मोगा पंचायत चुनाव में प्रशासनिक लापरवाही पर हाई कोर्ट सख्त: एसडीएम को लगाई कड़ी फटकार, कहा- लोकतंत्र में नहीं चलेगी राजनीतिक दखलअंदाजी।
पंजाब के मोगा जिले में पंचायत और ब्लॉक समिति चुनावों को लेकर चल रहा विवाद अब न्यायपालिका की दहलीज पर पहुंच गया है, जहां पंजाब
- एसडीएम बागापुराना और डीसी के बीच टकराव से खड़ा हुआ संवैधानिक संकट, उच्च न्यायालय ने चुनाव प्रक्रिया में निष्पक्षता बनाए रखने के दिए निर्देश
- पंजाब पंचायत चुनाव विवाद: कोर्ट ने निर्वाचन अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर उठाए सवाल, राजनीतिक दबाव में काम करने वाले अफसरों को दी सख्त चेतावनी
पंजाब के मोगा जिले में पंचायत और ब्लॉक समिति चुनावों को लेकर चल रहा विवाद अब न्यायपालिका की दहलीज पर पहुंच गया है, जहां पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने प्रशासनिक अधिकारियों के रवैये पर अत्यंत तीखी टिप्पणी की है। विशेष रूप से बागापुराना के एसडीएम (Sub-Divisional Magistrate) की कार्यप्रणाली और राजनीतिक दबाव में लिए गए निर्णयों को लेकर अदालत ने सख्त रुख अख्तियार किया है। मोगा के बागापुराना ब्लॉक समिति के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद के लिए हुए चुनावों में धांधली और विपक्षी सदस्यों को प्रक्रिया से बाहर रखने के आरोपों पर सुनवाई करते हुए माननीय न्यायाधीशों ने कहा कि निर्वाचन अधिकारियों का कार्य निष्पक्षता सुनिश्चित करना है, न कि किसी विशेष राजनीतिक दल के एजेंट के रूप में कार्य करना। कोर्ट ने इस बात पर गहरी नाराजगी जताई कि कैसे प्रशासनिक मशीनरी का उपयोग लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को बाधित करने के लिए किया जा रहा है।
इस पूरे विवाद की जड़ें मार्च 2026 में हुए बागापुराना ब्लॉक समिति के चुनावों से जुड़ी हैं, जहां चुनाव प्रक्रिया को बीच में ही रोकना पड़ा था। रिपोर्टों के अनुसार, बागापुराना के एसडीएम बबनदीप सिंह वालिया ने पंजाब के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर मोगा के डिप्टी कमिश्नर (DC) सागर सेतिया पर 'गंभीर उत्पीड़न' और 'मानसिक प्रताड़ना' के आरोप लगाए थे। एसडीएम का दावा था कि उन पर सत्ताधारी दल के उम्मीदवारों को जिताने के लिए अनुचित दबाव बनाया गया, जबकि उनके पास बहुमत नहीं था। इस प्रशासनिक खींचतान ने न केवल जिले के कामकाज को प्रभावित किया, बल्कि चुनाव की पवित्रता पर भी सवाल खड़े कर दिए। हाई कोर्ट ने इस स्थिति को 'लोकतंत्र के लिए दुर्भाग्यपूर्ण' बताते हुए कहा कि यदि जिला स्तर के सबसे बड़े अधिकारी ही आपस में उलझेंगे और राजनीतिक आकाओं को खुश करने की कोशिश करेंगे, तो आम नागरिक का चुनाव प्रणाली से भरोसा उठ जाएगा।
अदालत में सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि चुनाव वाले दिन 15 से अधिक निर्वाचित सदस्यों को कथित तौर पर मतदान प्रक्रिया में भाग लेने से रोका गया था। हाई कोर्ट ने इस बिंदु को गंभीरता से लेते हुए एसडीएम को फटकार लगाई कि एक रिटर्निंग ऑफिसर (RO) होने के नाते यह उनकी जिम्मेदारी थी कि वे कानून-व्यवस्था बनाए रखें और सभी सदस्यों की भागीदारी सुनिश्चित करें। कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि "राजनीतिक हस्तक्षेप" का बहाना बनाकर कोई भी अधिकारी अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों से पल्ला नहीं झाड़ सकता। यदि मौके पर कानून-व्यवस्था की स्थिति खराब थी, तो पर्याप्त