UP: छोटे बच्चों के टेढ़े पैरों का फ्री ट्रीटमेंट कर 500 बच्चों को दी नई जिंदगी, डॉक्टर नहीं, हैं ये यूपी के भगवान्

प्लास्टर कास्टिंग: बच्चे के पैर को सही स्थिति में लाने के लिए 5-7 सप्ताह तक हर हफ्ते प्लास्टर लगाया जाता है। प्रत्येक प्लास्टर की लागत करीब 500 रुपये होती है, जो मिरेकल फी...

Jun 29, 2025 - 13:07
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UP: छोटे बच्चों के टेढ़े पैरों का फ्री ट्रीटमेंट कर 500 बच्चों को दी नई जिंदगी, डॉक्टर नहीं, हैं ये यूपी के भगवान्

उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में राजकीय मेडिकल कॉलेज में चल रही क्लब फुट क्लीनिक उन बच्चों के लिए वरदान साबित हो रही है, जो जन्म से टेढ़े पैरों (क्लब फुट) की समस्या के साथ पैदा होते हैं। इस क्लीनिक में राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (RBSK) के तहत मिरेकल फीट इंडिया के सहयोग से बच्चों का मुफ्त इलाज किया जा रहा है। पिछले पांच सालों में इस क्लीनिक ने करीब 500 बच्चों के टेढ़े पैरों को सीधा कर उन्हें सामान्य जीवन जीने का मौका दिया है। पोंसेटी विधि और टेनोटॉमी तकनीक के जरिए यह इलाज बिना किसी बड़े ऑपरेशन के किया जाता है, जिससे बच्चों को दर्द और जटिलताओं से बचाया जाता है। इस कार्यक्रम ने न केवल बच्चों की जिंदगी बदली है, बल्कि उनके माता-पिता की आर्थिक और मानसिक चिंताओं को भी कम किया है। गाजीपुर मेडिकल कॉलेज के ऑर्थो विभाग के नोडल अधिकारी डॉ. रजत कुमार सिंह इस नेक काम को अंजाम दे रहे हैं। क्लब फुट एक जन्मजात विकृति है, जिसमें बच्चे का एक या दोनों पैर अंदर और नीचे की ओर मुड़े हुए होते हैं। यह स्थिति बच्चे को चलने-फिरने में असमर्थ बना सकती है और अगर इलाज न किया जाए, तो यह स्थायी अक्षमता का कारण बन सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, हर 1,000 बच्चों में से 1-2 बच्चे इस समस्या के साथ पैदा होते हैं। भारत में हर साल करीब 50,000 बच्चे क्लब फुट के साथ जन्म लेते हैं। इस स्थिति का सटीक कारण अभी तक स्पष्ट नहीं है, लेकिन यह आनुवंशिक और पर्यावरणीय कारकों का मिश्रण माना जाता है। लड़कों में यह समस्या लड़कियों की तुलना में अधिक देखी जाती है।

अगर समय पर इलाज न हो, तो क्लब फुट के कारण बच्चे को सामाजिक और शारीरिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। समाज में अक्सर इसे अंधविश्वास से जोड़ा जाता है, जैसे कि गर्भावस्था के दौरान मां का ग्रहण के समय बाहर निकलना। गाजीपुर के सलारपुर गांव के उदय प्रताप सिंह ने हिंदुस्तान टाइम्स को बताया, "जब मेरा बेटा शिवाय क्लब फुट के साथ पैदा हुआ, तो गांव के लोग उसे 'डायन का बेटा' कहने लगे। हमें लगा कि वह कभी चल नहीं पाएगा।" लेकिन गाजीपुर मेडिकल कॉलेज की क्लब फुट क्लीनिक ने उनके बेटे का मुफ्त इलाज कर उसे सामान्य जीवन दिया।

  • गाजीपुर की क्लब फुट क्लीनिक

गाजीपुर के राजकीय मेडिकल कॉलेज में मिरेकल फीट इंडिया और राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (RBSK) के सहयोग से 2018 में क्लब फुट क्लीनिक शुरू की गई थी। यह क्लीनिक विशेष रूप से उन बच्चों के लिए बनाई गई है, जो जन्म के समय टेढ़े पैरों की समस्या से ग्रस्त होते हैं। क्लीनिक में पोंसेटी विधि का उपयोग किया जाता है, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन, अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स, और पीडियाट्रिक ऑर्थोपेडिक सोसाइटी ऑफ इंडिया द्वारा मान्यता प्राप्त है। यह विधि गैर-शल्य चिकित्सा (नॉन-सर्जिकल) है और इसमें सस्ते और प्रभावी तरीके से पैरों को सीधा किया जाता है।

