नोएडा में श्रमिक हिंसा की गहरी साजिश: 'बिगुल मजदूर दस्ता' पर लगा दंगे भड़काने का बड़ा आरोप।

उत्तर प्रदेश के औद्योगिक केंद्र नोएडा में हाल ही में हुई श्रमिक हिंसा और आगजनी ने कानून-व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। पुलिस

Apr 23, 2026 - 13:00
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नोएडा में श्रमिक हिंसा की गहरी साजिश: 'बिगुल मजदूर दस्ता' पर लगा दंगे भड़काने का बड़ा आरोप।
नोएडा में श्रमिक हिंसा की गहरी साजिश: 'बिगुल मजदूर दस्ता' पर लगा दंगे भड़काने का बड़ा आरोप।
  • सोची-समझी रणनीति के तहत फूंका गया हिंसा का बिगुल: आदित्य आनंद और उसके साथियों पर कड़ा शिकंजा
  • औद्योगिक शांति भंग करने का ब्लूप्रिंट: व्हाट्सएप ग्रुप्स और सोशल मीडिया के जरिए फैलाई गई अराजकता

उत्तर प्रदेश के औद्योगिक केंद्र नोएडा में हाल ही में हुई श्रमिक हिंसा और आगजनी ने कानून-व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। पुलिस और खुफिया एजेंसियों की जांच में इस हिंसा के पीछे 'बिगुल मजदूर दस्ता' नामक संगठन की भूमिका प्रमुखता से सामने आई है। जांच रिपोर्टों के अनुसार, यह कोई अचानक भड़का हुआ गुस्सा नहीं था, बल्कि एक सोची-समझी और पूर्व-नियोजित साजिश थी। 'बिगुल मजदूर दस्ता' के कार्यकर्ताओं पर आरोप है कि उन्होंने वेतन वृद्धि की जायज मांग कर रहे निर्दोष श्रमिकों को उकसाया और उन्हें हिंसा के पथ पर धकेल दिया। इस संगठन के सदस्यों ने नोएडा के फेज-2, सेक्टर-63 और होजरी कॉम्प्लेक्स जैसे प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में सक्रिय होकर शांतिपूर्ण विरोध को हिंसक प्रदर्शन में बदल दिया, जिसके कारण करोड़ों की संपत्ति का नुकसान हुआ और दर्जनों पुलिसकर्मी घायल हुए। नोएडा पुलिस और स्पेशल टास्क फोर्स (STF) ने इस साजिश के मुख्य सूत्रधार के रूप में आदित्य आनंद को चिन्हित किया है, जिसे तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली से गिरफ्तार किया गया। जांच में यह तथ्य सामने आया है कि आदित्य आनंद और उसके सहयोगियों, जिनमें हिमांशु ठाकुर और सत्यम वर्मा जैसे नाम शामिल हैं, ने मार्च के अंत में ही नोएडा में डेरा डाल दिया था। इन लोगों ने श्रमिकों के बीच जाकर गोपनीय बैठकें कीं और उनके मन में उद्योगपतियों और प्रशासन के प्रति नफरत का जहर भरा। पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह के अनुसार, ये आरोपी नोएडा के निवासी नहीं थे, बल्कि एक विशेष एजेंडे के तहत बाहर से आए थे ताकि शहर की औद्योगिक शांति को अस्थिर किया जा सके। इनके पास से बरामद दस्तावेजों और डिजिटल साक्ष्यों से स्पष्ट होता है कि इन्होंने बाकायदा एक 'ब्लूप्रिंट' तैयार किया था कि किस समय और किस स्थान पर भीड़ को उग्र बनाना है।

