73 साल तक 'लोहे के फेफड़े' से ली सांस! अमेरिका की आखिरी पोलियो मरीज मार्था लिलार्ड का 78 वर्ष की उम्र में निधन

'लोहे के फेफड़े' यानी आयरन लंग (Iron Lung) के सहारे 73 वर्षों तक सांस लेने वाली अमेरिका की आखिरी पोलियो मरीज मार्था लिलार्ड का 78 वर्ष की आयु में निधन हो गया है।

Jul 12, 2026 - 07:27
Jul 12, 2026 - 08:14
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73 साल तक 'लोहे के फेफड़े' से ली सांस! अमेरिका की आखिरी पोलियो मरीज मार्था लिलार्ड का 78 वर्ष की उम्र में निधन
आयरन लंग (लोहे के फेफड़े) मशीन के भीतर लेटी हुई मार्था लिलार्ड की एक ऐतिहासिक तस्वीर
  • Martha Lillard Passes Away: 'लोहे के फेफड़े' के सहारे 73 साल जिंदा रहने वाली मार्था लिलार्ड का निधन
  • Iron Lung Martha Lillard: कौन थीं अमेरिका की आखिरी पोलियो मरीज मार्था लिलार्ड, जिन्होंने मशीन में गुजारी जिंदगी
  • मशीन के सहारे 7 दशक से ज्यादा जीने वाली अमेरिका की आखिरी पोलियो मरीज मार्था लिलार्ड का ओक्लाहामा में निधन

चिकित्सा इतिहास और मानवीय जिजीविषा की एक बेमिसाल प्रतीक रहीं अमेरिका की आखिरी पोलियो मरीज मार्था लिलार्ड (Martha Lillard) का निधन हो गया है। वह 78 वर्ष की थीं। मार्था ने अपनी जिंदगी के करीब 73 साल 'आयरन लंग' (Iron Lung) यानी 'लोहे के फेफड़े' के नाम से पहचानी जाने वाली एक विशाल यांत्रिक मशीन के भीतर सांस लेते हुए गुजारे। उनकी छोटी बहन सिंडी मैकवे ने एसोसिएटेड प्रेस (AP) को आधिकारिक जानकारी देते हुए बताया कि मार्था ने 26 जून को ओक्लाहामा में इसी जीवन रक्षक मशीन के भीतर अपनी अंतिम सांस ली। मात्र 5 वर्ष की कोमल आयु में पोलियो की चपेट में आने के बाद मार्था की पूरी दुनिया इस मशीन के इर्द-गिर्द सिमट गई थी, लेकिन उन्होंने अपने मजबूत जज्बे से चिकित्सा विज्ञान के तमाम पुराने दावों को गलत साबित कर दिखाया।

यह दुखद और ऐतिहासिक घटना संयुक्त राज्य अमेरिका के ओक्लाहामा राज्य की है, जहां 26 जून को मार्था लिलार्ड ने दुनिया को अलविदा कह दिया। मार्था लिलार्ड कोई सामान्य महिला नहीं थीं, बल्कि वे दुनिया की उन बेहद चुनिंदा हस्तियों में शामिल थीं जो बीसवीं सदी के मध्य में फैले भयावह पोलियो वायरस के प्रकोप की जीवित गवाह थीं। वे अमेरिका की ऐसी आखिरी जीवित मरीज थीं जो अपनी श्वसन प्रक्रिया (Breathing) को सुचारू रखने के लिए पूरी तरह से 'आयरन लंग' तकनीक पर निर्भर थीं। उनका जाना चिकित्सा इतिहास के एक बड़े अध्याय के अंत जैसा है।

