अमेरिका और ईरान के बीच महीनों से जारी भीषण युद्ध पर लगा पूर्णविराम, दोनों देशों के बीच हुआ ऐतिहासिक शांति समझौता

मध्य पूर्व एशिया में पिछले कई महीनों से जारी भीषण सैन्य टकराव और विनाशकारी युद्ध के बाद आखिरकार एक राहत भरी

Jun 16, 2026 - 12:10
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अमेरिका और ईरान के बीच महीनों से जारी भीषण युद्ध पर लगा पूर्णविराम, दोनों देशों के बीच हुआ ऐतिहासिक शांति समझौता
अमेरिका और ईरान के बीच महीनों से जारी भीषण युद्ध पर लगा पूर्णविराम, दोनों देशों के बीच हुआ ऐतिहासिक शांति समझौता
  • वैश्विक अर्थव्यवस्था को मिली बड़ी राहत, तनाव खत्म होने के बाद फिर से खुलेगा दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य
  • खाड़ी क्षेत्र में पलटी जंग की बाजी; युद्ध विराम के लिए राजी हुआ ईरान, अमेरिकी नौसेना हटाएगी बंदरगाहों की नाकेबंदी

मध्य पूर्व एशिया में पिछले कई महीनों से जारी भीषण सैन्य टकराव और विनाशकारी युद्ध के बाद आखिरकार एक राहत भरी खबर सामने आई है, जिसने वैश्विक स्तर पर बने तनाव को काफी हद तक कम कर दिया है। अमेरिका और ईरान के बीच चल रही सीधी सैन्य जंग अब पूरी तरह से समाप्त होने की कगार पर पहुंच गई है, क्योंकि दोनों देशों ने व्यापक शांति समझौते के अंतिम मसौदे पर अपनी सहमति दे दी है। इस ऐतिहासिक समझौते के बाद लंबे समय से बंद पड़ा दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्ग यानी होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) एक बार फिर से अंतरराष्ट्रीय जहाजों की आवाजाही के लिए खुलने जा रहा है। इस युद्ध की वजह से न केवल खाड़ी देशों में भारी तबाही हुई थी, बल्कि पूरी दुनिया में कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित होने से ईंधन की कीमतें आसमान छूने लगी थीं। इस गंभीर वैश्विक संकट को टालने और दोनों महाशक्तियों को एक मंच पर लाने के लिए कई क्षेत्रीय देशों ने महीनों तक पर्दे के पीछे रहकर महत्वपूर्ण मध्यस्थ की भूमिका निभाई है, जिसके सकारात्मक परिणाम अब दुनिया के सामने दिखाई दे रहे हैं।

इस भीषण युद्ध की शुरुआत इस साल के शुरुआती महीनों में हुई थी, जब रणनीतिक मोर्चों पर तनाव बढ़ने के बाद अमेरिकी और सहयोगी सेनाओं ने ईरान के भीतर कई हवाई हमले किए थे। इसके जवाब में ईरानी सेना और उसके सहयोगी संगठनों ने भी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों और खाड़ी क्षेत्र के तेल टैंकरों पर मिसाइलों और ड्रोनों से भीषण जवाबी हमले शुरू कर दिए थे। स्थिति उस समय और अधिक बेकाबू हो गई जब ईरान ने अपनी संप्रभुता की रक्षा का हवाला देते हुए होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह से सील कर दिया और वहां से गुजरने वाले वाणिज्यिक जहाजों पर कड़ा नियंत्रण स्थापित कर लिया। इसके प्रतिशोध में अमेरिकी प्रशासन ने ईरान के सभी प्रमुख बंदरगाहों की पूर्ण नौसैनिक नाकेबंदी (Naval Blockade) कर दी थी, जिससे ईरान का आर्थिक संपर्क पूरी दुनिया से कट गया था। दोनों ओर से लगातार किए जा रहे भारी हमलों और पलटवार के बीच आखिरकार कूटनीति की जीत हुई है और दोनों पक्षों ने यह स्वीकार किया कि युद्ध को और अधिक खींचना किसी भी देश के हित में नहीं है। इस ऐतिहासिक शांति समझौते के तहत दोनों देशों ने सभी मोर्चों पर तत्काल और स्थायी रूप से सैन्य अभियानों को समाप्त करने की घोषणा की है। ईरान जहां होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह से कर-मुक्त और स्वतंत्र आवाजाही के लिए खोलने पर सहमत हुआ है, वहीं अमेरिका भी ईरानी बंदरगाहों से अपनी नौसैनिक नाकेबंदी को तुरंत हटाने और आर्थिक प्रतिबंधों में ढील देने के लिए राजी हो गया है। इसके अलावा, दोनों देश आगामी कुछ दिनों में स्विट्जरलैंड के जिनेवा शहर में इस समझौते के आधिकारिक दस्तावेजों पर औपचारिक रूप से हस्ताक्षर करेंगे।

