भड़काऊ बयानबाजी के गंभीर मामले में घिरे टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी, भवानी भवन में अपराध अन्वेषण विभाग ने की मैराथन पूछताछ
पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और वरिष्ठ लोकसभा सांसद अभिषेक बनर्जी की कानूनी
- पश्चिम बंगाल की राजनीति के शीर्ष नेतृत्व की कानूनी और प्रशासनिक अड़चनें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं, जिससे राज्य का सियासी तापमान एक बार फिर बढ़ गया है
- कानूनी घेरेबंदी के बीच लगातार बढ़ती जा रही हैं दिग्गज नेता की मुश्किलें, सीआईडी के सवालों का सामना करने के बाद पहुंचे कालीघाट
पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और वरिष्ठ लोकसभा सांसद अभिषेक बनर्जी की कानूनी मुश्किलें लगातार गंभीर मोड़ लेती जा रही हैं। राज्य के हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों और चुनावी सरगर्मियों के बीच अपराध अन्वेषण विभाग (सीआईडी) ने उनके खिलाफ अपनी जांच की रफ्तार को अभूतपूर्व रूप से तेज कर दिया है। विधानसभा चुनाव प्रचार अभियान के दौरान कथित तौर पर अत्यंत आपत्तिजनक और भड़काऊ बयानबाजी करने के एक पुराने मामले में राज्य की इस शीर्ष जांच एजेंसी ने मंगलवार को सांसद को तलब किया था। कोलकाता के अलीपुर स्थित सीआईडी के राज्य मुख्यालय 'भवानी भवन' में जांच अधिकारियों की एक विशेष टीम ने अभिषेक बनर्जी से छह घंटे से भी अधिक समय तक बेहद सघन और मैराथन पूछताछ की, जिसने राज्य के राजनीतिक गलियारों में भारी खलबली मचा दी है।
भवानी भवन में हुई इस लंबी पूछताछ की प्रक्रिया बेहद सुनियोजित और तकनीकी रूप से विस्तृत थी, जिसके लिए सीआईडी के आला अधिकारियों ने पहले से ही सवालों की एक लंबी सूची तैयार कर रखी थी। सांसद अभिषेक बनर्जी दोपहर का समय होने से ठीक पहले कड़ी सुरक्षा व्यवस्था और अपने निजी सुरक्षा दस्ते के साथ सीआईडी कार्यालय पहुंचे थे। जांच टीम के सामने उपस्थित होने के बाद उनसे चुनावी रैलियों के दौरान दिए गए वक्तव्यों की भाषा, उनके पीछे की मंशा और उससे उत्पन्न हुई कानून व्यवस्था की स्थिति को लेकर एक-एक कर कई तीखे सवाल पूछे गए। दोपहर से शुरू हुआ यह सिलसिला लगातार बिना किसी बड़े अंतराल के चलता रहा और शाम को करीब छह बजकर पच्चीस मिनट पर जाकर जांच एजेंसी के अधिकारियों ने उन्हें जाने की अनुमति दी। चुनावी दौर में दिए गए भाषणों के कानूनी प्रभाव बेहद गंभीर हो सकते हैं। यदि किसी वक्तव्य से समाज में वैमनस्य फैलने या कानून व्यवस्था के बिगड़ने के प्रमाण मिलते हैं, तो संबंधित जन प्रतिनिधि को कड़ी कानूनी धाराओं के तहत जांच का सामना करना पड़ता है।
सीआईडी मुख्यालय के विशाल परिसर से बाहर निकलने के बाद सांसद अभिषेक बनर्जी के तेवर काफी गंभीर दिखाई दिए और उन्होंने वहां भारी संख्या में मौजूद मीडिया कर्मियों से पूरी तरह से दूरी बनाए रखी। उन्होंने पत्रकारों द्वारा पूछे गए किसी भी तीखे सवाल का कोई जवाब नहीं दिया और बिना कोई औपचारिक वक्तव्य जारी किए सीधे अपनी गाड़ी में बैठकर वहां से रवाना हो गए। भवानी भवन से निकलने के बाद उनका काफिला कहीं और जाने के बजाय सीधे तृणमूल कांग्रेस की सर्वोच्च नेता और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के कालीघाट स्थित निजी आवास पर पहुंचा। राजनीतिक गलियारों में इस तत्काल मुलाकात को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि कानूनी लड़ाइयों के साथ-साथ पार्टी की आगामी राजनीतिक रणनीति को तय करने के लिए शीर्ष नेतृत्व का आपसी समन्वय इस समय बेहद जरूरी हो चुका है।
अभिषेक बनर्जी के लिए केंद्रीय और राज्य स्तरीय जांच एजेंसियों के समन और पूछताछ का सामना करना कोई नया अनुभव नहीं है, बल्कि पिछले कुछ समय से वे लगातार इस तरह के कानूनी चक्रव्यूह में घिरे हुए हैं। इस भड़काऊ भाषण मामले से ठीक पहले भी उन पर कई अन्य तरह के कानूनी आरोप लग चुके हैं, जिनकी जांच समानांतर रूप से चल रही है। उदाहरण के तौर पर, जनप्रतिनिधियों और विधायकों के जाली हस्ताक्षर करने से जुड़े एक बेहद संवेदनशील और गंभीर धोखाधड़ी के मामले में भी राज्य की इसी जांच एजेंसी ने इसी महीने की 11 और 14 जून को उनसे दो अलग-अलग सत्रों में घंटों तक विस्तृत पूछताछ की थी। एक के बाद एक लगातार आते जा रहे ये कानूनी मामले यह साफ दर्शाते हैं कि सांसद के खिलाफ जांच का दायरा केवल एक घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें काफी गहरी हैं।
इस पूरे प्रशासनिक और कानूनी घटनाक्रम पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच एक नया जुबानी जंग भी शुरू हो गया है, जिसने राज्य की राजनीतिक फिजा को और अधिक गर्मा दिया है। सत्ताधारी दल के वरिष्ठ नेताओं और प्रवक्ताओं का अंदरूनी तौर पर मानना है कि लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव जीतने के बाद उनके नेताओं को जानबूझकर विभिन्न मामलों में उलझाकर मानसिक और राजनीतिक रूप से परेशान करने का प्रयास किया जा रहा है। उनका तर्क है कि चुनावी भाषणों को इस तरह से आपराधिक मामलों में तब्दील करना राजनीतिक प्रतिशोध की भावना को दर्शाता है। इसके विपरीत, विपक्षी खेमे के नेताओं का स्पष्ट रुख है कि कानून से ऊपर कोई भी नहीं हो सकता है, चाहे वह कितना भी बड़ा सांसद या रसूखदार नेता क्यों न हो, और यदि किसी ने भड़काऊ बातें की हैं तो उसे जांच का सामना करना ही होगा।
सीआईडी के सूत्रों से मिल रही अनौपचारिक जानकारियों के अनुसार, मंगलवार को हुई इस छह घंटे की पूछताछ के दौरान सांसद के बयानों की पूरी वीडियोग्राफी भी कराई गई है ताकि भविष्य में किसी भी कानूनी विसंगति से बचा जा सके। जांच अधिकारियों ने चुनावी जनसभाओं के उन विशिष्ट वीडियो फुटेज को भी रिकॉर्ड पर लिया है, जिनमें कथित तौर पर भड़काऊ बातें कही गई थीं। इन वीडियो क्लिपिंग्स को दिखाकर सांसद से उनके द्वारा इस्तेमाल किए गए शब्दों के अर्थ और उनके पीछे के राजनीतिक उद्देश्यों को स्पष्ट करने के लिए कहा गया। हालांकि, इस बात की पुष्टि अभी तक आधिकारिक तौर पर नहीं की गई है कि क्या सांसद के जवाबों से जांच टीम पूरी तरह संतुष्ट है या आने वाले दिनों में उन्हें दोबारा भवानी भवन बुलाया जा सकता है।
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