हिंसा को भड़काने के लिए डिजिटल माध्यमों का सहारा लेना इस साजिश का सबसे खतरनाक पहलू था। 10 अप्रैल की रात को, जब हरियाणा सरकार ने अपने राज्य में न्यूनतम वेतन में बढ़ोतरी की घोषणा की, तो बिगुल दस्ता के सदस्यों ने तुरंत इसका फायदा उठाया। उन्होंने रातों-रात कई व्हाट्सएप ग्रुप्स बनाए और क्यूआर कोड (QR Code) के जरिए हजारों श्रमिकों को जोड़ा। इन ग्रुप्स में भड़काऊ संदेश, फर्जी खबरें और पाकिस्तान से संचालित होने वाले कुछ संदिग्ध सोशल मीडिया अकाउंट्स के पोस्ट साझा किए गए। पुलिस की साइबर सेल ने पाया कि 'अनुषी तिवारी' और 'मीर इलियास इंक' जैसे अकाउंट्स से यह अफवाह फैलाई गई कि पुलिस की गोलीबारी में कई श्रमिकों की मौत हो गई है। इस निराधार सूचना ने आग में घी का काम किया और अगले ही दिन 13 अप्रैल को हजारों की भीड़ सड़कों पर उतर आई और जमकर तोड़फोड़ व आगजनी की।

'आदित्य आनंद' का पुराना ट्रैक रिकॉर्ड

पुलिस जांच में यह भी सामने आया है कि मास्टरमाइंड आदित्य आनंद का संबंध पहले भी विवादित आंदोलनों से रहा है। एनआईटी जमशेदपुर से बीटेक स्नातक आदित्य आनंद पर सीएए (CAA) और एनआरसी (NRC) विरोधी आंदोलनों के दौरान भी भीड़ को लामबंद करने के आरोप लगे थे। वह और उसके साथी 'बिगुल मजदूर दस्ता' के बैनर तले विभिन्न राज्यों में सक्रिय रहे हैं, जहां इनका मुख्य उद्देश्य स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय अस्थिरता का रूप देना होता है।

गौतम बुद्ध नगर पुलिस ने इस मामले में अब तक 13 से अधिक एफआईआर दर्ज की हैं और 200 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। 'बिगुल मजदूर दस्ता' के सक्रिय सदस्य हिमांशु ठाकुर और सत्यम वर्मा की गिरफ्तारी से इस नेटवर्क की कई परतें खुली हैं। पुलिस के अनुसार, ये लोग लगातार आदित्य आनंद के संपर्क में थे और ग्राउंड जीरो पर दंगे की स्क्रिप्ट को अंजाम दे रहे थे। इन्होंने श्रमिकों को पत्थरबाजी करने, निजी वाहनों को आग लगाने और शोरूमों में तोड़फोड़ करने के लिए प्रेरित किया। विशेष रूप से सेक्टर-63 स्थित एक कार शोरूम में हुई आगजनी में इसी दस्ते की भूमिका सबसे अधिक संदिग्ध पाई गई है। पुलिस अब इन आरोपियों के 'फंडिंग मॉडल' की भी जांच कर रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि इस बड़े पैमाने के ऑपरेशन के लिए पैसा कहां से आ रहा था। श्रमिकों के हितों की रक्षा का दावा करने वाले इस संगठन की असली मंशा पर अब गंभीर सवाल उठ रहे हैं। जहां एक ओर उत्तर प्रदेश सरकार ने हिंसा के तुरंत बाद श्रमिकों के न्यूनतम वेतन में 21 प्रतिशत की बढ़ोतरी कर उनकी मांगों को मान लिया, वहीं 'बिगुल दस्ता' के सदस्यों का उद्देश्य आंदोलन को लंबा खींचना और मई 2026 तक शहर को बंधक बनाए रखना था। लखनऊ के 'कामरेड अरविंद मेमोरियल ट्रस्ट' से जुड़े इस नेटवर्क के कतारों में कई छात्र और महिला संगठन भी शामिल बताए जा रहे हैं, जो अलग-अलग नामों से सक्रिय हैं। पुलिस का मानना है कि ये संगठन श्रमिकों के कंधों पर बंदूक रखकर अपनी विचारधारा को थोपना चाहते हैं। फिलहाल प्रशासन इन संगठनों के पंजीकरण और उनकी गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाने की कानूनी संभावनाओं पर विचार कर रहा है।

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