गीत- मन: काश की ये जीवन भी एक मौसम की तरह होता....
काश की ये जीवन भी एक मौसम की तरह होता, कभी धूप ,कभी छांव तो कभी बादल बन जाता....
मन
रतन खंगारोत
लेखिका व समाज सेविका
काश की ये जीवन भी एक मौसम की तरह होता,
कभी धूप ,कभी छांव तो कभी बादल बन जाता।
कभी चिलचिलाती मई- जून सी धूप होता ,
पेड़ों की घनेरी छांव और ठंडी हवा में मन शीतल हो जाता।
तो कभी सावन - भादो की बरखा बन जाता,
भिगो कर अपने तन को , मन मोर बन जाता ,
फैला कर अपने पंख , मन नाच , नाच इठलाता।
इतना शुकून मिलता सितम्बर- अक्तूबर मे,
की ये जीवन हरियाली की चुनरिया ओढ इत- उत इतराता।
काश! की ये वक्त थोड़ा पिछे ले जा पाती,
और पौष- माह की ठीठुरन को, मेरी माँ की गोद मे मिटाती,
माँ का आँचल और माँ की ममता, मेरे सारे ताप को हर लेती।
सारे मास तो बीत गये, पर बैरी मनवा न माने,
फाल्गुन - चैत्र को देख कर , ये फिर से उमंग जगाए।
काश! की , काश ये जीवन मेरा पतझड़ ही बन जाए,
चिंता और परेशानियां हर बार झड़ती जाए,
और खुशिओं की नई कोपल हर वर्ष खिलती जाए।
काश ये मन मेरा, मेरी हसरते समझ जाए।।
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