बड़ी आंत में पनपने वाले कोलन कैंसर के साइलेंट लक्षण, जानिए शरीर में होने वाले इन मामूली बदलावों को क्यों नहीं करना चाहिए नजरअंदाज
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और वैश्विक स्वास्थ्य परिदृश्य में कोलन कैंसर, जिसे आमतौर पर बड़ी आंत का कैंसर या कोलोरेक्टल
- कोलोनोस्कोपी और स्क्रीनिंग टेस्ट के माध्यम से शुरुआत में ही कैसे करें कोलन कैंसर की पहचान, चिकित्सा जगत से जानिए बचाव के तरीके
- बदलती खान-पान की आदतें और सुस्त जीवनशैली कैसे बढ़ा रही हैं कोलन कैंसर का खतरा, समय रहते जांच कराने से पूरी तरह संभव है इलाज
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और वैश्विक स्वास्थ्य परिदृश्य में कोलन कैंसर, जिसे आमतौर पर बड़ी आंत का कैंसर या कोलोरेक्टल कैंसर भी कहा जाता है, एक अत्यंत गंभीर और तेजी से बढ़ती हुई स्वास्थ्य चुनौती के रूप में सामने आया है। मानव शरीर के पाचन तंत्र के अंतिम हिस्से यानी बड़ी आंत में विकसित होने वाली यह बीमारी शुरुआत में बेहद सामान्य और छोटे गैर-कैंसरयुक्त ऊतकों के समूह के रूप में शुरू होती है, जिन्हें चिकित्सा की भाषा में 'पॉलीप्स' कहा जाता है। समय बीतने के साथ यही मामूली पॉलीप्स धीरे-धीरे घातक कैंसर कोशिकाओं का रूप धारण कर लेते हैं, जो धीरे-धीरे आंतों की दीवारों को भेदते हुए शरीर के अन्य अंगों तक फैल सकती हैं। समकालीन समय में खराब जीवनशैली, प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों (प्रोसेस्ड फूड) के अत्यधिक सेवन और शारीरिक निष्क्रियता के कारण युवा आबादी में भी इस कैंसर के मामले काफी तेजी से बढ़े हैं, जिसके चलते इसके शुरुआती लक्षणों और पहचान के तरीकों को लेकर व्यापक सामाजिक जागरूकता की सख्त आवश्यकता महसूस की जा रही है।
कोलन कैंसर के शुरुआती और सबसे प्राथमिक लक्षणों की बात की जाए, तो पाचन क्रिया और मल विसर्जन की आदतों में अचानक आने वाला कोई भी दीर्घकालिक या असामान्य बदलाव इसका पहला बड़ा संकेत हो सकता है। यदि किसी व्यक्ति को लगातार कई हफ्तों तक अत्यधिक कब्ज (कॉन्स्टिपेशन) की शिकायत रहती है या फिर बिना किसी स्पष्ट कारण के बार-बार दस्त (डायरिया) होने लगते हैं, तो इसे बिल्कुल भी हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। इसके अलावा, मल के आकार का अचानक बेहद पतला हो जाना या मल त्याग करने के बाद भी पेट पूरी तरह साफ न होने का लगातार अहसास बने रहना भी बड़ी आंत के भीतर पनप रहे किसी अवरोध या ट्यूमर की ओर सीधा इशारा करता है। इन सभी लक्षणों को अक्सर लोग सामान्य गैस, अपच या बवासीर (पाइल्स) समझकर लंबे समय तक अनदेखा करते रहते हैं, जिससे बीमारी अंदर ही अंदर अधिक गंभीर और एडवांस स्टेज में पहुंच जाती है।
इस जानलेवा बीमारी का एक और सबसे स्पष्ट और डरावना लक्षण मल विसर्जन के दौरान या मल के साथ गहरे लाल अथवा काले रंग के खून का आना है। मलाशय से होने वाले इस रक्तस्राव को अक्सर लोग बवासीर की समस्या मानकर घरेलू उपचार या दर्द निवारक दवाएं खाना शुरू कर देते हैं, जो कि एक बेहद जानलेवा भूल साबित हो सकती है। कोलन कैंसर के मामलों में ट्यूमर से होने वाला रक्तस्राव कई बार इतना सूक्ष्म होता है कि वह नग्न आंखों से दिखाई नहीं देता, लेकिन इसके कारण शरीर के भीतर लगातार खून की कमी होने लगती है। यदि बिना किसी अन्य बीमारी के शरीर में हीमोग्लोबिन का स्तर