पश्चिम एशिया में जारी युद्ध पर विराम लगाने के लिए अमेरिका और ईरान के बीच ऐतिहासिक 'इस्लामाबाद मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग' पर हस्ताक्षर
इस 14-सूत्रीय 'इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन' को तैयार करने और दोनों धुर-विरोधी देशों को एक मेज पर लाने में ओमान, पाकिस्तान और कतर जैसे देशों ने मध्यस्थ के रूप में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस समझौते के लागू होते ही अब आगामी शुक्रवार
- वर्सेल्स के शाही महल में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की ऐतिहासिक मुलाकात, डिनर के दौरान हुआ बड़ा फैसला
- रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य को तुरंत खोलने और अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी हटाने पर दोनों देशों में बनी सहमति
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के इतिहास में फ्रांस का वर्सेल्स महल एक बार फिर एक युगांतकारी समझौते का गवाह बना है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों द्वारा वर्सेल्स के भव्य महल में आयोजित एक विशेष रात्रिभोज (डिनर) के दौरान ईरान के साथ हुए ऐतिहासिक 'इस्लामाबाद मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग' (MoU) पर भौतिक रूप से हस्ताक्षर कर दिए हैं। यह हस्ताक्षर जी-7 शिखर सम्मेलन की समाप्ति के तुरंत बाद आयोजित एक राजकीय गरिमामय माहौल के बीच हुए, जिसने पश्चिम एशिया में पिछले कई महीनों से जारी भीषण सैन्य संघर्ष और तनाव पर विराम लगाने की दिशा में सबसे बड़ा कदम आगे बढ़ाया है। अमेरिकी राष्ट्रपति का यह फैसला वैश्विक भू-राजनीति को एक नई दिशा देने वाला साबित होने जा रहा है, जिसने न केवल युद्ध की आग को शांत करने का मार्ग प्रशस्त किया है बल्कि दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाले एक बड़े संकट को टालने का काम भी किया है।
इस ऐतिहासिक दस्तावेज को अंतिम रूप दिए जाने और दोनों देशों के राष्ट्रपतियों के हस्ताक्षर होने के साथ ही यह समझौता तुरंत प्रभाव से लागू हो गया है। कूटनीतिक सूत्रों के मुताबिक, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने भी इस दस्तावेज पर अपने हस्ताक्षर अलग से दर्ज किए हैं, जिसके बाद दोनों देशों के राष्ट्राध्यक्षों के हस्ताक्षरों के साथ यह समझौता आधिकारिक और कानूनी रूप से अस्तित्व में आ गया है। इस समझौते की पृष्ठभूमि कुछ दिनों पहले ही तैयार हो गई थी जब रविवार को अमेरिकी उप-राष्ट्रपति जे.डी. वेंस और ईरान के मुख्य वार्ताकार तथा संसद अध्यक्ष मोहम्मद बगेर गालिबाफ ने इस पर डिजिटल रूप से हस्ताक्षर किए थे, जिसे राष्ट्रपति ट्रंप ने स्वयं देखा था। अब वर्सेल्स में राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा इसके फारसी और अंग्रेजी संस्करणों पर व्यक्तिगत रूप से हस्ताक्षर किए जाने के बाद इस शांति प्रक्रिया को पूर्ण वैधता मिल गई है, जिससे एक औपचारिक इन-पर्सन समारोह की आवश्यकता भी समाप्त हो गई।
समझौते की मुख्य कूटनीतिक कड़ी
इस 14-सूत्रीय 'इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन' को तैयार करने और दोनों धुर-विरोधी देशों को एक मेज पर लाने में ओमान, पाकिस्तान और कतर जैसे देशों ने मध्यस्थ के रूप में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस समझौते के लागू होते ही अब आगामी शुक्रवार को पाकिस्तान और कतर इस ऐतिहासिक घटनाक्रम के उपलक्ष्य में एक आधिकारिक समारोह की मेजबानी भी करने जा रहे हैं।