इस शांति समझौते को अमलीजामा पहनाने के लिए मध्यस्थ देशों की राजधानियों में कई दिनों तक मैराथन बैठकों का दौर चला, जिसमें दोनों देशों के उच्चायुक्तों और सुरक्षा सलाहकारों ने हिस्सा लिया। विशेष रूप से पाकिस्तान, कतर और मिस्र जैसे देशों ने लगातार चौदह-पंद्रह घंटों तक चलने वाली बैठकों का आयोजन करके दोनों पक्षों के बीच के गतिरोध को दूर करने में सफलता हासिल की। शुरुआत में ईरान इस बात पर अड़ा हुआ था कि जब तक क्षेत्र में उसके सहयोगी देशों पर हो रहे हमले पूरी तरह नहीं रुकते, तब तक वह किसी भी समझौते पर हस्ताक्षर नहीं करेगा। दूसरी तरफ, अमेरिकी प्रशासन भी ईरान के परमाणु कार्यक्रम और संवर्धित यूरेनियम के स्टॉक को लेकर बेहद सख्त रुख अपनाए हुए था। कूटनीतिक दबाव और आर्थिक संकट के बीच दोनों देशों ने अपने-अपने कड़े रुख में थोड़ी नरमी दिखाई और एक ऐसे साझा मसौदे को तैयार करने पर सहमति जताई जो दोनों ही देशों की सुरक्षा और संप्रभुता की चिंताओं को संतुलित करता हो।

होर्मुज जलडमरूमध्य का दोबारा खुलना वैश्विक व्यापार और विशेष रूप से अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार के लिए एक संजीवनी की तरह साबित होने वाला है। इस बेहद संकरे समुद्री मार्ग से दुनिया का लगभग बीस प्रतिशत कच्चा तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) का परिवहन होता है, जो एशिया और यूरोप की अर्थव्यवस्थाओं की जीवनरेखा माना जाता है। युद्ध के कारण इस मार्ग के बंद हो जाने से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पूरी तरह से ध्वस्त हो गई थी और कई विकासशील देशों में मुद्रास्फीति की दर दहाई के अंकों में पहुंच गई थी। शांति समझौते की घोषणा के तुरंत बाद ही अंतरराष्ट्रीय शेयर बाजारों में भारी उछाल देखा गया है और कच्चे तेल की कीमतों में भी बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। हालांकि, बड़े जहाजों और तेल टैंकरों के ऑपरेटरों का मानना है कि इस जलमार्ग से पूरी तरह से सुरक्षित और सामान्य आवाजाही शुरू होने में अभी कुछ हफ्तों का समय लग सकता है, क्योंकि समुद्र में सुरक्षा व्यवस्था को दोबारा बहाल करना और बीमा कंपनियों का भरोसा जीतना बेहद जरूरी है।

इस समझौते का एक और सबसे महत्वपूर्ण पहलू ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ा हुआ है, जो पिछले कई वर्षों से अंतरराष्ट्रीय विवाद का मुख्य केंद्र रहा है। नए प्रावधानों के अनुसार, ईरान इस बात के लिए पूरी तरह से तैयार हो गया है कि वह कभी भी परमाणु हथियार विकसित नहीं करेगा और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा निरीक्षकों को अपने देश में वापस आने और परमाणु संयंत्रों की सघन जांच करने की पूर्ण अनुमति देगा। इसके बदले में अमेरिका वैश्विक बैंकों में फ्रीज की गई ईरान की अरबों डॉलर की संपत्ति को चरणबद्ध तरीके से जारी करने के लिए सहमत हुआ है, जिससे युद्ध से जर्जर हो चुकी ईरानी अर्थव्यवस्था को दोबारा पटरी पर लाया जा सके। इस वित्तीय राहत से ईरान को अपने घरेलू विकास कार्यों और बुनियादी ढांचे को ठीक करने में मदद मिलेगी। हालांकि, ईरान के भीतर सक्रिय कुछ कट्टरपंथी गुट अभी भी इस समझौते का खुलकर विरोध कर रहे हैं और इसे देश की संप्रभुता के साथ समझौता बता रहे हैं, जिससे ईरानी प्रशासन के लिए आंतरिक मोर्चे पर चुनौतियां बनी हुई हैं।

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