिल कर लिया गया था। सरकार अब आरक्षण पात्रता और पिछड़ेपन के वास्तविक आकलन के लिए एक नए उच्चस्तरीय जांच पैनल का गठन करने जा रही है, जो पूरी तरह से पारदर्शी और विधिक मानकों के अनुरूप काम करेगा।

इस बड़े प्रशासनिक फेरबदल के समानांतर सरकार ने राज्य की महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के लिए अपनी महत्वाकांक्षी योजना 'अन्नपूर्णा योजना' को भी हरी झंडी दे दी है। इसके तहत आगामी एक जून से राज्य की पात्र महिलाओं को प्रत्येक महीने तीन हजार रुपये की वित्तीय सहायता सीधे उनके बैंक खातों में हस्तांतरित की जाएगी। यह योजना पूर्ववर्ती सरकार की 'लक्ष्मी भंडार' योजना का स्थान लेगी, जिसमें पहले महिलाओं को पंद्रह सौ रुपये दिए जाते थे। इस नई योजना की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जो महिलाएं पहले से इस प्रकार की सहायता प्राप्त कर रही थीं, उन्हें नए सिरे से आवेदन करने की कोई आवश्यकता नहीं होगी, बल्कि वे सीधे इस नई और दोगुनी राशि वाली योजना से जुड़ जाएंगी। इसके अलावा, नागरिकता संशोधन अधिनियम के तहत आवेदन करने वाली महिलाओं को भी इस योजना का लाभ देने का निर्णय लिया गया है।

इसके अतिरिक्त राज्य के सरकारी कर्मचारियों को एक लंबे समय से प्रतीक्षित बड़ी सौगात देते हुए मुख्यमंत्री ने सातवें राज्य वेतन आयोग के गठन के प्रस्ताव को भी अपनी कैबिनेट से मंजूरी दिला दी है। इस निर्णय से न केवल मुख्य प्रशासनिक विभागों के कर्मचारियों को लाभ होगा, बल्कि नगर निकायों, स्थानीय निकायों, शिक्षा बोर्डों और राज्य सहायता प्राप्त शैक्षणिक संस्थानों में कार्यरत लाखों कर्मचारियों के वेतन ढांचे में एक बड़ा और सकारात्मक सुधार देखने को मिलेगा। सरकार के इन ताबड़तोड़ फैसलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि राज्य अब एक नए प्रशासनिक ढर्रे की ओर बढ़ रहा है, जहां पारंपरिक वोट बैंक की राजनीति के स्थान पर समान विकास, कानून के शासन और वित्तीय अनुशासन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है।

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