तमिलनाडु में जन्म लेने वाले हर बच्चे पर ₹1.28 लाख का कर्ज, कुल वित्तीय देनदारियां बढ़कर हुई ₹13.18 लाख करोड़
दक्षिण भारत के प्रमुख राज्य तमिलनाडु की आर्थिक स्थिति को लेकर एक बेहद चौंकाने वाला और गंभीर वित्तीय डेटा सामने आया है
- तमिलनाडु पर बढ़ा वित्तीय संकट, श्वेतपत्र के जरिए नई सरकार ने राज्य की अर्थव्यवस्था को लेकर किया बड़ा दावा
- चेन्नई के सचिवालय से जारी हुई रिपोर्ट, पांच वर्षों के दौरान कर्ज के दोगुना होने पर सत्ता पक्ष और विपक्ष में छिड़ा घमासान
दक्षिण भारत के प्रमुख राज्य तमिलनाडु की आर्थिक स्थिति को लेकर एक बेहद चौंकाने वाला और गंभीर वित्तीय डेटा सामने आया है, जिसने राज्य की सियासत के साथ-साथ पूरे देश के नीति निर्माताओं का ध्यान अपनी ओर खींचा है। हाल ही में सत्ता संभालने वाले मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली नई सरकार ने राज्य की वित्तीय स्थिति पर एक विस्तृत श्वेतपत्र जारी किया है। चेस्टरफील्ड और सचिवालय परिसर में आयोजित एक उच्च स्तरीय बैठक के दौरान राज्य के वित्त मंत्री एन. मैरी विल्सन द्वारा प्रस्तुत किए गए इस वित्तीय प्रतिवेदन में यह दावा किया गया है कि तमिलनाडु में जन्म लेने वाले प्रत्येक नवजात शिशु के सिर पर औसतन 1.28 लाख रुपये का कर्ज का बोझ है। इस आधिकारिक रिपोर्ट के सार्वजनिक होते ही राज्य की वित्तीय साख और पिछले प्रशासनिक कार्यकाल के दौरान हुए खर्चों को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है।
इस जारी किए गए श्वेतपत्र की गहराई में जाएं तो पता चलता है कि तमिलनाडु की कुल वित्तीय देनदारियां एक अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच चुकी हैं, जो वर्तमान में अनुमानित रूप से 13.18 लाख करोड़ रुपये हो गई हैं। रिपोर्ट के अनुसार, राज्य का प्रत्यक्ष रूप से लिया गया बाजार ऋण ही केवल 10 लाख करोड़ रुपये के करीब पहुंच रहा है। नए प्रशासनिक अमले का तर्क है कि पिछले पांच वर्षों के दौरान, यानी पूर्ववर्ती एम. के. स्टालिन के नेतृत्व वाली सरकार के कार्यकाल में, राज्य का कुल ऋण भार लगभग दोगुना हो गया है। इस प्रकार की तीव्र कर्ज वृद्धि ने राज्य के राजस्व और राजकोषीय संतुलन को बुरी तरह प्रभावित किया है, जिसके चलते आने वाले समय में नई जन कल्याणकारी योजनाओं को लागू करना और बुनियादी ढांचे का विकास करना वर्तमान नेतृत्व के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती साबित होने वाला है। जब कोई राज्य अपनी दैनिक प्रशासनिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए लगातार कर्ज लेता है, तो उसके विकास कार्यों के लिए बजटीय आवंटन कम हो जाता है। तमिलनाडु का ऋण और राज्य सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) अनुपात अब बढ़कर 28.2 प्रतिशत हो गया है, जो वित्तीय स्थिरता के लिहाज से एक चिंताजनक संकेत है।
