वैश्विक अर्थव्यवस्था पर IMF का बड़ा अलर्ट: महंगाई तोड़ेगी पूरी दुनिया की कमर, स्पेशल रिपोर्ट में देखिये, ये देश हैं शामिल।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) द्वारा मार्च 2026 में जारी नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक विकास दर के 3.3 प्रतिशत के आसपास रहने का
- 2026-27 के लिए आर्थिक अनुमान: IMF ने भू-राजनीतिक तनाव और व्यापारिक बाधाओं को बताया विकास में बड़ी रुकावट
- भारत की मजबूती बरकरार, पर दुनिया में मंदी की आहट: अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने जारी की चेतावनी भरी रिपोर्ट
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) द्वारा मार्च 2026 में जारी नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक विकास दर के 3.3 प्रतिशत के आसपास रहने का अनुमान है। हालांकि यह आंकड़ा पिछले कुछ वर्षों की तुलना में स्थिर लग सकता है, लेकिन संस्था ने आगाह किया है कि यह विकास दर महामारी से पूर्व के औसत स्तरों से काफी नीचे है। रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि दुनिया भर में लागू की जा रही नई व्यापारिक नीतियां और संरक्षणवाद (Protectionism) के कारण वैश्विक व्यापार की गति धीमी हुई है। IMF की प्रबंध निदेशक क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने एक संबोधन में कहा कि हालांकि वैश्विक अर्थव्यवस्था ने लचीलापन दिखाया है, लेकिन भविष्य की राह चुनौतियों से भरी है। उनके अनुसार, व्यापारिक तनाव और सप्लाई चेन में हो रहे बदलाव वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि को बाधित कर रहे हैं।
महंगाई यानी मुद्रास्फीति को लेकर IMF की रिपोर्ट में मिली-जुली तस्वीर पेश की गई है। रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक हेडलाइन मुद्रास्फीति 2025 के 4.1 प्रतिशत से घटकर 2026 में 3.8 प्रतिशत रहने की उम्मीद है। हालांकि यह गिरावट राहत देने वाली लग सकती है, लेकिन संस्था ने चेतावनी दी है कि अमेरिका जैसे बड़े देशों में महंगाई को लक्ष्य (Target) तक लाने की प्रक्रिया उम्मीद से कहीं अधिक धीमी होगी। विशेष रूप से मध्य पूर्व में चल रहे संघर्षों के कारण तेल की कीमतों में आए 50 प्रतिशत तक के उछाल ने महंगाई को फिर से भड़काने का काम किया है। IMF का आकलन है कि तेल की कीमतों में हर 10 प्रतिशत की वृद्धि वैश्विक मुद्रास्फीति को 40 बेसिस पॉइंट तक बढ़ा सकती है, जिसका सीधा असर आम जनता की जेब पर पड़ेगा।
आर्थिक विकास की सुस्ती के पीछे मुख्य कारणों में भू-राजनीतिक अस्थिरता को सबसे ऊपर रखा गया है। रिपोर्ट में 'स्ट्रेइट ऑफ होर्मुज' जैसे रणनीतिक जलमार्गों का उदाहरण देते हुए बताया गया है कि वैश्विक तेल आपूर्ति का पांचवां हिस्सा इन क्षेत्रों से गुजरता है। यदि इन क्षेत्रों में तनाव बढ़ता है, तो इससे न केवल ऊर्जा की कीमतें बढ़ेंगी, बल्कि वैश्विक उत्पादन में भी 0.1 से 0.2 प्रतिशत की गिरावट आ सकती है। इसके अतिरिक्त, अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते व्यापारिक तनाव ने वैश्विक निवेश को भी प्रभावित किया है। कंपनियों द्वारा अपनी सप्लाई चेन को फिर से व्यवस्थित करने (Friend-shoring) की प्रक्रिया में लागत बढ़ रही है, जिसका अंततः बोझ उपभोक्ता पर ही पड़ रहा है।
विकसित और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के बीच विकास का अंतर और चौड़ा होने की आशंका जताई गई है। IMF के अनुसार, अमेरिका की विकास दर 2 प्रतिशत के आसपास रहने की उम्मीद है, जबकि यूरो क्षेत्र 1.2 प्रतिशत की धीमी गति से आगे बढ़ सकता है। इसके विपरीत, उभरते हुए बाजार और विकासशील अर्थव्यवस्थाएं (EMDEs) वैश्विक विकास के प्राथमिक इंजन बने रहेंगे। भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर IMF ने अपना विश्वास बरकरार रखा है और 2026 के लिए 6.4 प्रतिशत की विकास दर का अनुमान लगाया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में घरेलू मांग और डिजिटल बुनियादी ढांचे में निवेश के कारण आर्थिक गतिविधियां मजबूत बनी हुई हैं, जो इसे अन्य देशों की तुलना में बेहतर स्थिति में रखता है।
AI और तकनीकी निवेश का असर
IMF की रिपोर्ट में एक सकारात्मक पहलू भी है। संस्था का मानना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और नई तकनीकों में हो रहे निवेश से उत्पादकता में बढ़ोतरी हो सकती है। विशेष रूप से उत्तरी अमेरिका और एशिया के कुछ देशों में तकनीकी क्षेत्र में हो रहा खर्च आर्थिक सुस्ती के प्रभाव को कुछ हद तक कम करने में मदद कर रहा है। यदि AI को तेजी से अपनाया जाता है, तो यह लंबी अवधि में टिकाऊ विकास का आधार बन सकता है।
राजकोषीय घाटा और बढ़ता सार्वजनिक कर्ज भी वैश्विक स्थिरता के लिए एक बड़ा खतरा बनकर उभरा है। रिपोर्ट में बताया गया है कि कई देशों ने अपनी अर्थव्यवस्थाओं को सहारा देने के लिए भारी कर्ज लिया है, जिसके कारण ब्याज दरें ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। उच्च ब्याज दरों के कारण निजी क्षेत्र के लिए निवेश करना महंगा हो गया है, जिससे रोजगार सृजन की प्रक्रिया धीमी पड़ रही है। IMF ने देशों को सलाह दी है कि वे अपने राजकोषीय बफर को फिर से बनाएं और स्वतंत्र केंद्रीय बैंकों के माध्यम से मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के प्रयास जारी रखें। संस्था का मानना है कि वित्तीय अनुशासन ही आने वाले समय में आर्थिक झटकों को सहने की क्षमता प्रदान करेगा।
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