अयोध्या राम मंदिर के चढ़ावे में सेंधमारी का सनसनीखेज तरीका आया सामने, बाथरूम जाने के बहाने साफ की जा रही थी दान की भारी-भरकम राशि

इस पूरे वित्तीय गबन की क्रोनोलॉजी और इसकी शुरुआत की कड़ियों को जोड़ने पर पता चलता है कि यह संगठित खेल काफी लंबे समय से चल रहा था। जून महीने के शुरुआती सप्ताह में जब ट्रस्ट के ही कुछ निष्ठावान सेवादारों ने नकद प्रक्रिया से जुड़े कर्मचारियों की संदिग्ध गतिविधियों की शिकायत की, तब जाकर आंतरिक जांच का पहिया घू

Jun 19, 2026 - 16:25
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अयोध्या राम मंदिर के चढ़ावे में सेंधमारी का सनसनीखेज तरीका आया सामने, बाथरूम जाने के बहाने साफ की जा रही थी दान की भारी-भरकम राशि
अयोध्या राम मंदिर के चढ़ावे में सेंधमारी का सनसनीखेज तरीका आया सामने, बाथरूम जाने के बहाने साफ की जा रही थी दान की भारी-भरकम राशि

  • दानपात्रों से सीधे नकदी और सोने-चांदी के गबन को लेकर विशेष जांच दल की तफ्तीश तेज, तलाशी के दौरान यात्री सुविधा केंद्र से बरामद हुए रुपए
  • बिना दान पर्ची और गुप्त दान की काउंटिंग प्रक्रिया में हुई भारी प्रशासनिक विसंगति, सुरक्षा पर करोड़ों खर्च होने के बावजूद व्यवस्था में सेंध

अयोध्या में नवनिर्मित भव्य राम मंदिर में प्रभु श्री राम के चरणों में अर्पित किए जाने वाले चढ़ावे और दान राशि में करोड़ों रुपए की भारी वित्तीय अनियमितता के मामले में नित नए और होश उड़ा देने वाले खुलासे हो रहे हैं। इस महाघोटाले की जांच के लिए गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) की पड़ताल में चोरी के ऐसे शातिराना और सनसनीखेज तौर-तरीके सामने आए हैं, जिसे जानकर हर कोई स्तब्ध रह गया है। जांच के दौरान यह बात प्रमुखता से सामने आई है कि मंदिर के गुप्त दान और नकदी की गिनती (काउंटिंग) की प्रक्रिया से जुड़े कुछ संदिग्ध कर्मचारी बेहद चालाकी से सुरक्षा व्यवस्था को धता बता रहे थे। ये लोग नोटों की गिनती के दौरान बार-बार बाथरूम जाने का बहाना बनाते थे और अपने कपड़ों व अन्य गुप्त तरीकों से नकदी छिपाकर उसे सीधे परिसर में स्थित यात्री सुविधा केंद्र के शौचालयों तक पहुंचा देते थे, जहां से बाद में इस अवैध रकम को बाहर ठिकाने लगाया जाता था।

इस पूरे संवेदनशील मामले की प्रशासनिक और जमीनी पड़ताल जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे यह स्पष्ट हो रहा है कि इस बड़ी हेराफेरी की भनक श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के वरिष्ठ पदाधिकारियों को काफी पहले ही लग चुकी थी। सूत्रों के अनुसार, ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और अन्य जिम्मेदार अधिकारियों को गुप्त सूचना मिली थी कि नकद प्रबंधन विभाग में कुछ बड़ा खेल चल रहा है। इसके बाद जब संदिग्ध रूप से काम कर रहे कुछ लोगों की औचक शारीरिक तलाशी ली गई, तो उनके पास से भारी मात्रा में अघोषित नकदी बरामद हुई। सबसे चौंकाने वाली बात तब सामने आई जब सुरक्षा विंग ने यात्री सुविधा केंद्र के बाथरूम परिसरों की सघन चेकिंग की, जहां छिपाकर रखे गए नोटों के बंडल बरामद किए गए। शुरुआत में बदनामी और करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचने के डर से इस मामले को दबाने का प्रयास किया गया था, लेकिन विसंगति का दायरा बड़ा होने के कारण यह मामला अब पूरी तरह से सार्वजनिक हो चुका है।

