Fake Affidavit Case: फर्जी हलफनामे से हासिल की थी पुलिस की नौकरी, 27 साल बाद अदालत ने सुनाई दोषी को सजा

फर्जी हलफनामे और दस्तावेजों के आधार पर पुलिस की नौकरी हासिल करने वाले एक आरोपी को करीब 27 साल पुराने मामले में अदालत ने दोषी पाते हुए सजा सुनाई है।

Jul 12, 2026 - 07:39
 0  1
Fake Affidavit Case: फर्जी हलफनामे से हासिल की थी पुलिस की नौकरी, 27 साल बाद अदालत ने सुनाई दोषी को सजा
Government Job Forgery

  • Police Job Fraud: जालसाजी कर महकमे में हुआ था शामिल, करीब 3 दशक बाद अदालत ने आरोपी को ठहराया कसूरवार
  • 27 साल तक पुलिस में की नौकरी, अब खुला फर्जी हलफनामे का राज; कोर्ट ने दोषी को सुनाई सख्त सजा
  • फर्जी दस्तावेज के आधार पर पुलिस विभाग में नौकरी पाने वाले आरोपी को 27 साल बाद कोर्ट ने दी सजा

सरकारी विभागों में नौकरी पाने के लिए धोखाधड़ी और फर्जी दस्तावेजों का सहारा लेने वालों के खिलाफ न्यायपालिका ने एक बार फिर कड़ा संदेश दिया है। एक पुराने मामले में त्वरित कार्रवाई करते हुए अदालत ने फर्जी हलफनामे (Fake Affidavit) के आधार पर पुलिस महकमे में नौकरी हासिल करने वाले एक व्यक्ति को दोषी करार देते हुए सजा सुनाई है। यह पूरा मामला करीब 27 साल पुराना है, जिसमें आरोपी ने भर्ती प्रक्रिया के दौरान गलत सूचनाएं और जाली साक्ष्य प्रस्तुत कर विभाग को गुमराह किया था। विभागीय स्तर पर हुई लंबी जांच और अदालती कार्यवाही के बाद अब जाकर इस मामले में अंतिम निर्णय आया है। अदालत के इस फैसले से साफ है कि चाहे कितना भी समय बीत जाए, कानून के हाथ से जालसाजी करने वाले बच नहीं सकते। इस मामले में अब आगे की विभागीय और कानूनी प्रक्रिया अमल में लाई जा रही है।

यह मामला एक ऐसे व्यक्ति से जुड़ा है जिसने लगभग तीन दशक पहले पुलिस बल में शामिल होने के लिए नियमों को ताक पर रख दिया था। आरोपी ने पुलिस भर्ती प्रक्रिया के दौरान अनिवार्य रूप से मांगे जाने वाले चरित्र और पृष्ठभूमि से संबंधित हलफनामे में झूठी जानकारियां दर्ज की थीं। उस समय दस्तावेजी सत्यापन (Document Verification) की सीमाओं का फायदा उठाकर वह नौकरी पाने में सफल रहा। हालांकि, बाद में जब विभाग को उसकी पृष्ठभूमि या हलफनामे में विसंगतियों की भनक लगी, तो इसके खिलाफ आंतरिक जांच शुरू की गई। मामला अदालत में पहुंचने के बाद 27 साल तक लंबी कानूनी लड़ाई चली, जिसके बाद न्यायपीठ ने आरोपी को जालसाजी का दोषी पाया।

इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत साल 1999 के आसपास हुई थी जब संबंधित राज्य या क्षेत्र में पुलिस आरक्षी या अन्य पदों के लिए भर्ती प्रक्रिया चल रही थी। आरोपी ने आवेदन के समय अपने पूर्ववृत्त, आपराधिक इतिहास (यदि कोई था) या शैक्षणिक योग्यता के संबंध में एक शपथ पत्र (Affidavit) जमा किया था, जो पूरी तरह सत्यापित नहीं था।

नौकरी ज्वाइन करने के कई वर्षों बाद, एक शिकायत के आधार पर जब पुलिस विभाग के सतर्कता प्रकोष्ठ (Vigilance Cell) ने इस मामले की दोबारा जांच की, तो हलफनामे में दी गई जानकारियां पूरी तरह से झूठी और मनगढ़ंत पाई गईं। विभाग ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी के खिलाफ धोखाधड़ी (IPC की विभिन्न संबंधित धाराओं) के तहत प्राथमिकी दर्ज कराई। मामला निचली अदालत से होते हुए सत्र न्यायालय तक पहुंचा। 27 वर्षों तक गवाहों के बयान, मूल दस्तावेजों की फॉरेंसिक जांच और दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने माना कि सरकारी सेवा में प्रवेश पाने के लिए जानबूझकर किया गया यह कृत्य एक गंभीर अपराध है।

अदालत का फैसला आने के बाद लोक अभियोजक (Public Prosecutor) ने कहा कि यह निर्णय उन सभी लोगों के लिए एक कड़ा सबक है जो शॉर्टकट या अनैतिक तरीकों से प्रशासनिक सेवाओं में घुसने का प्रयास करते हैं। उन्होंने कहा कि 27 साल का लंबा समय जरूर लगा, लेकिन सत्य और न्याय की जीत हुई। वहीं दूसरी ओर, आरोपी के वकील का कहना था कि उनका मुवक्किल इतने वर्षों तक विभाग में अपनी सेवाएं पूरी ईमानदारी से दे रहा था, और वे इस फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय (High Court) में अपील दायर करने पर विचार कर रहे हैं।

इस ऐतिहासिक फैसले का व्यापक प्रभाव प्रशासनिक व्यवस्था पर पड़ेगा। इससे सरकारी नौकरियों में नियुक्ति के समय होने वाले पुलिस वेरिफिकेशन और बैकग्राउंड चेक की प्रक्रिया को और अधिक कड़ा करने की जरूरत रेखांकित होती है। डिजिटल युग में अब हालांकि दस्तावेज तुरंत सत्यापित हो जाते हैं, लेकिन यह मामला यह भी दिखाता है कि पुराने दौर की खामियों को सुधारने के लिए न्यायपालिका कितनी प्रतिबद्ध है। इस फैसले से उन ईमानदार अभ्यर्थियों का मनोबल बढ़ेगा जो वर्षों तक कड़ी मेहनत करके परीक्षा पास करते हैं।

अदालत द्वारा सजा मुकर्रर किए जाने के बाद अब पुलिस विभाग आरोपी की सेवा शर्तों के अनुरूप उसकी पेंशन, ग्रेच्युटी या अन्य सेवा लाभों को रोकने या वापस लेने की प्रक्रिया शुरू करेगा। चूंकि नौकरी की बुनियाद ही धोखाधड़ी पर टिकी थी, इसलिए नियमानुसार उसकी पूरी सेवा अवधि को अवैध माना जा सकता है। आरोपी को हिरासत में लेकर जेल भेज दिया गया है, और यदि उसका पक्ष उच्च न्यायालय का रुख करता है, तो आगामी दिनों में ऊपरी अदालत की कानूनी टिप्पणियों पर नजर रहेगी।

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow