'मैग्नस कार्लसन ही हैं असली किंग': रूसी दिग्गज कार्पोव ने डी गुकेश की योग्यता पर उठाए गंभीर सवाल

हालांकि, अपनी आलोचना के बीच कार्पोव ने भारत में शतरंज के विकास के लिए चल रहे 'स्टेट प्रोग्राम' की जमकर तारीफ की। उन्होंने माना कि भारत ने जिस तरह से शतरंज को सरकारी और सामाजिक स्तर पर समर्थन दिया है, वह अद्भुत है

Mar 21, 2026 - 12:15
 0  4
'मैग्नस कार्लसन ही हैं असली किंग': रूसी दिग्गज कार्पोव ने डी गुकेश की योग्यता पर उठाए गंभीर सवाल
'मैग्नस कार्लसन ही हैं असली किंग': रूसी दिग्गज कार्पोव ने डी गुकेश की योग्यता पर उठाए गंभीर सवाल
  • शतरंज की दुनिया में मची खलबली: अनातोली कार्पोव ने गुकेश की विश्व चैंपियनशिप जीत को बताया महज एक 'संयोग'
  • चीन के डिंग लिरेन की गलती और कार्लसन की गैरमौजूदगी: कार्पोव ने भारतीय ग्रैंडमास्टर की जीत के पीछे गिनाए ये कारण

शतरंज की बिसात पर मोहरों की चाल से कहीं अधिक अब बयानों की गूंज सुनाई दे रही है। रूसी शतरंज के दिग्गज और पूर्व विश्व चैंपियन अनातोली कार्पोव ने हाल ही में एक इंटरव्यू के दौरान भारतीय ग्रैंडमास्टर डी गुकेश की विश्व चैंपियनशिप जीत पर तीखी टिप्पणी कर वैश्विक खेल जगत में एक नई बहस छेड़ दी है। कार्पोव ने गुकेश की ऐतिहासिक सफलता को पूरी तरह से 'संयोग' करार देते हुए तर्क दिया है कि उनकी यह जीत उनकी श्रेष्ठता के बजाय प्रतिद्वंद्वी की गलतियों और विशेष परिस्थितियों का परिणाम थी। 74 वर्षीय कार्पोव, जो खुद शतरंज के इतिहास के सबसे महान खिलाड़ियों में से एक माने जाते हैं, उनके इस बयान ने भारतीय प्रशंसकों और खेल विश्लेषकों को स्तब्ध कर दिया है। यह विवाद ऐसे समय में आया है जब गुकेश अपनी अगली खिताबी रक्षा की तैयारियों में जुटे हैं और उनकी मौजूदा फॉर्म को लेकर पहले ही कई तरह की चर्चाएं चल रही हैं।

कार्पोव के विश्लेषण का मुख्य आधार दिसंबर 2024 में सिंगापुर में हुआ वह ऐतिहासिक मुकाबला है, जहां 18 वर्षीय गुकेश ने चीन के डिंग लिरेन को हराकर दुनिया के सबसे युवा विश्व चैंपियन बनने का गौरव हासिल किया था। रूसी दिग्गज का कहना है कि डिंग लिरेन उस मैच को हारने वाले नहीं थे, बल्कि उन्होंने एक ऐसी गलती की जिसे टाला जा सकता था। कार्पोव के अनुसार, यदि डिंग लिरेन ने खेल के उस निर्णायक मोड़ पर वह चूक न की होती, तो आज भी विश्व चैंपियन का ताज उनके पास ही होता। उन्होंने सीधे तौर पर कहा कि गुकेश को यह खिताब केवल इसलिए मिला क्योंकि उनके प्रतिद्वंद्वी ने अपनी क्षमता के अनुरूप खेल नहीं दिखाया। यह पहली बार नहीं है जब किसी रूसी खिलाड़ी ने गुकेश की सफलता को कमतर आंकने की कोशिश की है, लेकिन कार्पोव जैसे कद के खिलाड़ी का ऐसा कहना खेल की गरिमा और भविष्य की प्रतिस्पर्धाओं पर बड़े सवाल खड़े करता है। अनातोली कार्पोव ने 1975 में स्वयं विश्व चैंपियन का खिताब तब जीता था जब बॉबी फिशर ने उनके खिलाफ खेलने से इनकार कर दिया था। दिलचस्प बात यह है कि अपने हालिया इंटरव्यू में कार्पोव ने यह भी स्वीकार किया कि यदि गुकेश की जीत को संयोग माना जाए, तो उनकी अपनी पहली खिताबी जीत भी उसी श्रेणी में आती है।