राम मंदिर परिसर में दान प्रबंधन और सुरक्षा का ऑडिट वित्तीय विवरण

  • दान का पैमाना: पिछले 11 महीनों के भीतर राम मंदिर में विभिन्न माध्यमों और दानपात्रों से लगभग 83 करोड़ रुपए की भारी-भरकम धनराशि प्राप्त हुई है।

  • सुरक्षा बजट: इसी 11 महीने की लघु अवधि के दौरान मंदिर परिसर की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा व्यवस्था, डिजिटल सर्विलांस और मैनपावर पर करीब 10 करोड़ रुपए खर्च किए गए।

  • गड़बड़ी का लूपहोल: बिना किसी पुख्ता रसीद या बिना लेखा-जोखा वाले गुप्त दान तथा श्रद्धालुओं द्वारा सीधे दानपात्र में डाले गए सोने-चांदी के आभूषणों की काउंटिंग के दौरान ही सबसे अधिक हेर-फेर को अंजाम दिया गया।

इस पूरे वित्तीय गबन की क्रोनोलॉजी और इसकी शुरुआत की कड़ियों को जोड़ने पर पता चलता है कि यह संगठित खेल काफी लंबे समय से चल रहा था। जून महीने के शुरुआती सप्ताह में जब ट्रस्ट के ही कुछ निष्ठावान सेवादारों ने नकद प्रक्रिया से जुड़े कर्मचारियों की संदिग्ध गतिविधियों की शिकायत की, तब जाकर आंतरिक जांच का पहिया घूमा था। जांच टीम जब कुछ संदिग्धों के ठिकानों पर पहुंची, तो वहां की स्थिति देखकर अधिकारियों के होश उड़ गए। मंदिर के एक संविदा कर्मचारी लवकुश मिश्रा के निजी आवास पर जब एसआईटी और आंतरिक सतर्कता दल ने छापेमारी की, तो वहां परिसर में बने गोबर के ढेर और अन्य अवांछित स्थानों के नीचे छिपाकर रखे गए लगभग 10 से 12 लाख रुपए की अवैध नकदी बरामद की गई। इसके तुरंत बाद उसके सगे बहनोई अनुकल्प मिश्रा और कुछ अन्य करीबियों के घरों से भी लाखों रुपए के वित्तीय लेन-देन और संदेहास्पद बैंक खातों के दस्तावेज हाथ लगे, जो इस पूरी साजिश की गहराई को प्रमाणित करते हैं।

इस सनसनीखेज चोरी के पीछे जो सबसे बड़ा प्रशासनिक लूपहोल यानी व्यवस्थागत कमजोरी सामने आई है, वह बिना दान पर्ची और सीधे आभूषणों को दानपात्र में डालने की ढीली व्यवस्था से जुड़ी है। राम मंदिर में प्रतिदिन देश-विदेश से आने वाले लाखों श्रद्धालु अपनी मन्नतें पूरी होने पर सीधे दानपात्रों में सोने के सिक्के, चांदी की शिलाएं, चेन और कीमती हीरे जड़ित आभूषण डाल देते हैं। चूंकि इन आभूषणों की तत्काल कोई डिजिटल रसीद या ऑन-स्पॉट वजन रिकॉर्ड करने की पारदर्शी व्यवस्था स्थापित नहीं थी, इसलिए काउंटिंग टीम में शामिल शातिर दिमाग लोगों ने इसका पूरा फायदा उठाया। आरोप तो यहां तक लग रहे हैं कि मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए असली आभूषणों को बेहद शातिराना तरीके से नकली या कम वजनी धातुओं से बदल दिया गया। जब तक मुख्य ऑडिट टीम को इस विसंगति का आभास होता, तब तक करोड़ों रुपए के सोने और चांदी के आभूषणों को व्यवस्था से पूरी तरह साफ किया जा चुका था।

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित तीन सदस्यीय विशेष जांच दल (एसआईटी) ने वर्तमान में अयोध्या के ही एक 'ग्रीन हाउस' नामक परिसर में अपना अस्थायी मुख्यालय बना रखा है, जहां से इस पूरे मामले की चौबीसों घंटे मॉनिटरिंग और पूछताछ की जा रही है। एसआईटी के राडार पर वर्तमान में वे 44 कर्मचारी हैं जो दो अलग-अलग शिफ्टों में आठ अत्याधुनिक सीसीटीवी कैमरों की कड़ी निगरानी में मशीनों के जरिए नोटों की गिनती का काम करते थे। इन 44 कर्मचारियों में से लगभग 40 कर्मचारी बैंक और उसके द्वारा अनुबंधित आउटसोर्सिंग एजेंसी के हैं, जबकि महज 4 से 5 लोग ही मंदिर ट्रस्ट की तरफ से सुपरविजन के लिए तैनात थे। जांच एजेंसियां इस बात की गहनता से पड़ताल कर रही हैं कि आखिर 8 सीसीटीवी कैमरों और दो सशस्त्र सुरक्षा गार्डों की मौजूदगी के बावजूद ये कर्मचारी नोटों की गड्डियां अपनी जेबों में छिपाने और बार-बार शौचालय जाने के बहाने उन्हें बाहर भेजने में कैसे सफल रहे।

इस पूरे घटनाक्रम में एक और बेहद गंभीर पहलू सामने आ रहा है जो मंदिर प्रबंधन से जुड़े कुछ प्रभावशाली लोगों के चहेतों की संदेहास्पद भूमिका से संबंधित है। आरोप है कि ट्रस्ट के कुछ जिम्मेदार पदाधिकारियों के पूर्व स्टाफ और ड्राइवरों ने मंदिर की आंतरिक व्यवस्था में अपनी पहुंच का नाजायज फायदा उठाते हुए बाहर से आने वाले बड़े उद्योगपतियों और करोड़पति श्रद्धालुओं से सीधे संपर्क साध रखे थे। इन रसूखदार लोगों ने अपने खास करीबियों और अकुशल रिश्तेदारों को बैंक की काउंटिंग टीम और वीआईपी सुरक्षा विंग में नौकरियां दिलवाईं, जिन्होंने बाद में इस पूरे गबन को अंजाम दिया। सबसे गंभीर बात यह है कि आंतरिक तकनीकी जांच में यह बात भी सामने आई है कि एक मुख्य सेवादार ने पिछले आठ महीनों के महत्वपूर्ण सीसीटीवी फुटेज को डिजिटल सर्वर से पूरी तरह डिलीट या करप्ट कर दिया है, ताकि चोरी के इस स्थापित तरीके का कोई पुख्ता वीडियो साक्ष्य अदालत के सामने पेश न किया जा सके।

अयोध्या पहुंचे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी इस पूरे मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए अपना कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है। मुख्यमंत्री ने देश भर के राम भक्तों को पूरी तरह से आश्वस्त करते हुए कहा है कि ट्रस्ट के अनुरोध पर जो एसआईटी गठित की गई है, वह पूरी निष्पक्षता के साथ दूध का दूध और पानी का पानी करके रहेगी। राज्य सरकार ने इस मामले में जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाने के निर्देश दिए हैं और जांच एजेंसी को पूरी छूट दी है कि चाहे कोई कितना भी बड़ा अधिकारी, बैंक कर्मी या ट्रस्ट का सेवादार क्यों न हो, यदि उसकी संलिप्तता के साक्ष्य मिलते हैं तो उसके खिलाफ कठोरतम विधिक कार्रवाई की जाए। वर्तमान में एसआईटी अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट को अंतिम रूप देने में जुटी है, जिसके बाद इस पूरे मामले में कई बड़ी गिरफ्तारियां और संपत्तियों की कुर्की जैसी बड़ी दंडात्मक कार्रवाइयां देखने को मिल सकती हैं।

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