लगातार गिर रहा हो, व्यक्ति को अत्यधिक कमजोरी, थकान और हर समय सुस्ती महसूस होती हो, तो यह आंतों के भीतर होने वाले आंतरिक रक्तस्राव और एनीमिया का एक बहुत बड़ा और पुख्ता संकेत माना जाता है। यदि बिना किसी डाइटिंग, कसरत या विशेष प्रयास के आपके शरीर का वजन अचानक बहुत तेजी से घटने लगा है, और साथ ही पेट में लगातार ऐंठन, दर्द, सूजन या भारीपन की शिकायत बनी रहती है, तो यह कैंसर कोशिकाओं द्वारा शरीर की ऊर्जा सोखने और पाचन तंत्र में बाधा उत्पन्न करने का स्पष्ट संकेत है।
चिकित्सा जगत के डॉक्टरों और ओंकोलॉजिस्ट्स के अनुसार, कोलन कैंसर का सबसे शुरुआती चरण में ही पता लगाने का सबसे अचूक, प्रामाणिक और स्वर्ण मानक (गोल्ड स्टैंडर्ड) तरीका 'कोलोनोस्कोपी' (Colonoscopy) जांच है। इस आधुनिक चिकित्सा प्रक्रिया के अंतर्गत एक पतली, लचीली और कैमरे से युक्त ट्यूब को मलाशय के रास्ते बड़ी आंत के भीतर डाला जाता है, जिससे डॉक्टर आंत की आंतरिक परतों का स्क्रीन पर सीधा और अत्यधिक स्पष्ट विजुअल देख सकते हैं। इस जांच की सबसे बड़ी खूबी यह है कि आंत के भीतर किसी भी प्रकार के पॉलीप या संदिग्ध गांठ के दिखने पर डॉक्टर न केवल उसकी लाइव इमेज ले सकते हैं, बल्कि उसी समय उस पॉलीप को काटकर बाहर निकाल सकते हैं और उसकी बायोप्सी (Biopsy) करा सकते हैं, जिससे कैंसर को पहले चरण में ही बढ़ने से पहले पूरी तरह से समाप्त किया जा सकता है।
कोलोनोस्कोपी के अतिरिक्त भी वर्तमान समय में कई अन्य आधुनिक और कम आक्रामक (नॉन-इनवेसिव) स्क्रीनिंग टेस्ट उपलब्ध हैं, जिनकी मदद से शुरुआती दौर में ही इस बीमारी के खतरों को भांपा जा सकता है। इनमें सबसे प्रमुख 'फिकल ऑकल्ट ब्लड टेस्ट' (FOBT) और 'फिकल इम्युनोकेमिकल टेस्ट' (FIT) शामिल हैं, जो मल के भीतर छिपे हुए खून के सूक्ष्म अंशों और हीमोग्लोबिन के स्तर की सटीक जांच करते हैं। इसके अलावा, उच्च जोखिम वाले मरीजों के लिए सीटी कोलोनोग्राफी (वर्चुअल कोलोनोस्कोपी) और स्टूल डीएनए टेस्ट जैसे उन्नत परीक्षण भी काफी मददगार साबित होते हैं। चिकित्सा विशेषज्ञों का यह कड़ा परामर्श है कि प्रत्येक व्यक्ति को, विशेष रूप से जिनकी उम्र 45 वर्ष से अधिक हो चुकी है, या जिनके परिवार में पहले किसी को कोलोरेक्टल कैंसर का इतिहास रहा हो, उन्हें हर कुछ वर्षों के अंतराल पर ये स्क्रीनिंग टेस्ट अनिवार्य रूप से करवाने चाहिए।
इस गंभीर बीमारी के प्रमुख कारणों और जोखिम भरे कारकों पर प्रकाश डाला जाए, तो आनुवंशिकी (जेनेटिक्स) के साथ-साथ हमारी आधुनिक और गतिहीन दिनचर्या इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार पाई गई है। जो लोग अपने दैनिक आहार में अत्यधिक मात्रा में रेड मीट (लाल मांस), प्रोसेस्ड मीट, मैदा, चीनी और अत्यधिक तैलीय या जंक फूड का सेवन करते हैं और जिनके भोजन में फाइबर (रेशेदार तत्वों) की मात्रा न्यूनतम होती है, उनकी आंतों में विषाक्त पदार्थ लंबे समय तक जमा रहते हैं, जिससे कैंसर का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। इसके अतिरिक्त, अत्यधिक धूम्रपान, शराब का नियमित सेवन, मोटापा, शारीरिक व्यायाम न करना और लंबे समय से आंतों की पुरानी सूजन संबंधी बीमारी जैसे अल्सरेटिव कोलाइटिस या क्रोहन रोग से पीड़ित होना भी कोलन कैंसर के विकास को बहुत तेजी से उत्प्रेरित करता है।
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