रूसी दिग्गज ने न केवल गुकेश की जीत पर सवाल उठाए, बल्कि मैग्नस कार्लसन को लेकर भी एक बड़ा दावा किया। कार्पोव का मानना है कि भले ही आधिकारिक रूप से गुकेश विश्व चैंपियन हैं, लेकिन व्यावहारिक रूप से मैग्नस कार्लसन ही आज भी इस खेल के असली राजा हैं। उनके अनुसार, कार्लसन ने खुद स्वेच्छा से शास्त्रीय (क्लासिकल) शतरंज के खिताब को छोड़ा है, और यदि वे आज भी इस प्रारूप में खेल रहे होते, तो किसी भी अन्य खिलाड़ी के लिए चैंपियन बनना असंभव होता। कार्पोव ने जोर देकर कहा कि जब तक दुनिया का नंबर एक खिलाड़ी प्रतियोगिता से बाहर है, तब तक आधिकारिक चैंपियन को 'निर्विवाद' नहीं माना जा सकता। यह बयान कार्लसन की उस विरासत को और पुख्ता करता है जिसने पिछले एक दशक से अधिक समय तक शतरंज की दुनिया पर एकछत्र राज किया है।

हालांकि, अपनी आलोचना के बीच कार्पोव ने भारत में शतरंज के विकास के लिए चल रहे 'स्टेट प्रोग्राम' की जमकर तारीफ की। उन्होंने माना कि भारत ने जिस तरह से शतरंज को सरकारी और सामाजिक स्तर पर समर्थन दिया है, वह अद्भुत है। कार्पोव ने बताया कि भारतीय खिलाड़ियों को मिलने वाली सुविधाओं, जैसे कि उनके रहने और यात्रा के लिए किए जाने वाले प्रबंध, ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी जड़ें जमाने में मदद की है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि आज अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों में भारतीय खिलाड़ियों का दबदबा इतना बढ़ गया है कि यूरोपीय आयोजक उनके प्रवेश को सीमित करने के बारे में सोचने लगे हैं। यह विरोधाभास कार्पोव के बयान में साफ दिखता है—एक तरफ वे गुकेश की व्यक्तिगत जीत को भाग्य का खेल बताते हैं, तो दूसरी तरफ वे भारत की समग्र शतरंज व्यवस्था को विश्व में सबसे शक्तिशाली मानते हैं।

गुकेश के लिए यह समय काफी चुनौतीपूर्ण रहा है, क्योंकि विश्व चैंपियन बनने के बाद उनकी फॉर्म में गिरावट देखी गई है। हाल ही में टाटा स्टील चेस और प्राग इंटरनेशनल चेस फेस्टिवल जैसे टूर्नामेंटों में उनका प्रदर्शन औसत रहा है, जहां वे तालिका के निचले पायदानों पर रहे। कार्पोव के बयानों को इसी संदर्भ में देखा जा रहा है कि क्या गुकेश वास्तव में लंबे समय तक इस ताज को संभाल पाएंगे। शतरंज के जानकारों का कहना है कि किसी भी युवा चैंपियन के लिए खिताबी जीत के बाद की अवधि मानसिक और तकनीकी रूप से कठिन होती है। गुकेश, जिन्होंने गैरी कास्पारोव का रिकॉर्ड तोड़ते हुए सबसे कम उम्र में यह मुकाम हासिल किया, उनके सामने अब अपनी योग्यता को बार-बार साबित करने की चुनौती है, विशेषकर तब जब खेल के पुराने दिग्गज उन पर उंगली उठा रहे हों।

रूसी खेमे की ओर से आ रहे ये बयान केवल व्यक्तिगत नहीं हैं, बल्कि ये शतरंज की दुनिया में बदलती शक्ति संरचना को भी दर्शाते हैं। दशकों तक रूस (पूर्व सोवियत संघ) का इस खेल पर पूर्ण नियंत्रण रहा, लेकिन अब भारत और उज्बेकिस्तान जैसे देशों के उदय ने पुरानी ताकतों को हाशिए पर धकेल दिया है। व्लादिमीर क्रैमनिक और अब कार्पोव जैसे दिग्गजों की टिप्पणियां इसी हताशा का परिणाम मानी जा रही हैं। क्रैमनिक ने तो गुकेश की जीत के समय यहां तक कह दिया था कि यह 'शतरंज के अंत' जैसा है। इन बयानों के पीछे की कड़वाहट खेल की गुणवत्ता से कहीं अधिक वर्चस्व की जंग से जुड़ी हुई प्रतीत होती है, जहां पुरानी पीढ़ी नई पीढ़ी के बदलावों को स्वीकार करने में संघर्ष कर रही है।

आने वाले महीनों में होने वाले 'कैंडिडेट्स 2026' और उसके बाद की खिताबी जंग यह तय करेगी कि क्या कार्पोव की भविष्यवाणियां सही साबित होती हैं या गुकेश अपनी चमक से इन आलोचनाओं को शांत कर देंगे। फिलहाल, साइप्रस में होने वाले कैंडिडेट्स टूर्नामेंट पर सबकी निगाहें टिकी हैं, जहां गुकेश के अगले प्रतिद्वंद्वी का फैसला होगा। कार्पोव की टिप्पणियों ने इस मुकाबले के लिए माहौल को और अधिक गरमा दिया है। यदि गुकेश अपने खिताब की सफलतापूर्वक रक्षा करते हैं, तो यह न केवल उनके आलोचकों के लिए करारा जवाब होगा, बल्कि आधुनिक शतरंज के इतिहास में एक नए स्वर्ण युग की शुरुआत भी होगी। तब तक, शतरंज की बिसात पर यह जुबानी जंग जारी रहने की पूरी उम्मीद है।

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow