भारत में 5 साल की उम्र तक हिंदू बच्चों की मृत्यु दर मुसलमान बच्चों से अधिक, ये बताते हैं आंकड़े।
भारत में 5 साल की उम्र तक हिंदू बच्चों की मृत्यु दर मुसलमान बच्चों से अधिक रही है, हालांकि यह अंतर समय के साथ कम हो रहा है। विभिन्न सर्वेक्षणों
भारत में 5 साल की उम्र तक हिंदू बच्चों की मृत्यु दर मुसलमान बच्चों से अधिक रही है, हालांकि यह अंतर समय के साथ कम हो रहा है। विभिन्न सर्वेक्षणों और अध्ययनों से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, लंबे समय से मुसलमान बच्चों में उत्तरजीविता दर हिंदू बच्चों की तुलना में बेहतर रही है, भले ही मुसलमान समुदाय की सामाजिक-आर्थिक स्थिति औसतन कमजोर हो। यह स्थिति 1990 के दशक से 2015-16 तक के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के आंकड़ों में स्पष्ट दिखाई देती है। 1992-93 के NFHS-1 में अंडर-5 मृत्यु दर (प्रति 1000 जीवित जन्मों पर) हिंदू बच्चों में मुसलमान बच्चों से काफी अधिक थी। उस समय हिंदू बच्चों की मृत्यु दर ऊंची होने का मुख्य कारण हिंदू समुदाय में अनुसूचित जाति और जनजाति की बड़ी आबादी का होना था, जहां मृत्यु दर अधिक रही। मुसलमान समुदाय में इन वर्गों की हिस्सेदारी कम होने से उनकी औसत मृत्यु दर कम रही। अध्ययनों में यह पाया गया कि 1960 से 2006 तक की अवधि में मुसलमान बच्चों की मृत्यु दर 11.29 प्रतिशत रही जबकि हिंदू बच्चों में यह 13.60 प्रतिशत थी। उच्च जाति हिंदू बच्चों में भी यह दर 12.59 प्रतिशत रही जो मुसलमानों से अधिक थी।
यह अंतर कई कारकों से जुड़ा रहा है। मुसलमान समुदाय में स्वच्छता प्रथाओं का बेहतर पालन, शहरी क्षेत्रों में अधिक निवास और लिंग भेदभाव की कम प्रवृत्ति जैसे तत्वों ने बच्चों की उत्तरजीविता में योगदान दिया। हिंदू समुदाय में खुले में शौच की दर अधिक होने से रोग फैलने का जोखिम बढ़ा। इसके अलावा हिंदू परिवारों में पुत्र.preference के कारण लड़कियों की मृत्यु दर अधिक रही। 1992-93 से 2015-16 तक के NFHS आंकड़ों में हिंदू-मुसलमान बच्चों की उत्तरजीविता में अंतर धीरे-धीरे कम हुआ। 2015-16 के NFHS-4 तक यह अंतर काफी कम हो गया और कुछ राज्यों में हिंदू बच्चों की स्थिति बेहतर दिखने लगी। हिंदू समुदाय में सामाजिक-आर्थिक असमानता के कम होने और स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार से यह बदलाव आया। यदि हिंदू बच्चों की मृत्यु दर मुसलमान स्तर पर आ जाती तो प्रति वर्ष लाखों मौतें रोकी जा सकती थीं। 2000 के आसपास के अनुमानों में उच्च जाति हिंदू बच्चों में अतिरिक्त मौतें 127,955 और निम्न जाति में 244,535 प्रति वर्ष बताई गईं। NFHS-5 (2019-21) के बाद के आंकड़ों में यह अंतर और कम हुआ है। राष्ट्रीय स्तर पर अंडर-5 मृत्यु दर 42 प्रति 1000 जीवित जन्मों तक पहुंच गई है लेकिन धर्म के आधार पर विस्तृत ब्रेकडाउन में हिंदू बच्चों की दर अभी भी थोड़ी अधिक रहने की संभावना है।
अध्ययनों में यह पाया गया कि मुसलमान बच्चों में नवजात अवस्था से ही उत्तरजीविता बेहतर रही। मातृ स्वास्थ्य, पोषण और स्वच्छता जैसे कारक इसमें महत्वपूर्ण रहे। हिंदू समुदाय में जाति आधारित असमानताएं प्रमुख कारण रहीं। समय के साथ स्वास्थ्य योजनाओं के प्रभाव से हिंदू बच्चों में सुधार तेजी से हुआ। 1992 से 2016 तक के आंकड़ों में हिंदू-मुसलमान अंतर में कमी मुख्य रूप से हिंदू समुदाय के भीतर असमानता कम होने से आई। यह स्थिति भारत में सामाजिक-धार्मिक समूहों के बीच स्वास्थ्य असमानताओं को दर्शाती है। मुसलमान समुदाय की कमजोर आर्थिक स्थिति के बावजूद बच्चों की उत्तरजीविता में लाभ कई सांस्कृतिक और व्यवहारिक कारकों से जुड़ा रहा। हिंदू समुदाय में बड़े पैमाने पर अनुसूचित जाति-जनजाति की आबादी होने से औसत दर प्रभावित हुई। हाल के वर्षों में दोनों समुदायों में मृत्यु दर में गिरावट आई है लेकिन ऐतिहासिक रूप से हिंदू बच्चों में अधिक मौतें दर्ज हुईं।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षणों के चार दौरों (1992-2016) के विश्लेषण से हिंदू-मुसलमान बच्चों की मृत्यु दर में अभिसरण स्पष्ट है। पहले मुसलमान लाभ में थे लेकिन अब अंतर न्यूनतम हो गया है। विभिन्न राज्यों में यह पैटर्न अलग-अलग रहा जहां कुछ राज्यों में मुसलमान लाभ बना रहा जबकि अन्य में हिंदू आगे निकल गए। यह आंकड़े भारत में बाल मृत्यु दर के सामाजिक आयामों को उजागर करते हैं। धर्म के अलावा जाति, क्षेत्र और आर्थिक स्थिति जैसे कारक भी महत्वपूर्ण रहे। समय के साथ सुधार से दोनों समुदायों के बच्चों की स्थिति बेहतर हुई है। अंडर-5 मृत्यु दर में यह अंतर मुख्य रूप से नवजात और शिशु अवस्था में देखा गया। मुसलमान बच्चों में संक्रमण और अन्य रोगों से मृत्यु कम रही। हिंदू बच्चों में लिंग आधारित भेदभाव और स्वच्छता संबंधी मुद्दों का प्रभाव अधिक रहा। हाल के डेटा में यह पैटर्न बदल रहा है।
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