  • क्लीनिक में इलाज की प्रक्रिया तीन चरणों में होती है:

प्लास्टर कास्टिंग: बच्चे के पैर को सही स्थिति में लाने के लिए 5-7 सप्ताह तक हर हफ्ते प्लास्टर लगाया जाता है। प्रत्येक प्लास्टर की लागत करीब 500 रुपये होती है, जो मिरेकल फीट इंडिया द्वारा वहन की जाती है।
टेनोटॉमी: लगभग 70% बच्चों को एक छोटी-सी प्रक्रिया, टेनोटॉमी, की जरूरत होती है, जिसमें एचिल्स टेंडन (Achilles tendon) को हल्का सा काटा जाता है। यह एक डे-केयर प्रक्रिया है, जिसकी लागत करीब 25,000 रुपये होती है, लेकिन यह भी मुफ्त प्रदान की जाती है।
ब्रेसेस: इलाज के बाद बच्चे को विशेष जूते या डेनिस-ब्राउन (DB) ब्रेसेस पहनाए जाते हैं, जो पैरों को सही स्थिति में बनाए रखते हैं। इन्हें पहले तीन महीने तक 23 घंटे और फिर चार-पांच साल तक रात और झपकी के समय पहनना होता है। प्रत्येक ब्रेस की कीमत 18,000 रुपये तक हो सकती है, लेकिन यह भी मुफ्त दिया जाता है।

  • मिरेकल फीट इंडिया और RBSK की भूमिका

मिरेकल फीट इंडिया एक अंतरराष्ट्रीय गैर-लाभकारी संगठन है, जो क्लब फुट के इलाज के लिए विश्व भर में काम करता है। भारत में इसने 2012 से 2021 तक CURE इंडिया के साथ साझेदारी में काम किया और 17,000 से अधिक बच्चों का इलाज किया। 2018 में मिरेकल फीट इंडिया ने उत्तर प्रदेश में आठ क्लीनिक शुरू किए, जिनमें गाजीपुर का मेडिकल कॉलेज भी शामिल है। यह संगठन न केवल मुफ्त इलाज प्रदान करता है, बल्कि डॉक्टरों को पोंसेटी विधि में प्रशिक्षण, ब्रेसेस, और तकनीकी सहायता भी देता है। राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (RBSK) भारत सरकार की एक पहल है, जो जन्मजात और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से ग्रस्त बच्चों की पहचान और इलाज के लिए शुरू की गई है। उत्तर प्रदेश में यह कार्यक्रम आशा कार्यकर्ताओं और स्वास्थ्य कर्मियों के माध्यम से बच्चों की स्क्रीनिंग करता है और उन्हें उपचार के लिए रेफर करता है। गाजीपुर में RBSK और मिरेकल फीट इंडिया की साझेदारी ने इस क्लीनिक को एक मॉडल बनाया है, जो अन्य जिलों के लिए प्रेरणा है।

  • 500 बच्चों की बदली जिंदगी

पिछले पांच सालों में गाजीपुर की क्लब फुट क्लीनिक ने 500 बच्चों का इलाज किया है। यह आंकड़ा उन परिवारों की उम्मीदों को दर्शाता है, जिन्हें पहले लगता था कि उनके बच्चे कभी सामान्य रूप से चल-फिर नहीं पाएंगे। डॉ. रजत कुमार सिंह, जो इस क्लीनिक के नोडल अधिकारी हैं, ने बताया, "हमारा लक्ष्य हर बच्चे को सामान्य जिंदगी देना है। पोंसेटी विधि के जरिए हम बिना बड़े ऑपरेशन के बच्चों के पैर सीधे कर रहे हैं। यह माता-पिता के लिए भी राहत की बात है, क्योंकि इलाज पूरी तरह मुफ्त है।"