सुरक्षा बल क्यों नहीं बुलाया गया? अदालत ने चेतावनी दी कि यदि चुनाव प्रक्रिया में किसी भी स्तर पर जानबूझकर की गई चूक पाई जाती है, तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ न केवल विभागीय कार्रवाई बल्कि अवमानना का मामला भी चलाया जा सकता है। पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पंचायत चुनाव लोकतंत्र की बुनियादी इकाई हैं। यदि इन चुनावों में एसडीएम और डीसी स्तर के अधिकारी राजनीतिक दबाव के आगे झुकते हैं, तो यह सीधे तौर पर संविधान की मूल भावना पर प्रहार है। प्रशासन को किसी भी दल की कठपुतली बनने के बजाय कानून के शासन को प्राथमिकता देनी चाहिए।
विपक्षी दलों ने भी इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए आरोप लगाया है कि मोगा प्रशासन पूरी तरह से सत्ता पक्ष के दबाव में काम कर रहा है। हाई कोर्ट में दायर याचिकाओं में कहा गया है कि कई उम्मीदवारों के नामांकन पत्र तुच्छ आधारों पर रद्द कर दिए गए थे और चुनाव की तारीखों में बार-बार बदलाव किया गया ताकि विपक्षी गठबंधन को कमजोर किया जा सके। उच्च न्यायालय ने इन आरोपों के मद्देनजर मोगा के डिप्टी कमिश्नर से पूरी चुनाव प्रक्रिया की विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी उम्मीदवार का नामांकन पत्र रद्द करने से पहले उसे अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर दिया जाना चाहिए था। प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा की गई 'मनमानी' को अदालत ने 'शक्तियों का दुरुपयोग' करार दिया और कहा कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
इस मामले में एक नया मोड़ तब आया जब एसडीएम ने आरोप लगाया कि उन्हें देर रात तक फोन कॉल्स के जरिए डराया-धमकाया गया। हालांकि, जिला प्रशासन ने इन आरोपों को निराधार बताते हुए इसे अपनी विफलता को छिपाने का प्रयास बताया है। हाई कोर्ट ने इस अंतर्कलह पर टिप्पणी करते हुए कहा कि अधिकारियों के बीच का यह विवाद प्रशासनिक तंत्र के पतन को दर्शाता है। कोर्ट ने डीसी मोगा को निर्देश दिया कि वे सुनिश्चित करें कि जिले में होने वाले आगामी किसी भी पंचायत उपचुनाव या स्थानीय निकाय चुनाव में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम हों और वीडियोग्राफी के जरिए पूरी पारदर्शिता बरती जाए। अदालत ने यह भी कहा कि चुनाव अधिकारियों को किसी भी प्रकार के राजनीतिक कॉल को रिकॉर्ड करना चाहिए और यदि दबाव बनाया जाता है, तो उसे सीधे उच्च अधिकारियों या कोर्ट के संज्ञान में लाना चाहिए।
मोगा पंचायत चुनाव विवाद ने पंजाब की राजनीति में भी उबाल ला दिया है। विभिन्न राजनीतिक संगठनों ने हाई कोर्ट की टिप्पणियों का स्वागत करते हुए इसे लोकतंत्र की जीत बताया है। कोर्ट ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि निष्पक्ष चुनाव कराना केवल चुनाव आयोग का ही नहीं, बल्कि जमीन पर तैनात हर प्रशासनिक अधिकारी का कर्तव्य है। यदि कोई अधिकारी अपनी ड्यूटी निभाने में असमर्थ है, तो उसे पद छोड़ देना चाहिए, लेकिन उसे प्रक्रिया को कलंकित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। उच्च न्यायालय ने इस मामले की अगली सुनवाई तक यथास्थिति बनाए रखने और चुनाव परिणामों की घोषणा को कानूनी प्रक्रिया के अधीन रखने का निर्देश दिया है। इससे उन उम्मीदवारों को बड़ी राहत मिली है जिन्हें गलत तरीके से चुनावी दौड़ से बाहर कर दिया गया था।
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