श्वेतपत्र में यह भी विस्तार से स्पष्ट किया गया है कि राज्य को प्राप्त होने वाले राजस्व का एक बहुत बड़ा हिस्सा केवल पुराने कर्जों के ब्याज को चुकाने में ही चला जाता है। वर्तमान वित्तीय आंकड़ों के मुताबिक, सरकार द्वारा कमाए जाने वाले हर एक रुपये में से 22.8 पैसे केवल ब्याज के भुगतान के रूप में खर्च हो रहे हैं, जो इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि राज्य पर कर्ज का दबाव किस कदर हावी हो चुका है। इसके अतिरिक्त, पिछले पांच वर्षों में राज्य का राजस्व घाटा 46,538 करोड़ रुपये से बढ़कर 78,324 करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच गया है। यह अंतर दर्शाता है कि सरकार की कुल आय और उसके अनिवार्य खर्चों के बीच की खाई लगातार चौड़ी होती गई है, जिसे पाटने के लिए ठोस और कड़े आर्थिक सुधारों की सख्त जरूरत है।
इस बड़े वित्तीय बोझ के पीछे के मुख्य कारणों को समझाते हुए सरकारी रिपोर्ट में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) के घाटे को सबसे बड़ा जिम्मेदार माना गया है। विशेष रूप से ऊर्जा क्षेत्र, जिसमें तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कॉर्पोरेशन और पावर जनरेशन कॉर्पोरेशन शामिल हैं, अकेले 2.47 लाख करोड़ रुपये के भारी कर्ज के तले दबा हुआ है। इसके साथ ही, राज्य के आठ परिवहन उपक्रमों का बकाया ऋण भी 43,865 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। रिपोर्ट में यह भी आलोचना की गई है कि इस विशाल ऋण का एक बड़ा हिस्सा किसी दीर्घकालिक इंफ्रास्ट्रक्चर या परिसंपत्ति के निर्माण में लगाने के बजाय दैनिक उपभोग और लोकलुभावन योजनाओं के संचालन में खर्च किया गया, जिससे राज्य की उत्पादक क्षमता में कोई विशेष सुधार नहीं हो सका।
इस आर्थिक स्थिति की तुलना जब अन्य प्रमुख और समकक्षी औद्योगिक राज्यों से की जाती है, तो तमिलनाडु की स्थिति और अधिक नाजुक नजर आती है। श्वेतपत्र में प्रस्तुत तुलनात्मक आंकड़ों के अनुसार, गुजरात का ऋण अनुपात जहां केवल 17.6 प्रतिशत है और महाराष्ट्र का 19.7 प्रतिशत तथा पड़ोसी राज्य कर्नाटक का 23.4 प्रतिशत है, वहीं तमिलनाडु का यह आंकड़ा 28.3 प्रतिशत पर पहुंच गया है। वस्तु एवं सेवा कर (GST) के मोर्चे पर भी राज्य की राजस्व वृद्धि दर महज 5.45 प्रतिशत दर्ज की गई है, जो कि खर्चों में होने वाली बेतहाशा बढ़ोतरी और ऋण दायित्वों की पूर्ति के लिए पूरी तरह से अपर्याप्त साबित हो रही है। इस कम राजस्व संग्रह ने राज्य सरकार की वित्तीय स्वायत्तता को भी काफी हद तक सीमित कर दिया है।
दूसरी ओर, इस श्वेतपत्र के सामने आने के बाद राज्य के पूर्ववर्ती सत्ताधारी दल और पूर्व वित्त मंत्री थंगम थेनारासु ने इस पर बेहद तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है और सरकार के इन दावों को पूरी तरह से खारिज किया है। विपक्षी खेमे का तर्क है कि इस दस्तावेज़ को केवल 'श्वेतपत्र' का नाम दिया गया है, जबकि यह वास्तव में एक पूरी तरह से खाली और राजनीति से प्रेरित कागज है, जिसका उद्देश्य केवल नई सरकार द्वारा अपने चुनावी वादों को पूरा न कर पाने की विफलता से जनता का ध्यान भटकाना है। उनका कहना है कि तमिलनाडु की आर्थिक स्थिति हमेशा से ही निर्धारित विधिक सीमाओं के भीतर रही है और राज्य के पास अपने विकास कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन और क्षमता मौजूद है, जिसे जानबूझकर नकारात्मक रूप में पेश किया जा रहा है।
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