इस 14-सूत्रीय अंतरिम समझौते का सबसे तात्कालिक और बड़ा असर यह होने जा रहा है कि ईरान रणनीतिक रूप से अत्यधिक संवेदनशील होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को बिना किसी देरी के तुरंत प्रभाव से वाणिज्यिक जहाजों के लिए खोल देगा। इसके बदले में, संयुक्त राज्य अमेरिका ईरानी बंदरगाहों पर लगाई गई अपनी सख्त नौसैनिक नाकेबंदी को तत्काल प्रभाव से हटा लेगा। गौरतलब है कि इस साल 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल द्वारा शुरू किए गए सैन्य अभियानों के बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई के तौर पर पूरे क्षेत्र में मिसाइल और ड्रोन हमले किए थे, जिसके कारण होर्मुज जलडमरूमध्य से होने वाला व्यापार पूरी तरह ठप हो गया था। वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए जीवन रेखा माने जाने वाले इस समुद्री मार्ग के दोबारा खुलने की खबर मिलते ही वैश्विक तेल बाजारों में भारी गिरावट दर्ज की गई है, जिससे दुनिया भर में ऊर्जा की कीमतें कम होने की उम्मीदें बढ़ गई हैं।
इस शांति समझौते के तहत दोनों देशों और उनके सहयोगियों ने सभी मोर्चों पर सैन्य अभियानों को तुरंत और स्थायी रूप से समाप्त करने की घोषणा की है। इस समझौते के दायरे में लेबनान का मोर्चा भी शामिल है, जो मार्च की शुरुआत में इस संघर्ष का सीधा हिस्सा बन गया था। समझौते के नियमों के अनुसार, अमेरिका और ईरान अब एक-दूसरे के खिलाफ किसी भी प्रकार की सैन्य कार्रवाई की शुरुआत नहीं करेंगे और न ही एक-दूसरे की क्षेत्रीय संप्रभुता को नुकसान पहुंचाने या बल प्रयोग करने की कोई धमकी देंगे। इस युद्धविराम के प्रभावी होने से पूरे पश्चिम एशिया के उन लाखों नागरिकों ने राहत की सांस ली है जो पिछले कई महीनों से लगातार बमबारी और तबाही के साये में जी रहे थे। हालांकि, राष्ट्रपति ट्रंप ने यह भी साफ कर दिया है कि अगर ईरान के नेताओं ने अपने वादों का पालन नहीं किया, तो अमेरिका अपने सैन्य विकल्पों का इस्तेमाल करने से पीछे नहीं हटेगा।
इस अंतरिम समझौते का एक और सबसे महत्वपूर्ण पहलू परमाणु कार्यक्रम से जुड़ा हुआ है, जिसके तहत ईरान ने अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की सीधी देखरेख में अपने समृद्ध यूरेनियम के स्टॉक को कम करने यानी डाउन-ब्लेंड करने पर सहमति जताई है। इसके बदले में वाशिंगटन ईरान की अर्थव्यवस्था को पंगु बना चुके तेल और बैंकिंग प्रतिबंधों को तुरंत हटाने के लिए कदम उठाएगा। इसके अतिरिक्त, एक बार जब ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर दीर्घकालिक और अंतिम समझौता हो जाएगा, तो अमेरिका क्षेत्रीय देशों के सहयोग से ईरान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास के लिए कम से कम 300 अरब डॉलर के एक विशाल अंतरराष्ट्रीय कोष की स्थापना में मदद करेगा। अमेरिकी प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि इस कोष में अमेरिकी सरकार का कोई प्रत्यक्ष वित्तीय योगदान नहीं होगा, बल्कि यह विदेशी कंपनियों द्वारा निवेश के माध्यम से संचालित किया जाएगा।
इस विशाल और ऐतिहासिक राजनयिक समझौते को लेकर अमेरिका के घरेलू राजनीतिक हलकों में तीखी बहस भी शुरू हो गई है। जहां एक तरफ राष्ट्रपति ट्रंप इसे एक महान रणनीतिक जीत के रूप में देख रहे हैं और उनका मानना है कि यह उनकी दीर्घकालिक दबाव की नीति का परिणाम है, वहीं उनकी अपनी ही रिपब्लिकन पार्टी के कुछ वरिष्ठ सीनेटरों ने इस समझौते की कड़ी आलोचना की है। आलोचकों का तर्क है कि इस समझौते से ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं पर स्थायी रूप से रोक नहीं लगी है और प्रतिबंध हटाए जाने से उसे भारी आर्थिक राहत मिल जाएगी, जो आने वाले समय में एक बड़ी कूटनीतिक भूल साबित हो सकती है। हालांकि, अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि यह केवल 60 दिनों की अवधि के लिए एक अंतरिम व्यवस्था है, जिसके दौरान स्विट्जरलैंड में दोनों देशों के बीच एक पूर्ण और व्यापक अंतिम समझौते के लिए बेहद जटिल मुद्दों पर बातचीत शुरू की जाएगी।
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