एक मां, रीता देवी, ने अपनी बेटी के इलाज के बारे में बताया, "मेरी बेटी का जन्म टेढ़े पैरों के साथ हुआ था। हमें डर था कि वह कभी स्कूल नहीं जा पाएगी। लेकिन इस क्लीनिक ने छह महीने में उसके पैर ठीक कर दिए। अब वह अपने दोस्तों के साथ खेलती है।" इस तरह की कहानियां गाजीपुर की क्लब फुट क्लीनिक की सफलता को बयां करती हैं। क्लब फुट का इलाज न केवल बच्चों की शारीरिक स्थिति को सुधारता है, बल्कि उनके परिवारों पर भी सकारात्मक प्रभाव डालता है। बिना इलाज के, क्लब फुट से पीड़ित बच्चे सामाजिक भेदभाव और शारीरिक अक्षमता का सामना करते हैं। उदय प्रताप जैसे माता-पिता, जो दिहाड़ी मजदूर हैं, के लिए निजी अस्पतालों में इलाज कराना असंभव था। मुफ्त इलाज ने उनकी आर्थिक चिंताओं को कम किया और उनके बच्चों को सामान्य जीवन जीने का मौका दिया।

मिरेकल फीट इंडिया के कार्यकारी निदेशक ने कहा, "हमारा लक्ष्य भारत में क्लब फुट से होने वाली अक्षमता को खत्म करना है। गाजीपुर जैसे क्षेत्रों में हमारी क्लीनिक्स इस दिशा में एक कदम हैं।" संगठन ने कॉर्पोरेट्स जैसे JSW, टाटा पावर, और हीरो एंटरप्राइजेज से फंडिंग प्राप्त की है, जिससे यह कार्यक्रम सतत रूप से चल रहा है। हालांकि गाजीपुर की क्लब फुट क्लीनिक ने शानदार काम किया है, लेकिन कुछ चुनौतियां अभी भी बाकी हैं। कई परिवारों को क्लब फुट के बारे में जानकारी नहीं होती, और वे इसे पोलियो या अन्य असाध्य बीमारी समझ लेते हैं। इसके अलावा, इलाज के बाद ब्रेसेस को नियमित रूप से पहनना एक चुनौती है, क्योंकि कुछ माता-पिता इसे लंबे समय तक नहीं अपनाते। मिरेकल फीट इंडिया और RBSK ने इस समस्या से निपटने के लिए काउंसलर नियुक्त किए हैं, जो परिवारों को इलाज की प्रक्रिया और ब्रेसेस के महत्व के बारे में समझाते हैं। आशा कार्यकर्ताओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। वे गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं की स्क्रीनिंग करती हैं और क्लब फुट के मामलों को क्लीनिक तक पहुंचाने में मदद करती हैं। गाजीपुर में आशा कार्यकर्ताओं को पोंसेटी विधि के बारे में प्रशिक्षण दिया गया है, जिससे जल्दी पहचान और इलाज संभव हो सका है।

गाजीपुर के राजकीय मेडिकल कॉलेज की क्लब फुट क्लीनिक ने 500 बच्चों की जिंदगी बदल दी है और यह साबित किया है कि सही समय पर सही इलाज किसी भी बच्चे को सामान्य जीवन दे सकता है। मिरेकल फीट इंडिया और RBSK की साझेदारी ने न केवल बच्चों को शारीरिक रूप से स्वस्थ किया, बल्कि उनके परिवारों को सामाजिक और आर्थिक बोझ से भी मुक्ति दिलाई। डॉ. रजत कुमार सिंह जैसे समर्पित चिकित्सकों और आशा कार्यकर्ताओं की मेहनत इस कार्यक्रम की रीढ़ है। यह क्लीनिक उन माता-पिता के लिए उम्मीद की किरण है, जो अपने बच्चों के लिए बेहतर भविष्य चाहते हैं। समाज और सरकार को अब इस तरह के प्रयासों को और बढ़ावा देना चाहिए, ताकि हर बच्चा बिना किसी अक्षमता के अपनी जिंदगी जी सके। मिरेकल फीट इंडिया और RBSK का लक्ष्य उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों में भी ऐसी क्लीनिक्स शुरू करना है। उत्तर प्रदेश में हर साल करीब 7,000 बच्चे क्लब फुट के साथ जन्म लेते हैं, लेकिन वर्तमान में केवल 20% बच्चों को ही उचित इलाज मिल पाता है। गाजीपुर मेडिकल कॉलेज की सफलता को देखते हुए, सरकार और एनजीओ अब इस मॉडल को पूरे राज्य में लागू करने की योजना बना रहे हैं। इसके लिए कॉर्पोरेट्स और स्थानीय दानदाताओं से और फंडिंग जुटाई जा रही है।

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