मार्था लिलार्ड के जीवन का यह कठिन और प्रेरणादायक सफर साल 1953 में शुरू हुआ था, जब वह महज 5 वर्ष की थीं। उस समय अमेरिका सहित दुनिया के कई देश पोलियो महामारी की चपेट में थे। वायरस ने मार्था के शरीर पर इतना गंभीर हमला किया कि उनके फेफड़ों ने प्राकृतिक रूप से काम करना बंद कर दिया और वे सांस लेने में असमर्थ हो गईं। उस दौर में जब आधुनिक वेंटिलेटर मौजूद नहीं थे, तब गंभीर मरीजों को जिंदा रखने के लिए 'आयरन लंग' नाम की मशीन का आविष्कार किया गया था। यह एक बड़ा धातु का बेलनाकार टैंक होता है, जो नकारात्मक दबाव (Negative Pressure) बनाकर फेफड़ों में हवा खींचने और बाहर निकालने में मदद करता है।

जब मार्था को इस मशीन में डाला गया, तो उस समय के डॉक्टरों ने उनकी बेहद नाजुक स्थिति को देखते हुए परिजनों को स्पष्ट कह दिया था कि वह 20 वर्ष से अधिक की आयु तक जीवित नहीं रह पाएंगी। हालांकि, मार्था ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने जीवन के 73 साल इसी पीले रंग की भारी-भरकम मशीन के अंदर बिताए। उनका सिर मशीन से बाहर रहता था, जबकि बाकी का पूरा शरीर सिलेंडर के भीतर बंद रहता था। इस सीमित जीवन के बावजूद उन्होंने अपने जीने के उत्साह को कभी कम नहीं होने दिया।

मार्था की छोटी बहन सिंडी मैकवे ने गहरा शोक व्यक्त करते हुए कहा कि उनकी बहन में जीने और अपनी परिस्थितियों को बेहतर बनाने का एक जबरदस्त उत्साह और अटूट जज्बा था। सिंडी ने पुरानी यादों को साझा करते हुए बताया कि भले ही डॉक्टरों ने उम्र की एक सीमा तय कर दी थी, लेकिन मार्था ने हर दिन को खुलकर जिया। सोशल मीडिया और वैश्विक चिकित्सा बिरादरी में भी मार्था के निधन पर शोक संवेदनाएं व्यक्त की जा रही हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि मार्था की कहानी यह दर्शाती है कि पोलियो जैसी घातक बीमारी ने इंसानी जिंदगियों को किस हद तक प्रभावित किया था और क्यों आज के दौर में टीकाकरण (Vaccination) इतना महत्वपूर्ण है।

मार्था लिलार्ड का जीवन और उनकी मृत्यु वैश्विक स्वास्थ्य संगठन और चिकित्सा जगत के लिए एक बहुत बड़ा अनुस्मारक (Reminder) है। यह मामला दुनिया को याद दिलाता है कि जोनास साल्क द्वारा साल 1955 में पोलियो की प्रभावी वैक्सीन विकसित किए जाने से ठीक पहले की दुनिया कैसी थी। मार्था जैसी शख्सियतों के संघर्ष ने ही दुनिया भर में पोलियो उन्मूलन अभियानों को गति देने की प्रेरणा दी। उनका जीवन यह भी साबित करता है कि इच्छाशक्ति के बल पर इंसान तकनीकी सीमाओं और शारीरिक अक्षमताओं के बावजूद एक लंबा और अर्थपूर्ण जीवन जी सकता है।

मार्था लिलार्ड के निधन के बाद अब अमेरिका में आधिकारिक तौर पर ऐसा कोई मरीज नहीं बचा है जो पोलियो के कारण पूरी तरह से इस पारंपरिक 'आयरन लंग' तकनीक पर निर्भर हो। यह मशीनें अब इतिहास के पन्नों और चिकित्सा संग्रहालयों (Medical Museums) का हिस्सा बन चुकी हैं। मार्था की कहानी को दुनिया भर के चिकित्सा इतिहास में एक मिसाल के तौर पर पढ़ाया और याद किया जाता रहेगा, ताकि आने वाली पीढ़ियां जान सकें कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और टीकों ने मानव जाति को कितनी बड़ी आपदाओं से सुरक्षित निकाला है।

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