मध्य प्रदेश में पान की खेती में क्रांतिकारी बदलाव लाने वाली मटका खाद की विधि।
छतरपुर जिले के गढ़ीमलहरा क्षेत्र में रहने वाले किसान भगवान दास चौरसिया पिछले 40 वर्षों से पान की खेती से जुड़े हुए हैं। उन्होंने अपनी खेती में
- गढ़ीमलहरा के किसान भगवान दास चौरसिया द्वारा अपनाई गई देसी मटका खाद बनाने की प्रक्रिया और उसके फायदे
- सरसों और तिल की खली से तैयार होने वाली मटका खाद पान की बेलों को तेजी से बढ़ाने में सहायक साबित हो रही है
- महंगी रासायनिक खाद से मुक्ति पाकर पान की खेती में लागत घटाने का भगवान दास का सफल तरीका
छतरपुर जिले के गढ़ीमलहरा क्षेत्र में रहने वाले किसान भगवान दास चौरसिया पिछले 40 वर्षों से पान की खेती से जुड़े हुए हैं। उन्होंने अपनी खेती में आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए एक देसी तरीका अपनाया है, जिसमें मटका खाद का उपयोग प्रमुख है। इस खाद को बनाने के लिए सरसों और तिल की खली का इस्तेमाल किया जाता है। भगवान दास ने बताया कि पान की खेती में वर्ष भर खाद की आवश्यकता पड़ती है, और बाजार में उपलब्ध रासायनिक खाद की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। इससे खेती की लागत में वृद्धि हो रही थी, जिससे उन्होंने खुद घर पर ही देसी खाद तैयार करने का निर्णय लिया। मटका खाद बनाने की प्रक्रिया सरल है, जिसमें एक बड़े मटके में 6 से 7 पसेरी खली डाली जाती है और फिर उसमें पानी मिलाकर 6 से 7 दिनों तक सड़ने के लिए छोड़ दिया जाता है। लगभग 7 दिनों में यह खाद उपयोग के लिए तैयार हो जाती है। इस खाद का उपयोग करने से पान की बेलें तेजी से बढ़ती हैं। इसके अलावा, यह खाद सस्ती होने के साथ-साथ अधिक प्रभावी भी साबित हो रही है। भगवान दास के अनुसार, इस विधि से रासायनिक खाद खरीदने की झंझट समाप्त हो गई है।
भगवान दास चौरसिया ने पान की खेती में रासायनिक खाद के स्थान पर मटका खाद का उपयोग शुरू किया, क्योंकि रासायनिक खाद की बढ़ती कीमतें उनकी खेती को प्रभावित कर रही थीं। वे बताते हैं कि चना, मसूर और सरसों जैसी फसलों में किसान डीएपी और यूरिया जैसी खाद डालते हैं, ठीक उसी प्रकार पान की खेती में भी रासायनिक खाद का इस्तेमाल होता है। लेकिन उन्होंने देसी खाद बनाने का विचार किया और सरसों तथा तिल की खली से मटका खाद तैयार की। इस खाद को बनाने में लागत लगभग न के बराबर आती है। प्रक्रिया में एक बड़े मटके में खली और पानी मिलाकर उसे सड़ने दिया जाता है। 6 से 7 दिनों की अवधि में खाद तैयार हो जाती है। इस खाद के उपयोग से पान की बेलों में तेजी से वृद्धि होती है, जिससे उत्पादन में सुधार आता है। साथ ही, लागत में कमी आती है और मुनाफा बढ़ता है। भगवान दास के अनुभव से पता चलता है कि पान की खेती में बारह महीने खाद की जरूरत होती है, और इस देसी विधि से वह जरूरत पूरी हो रही है। इस खाद की प्रभावशीलता रासायनिक खाद से अधिक है, और यह सस्ती भी है।
गढ़ीमलहरा के भगवान दास चौरसिया ने अपनी 40 वर्षों की पान खेती के अनुभव से सीखा कि महंगी रासायनिक खाद से परेशान होकर देसी मटका खाद का तरीका अपनाना आवश्यक था। उन्होंने सरसों और तिल की खली से इस खाद को तैयार किया। खाद बनाने की विधि में बड़े मटके का उपयोग होता है, जिसमें 6 से 7 पसेरी खली डाली जाती है। फिर पानी मिलाकर मिश्रण को 6 से 7 दिनों तक सड़ने के लिए रखा जाता है। सात दिनों में खाद उपयोग योग्य हो जाती है। इस खाद से पान की बेलें तेज गति से बढ़ती हैं। लागत में कमी आती है, क्योंकि रासायनिक खाद खरीदने की आवश्यकता नहीं पड़ती। मुनाफा बढ़ता है, क्योंकि उत्पादन में वृद्धि होती है। भगवान दास ने बताया कि पान की खेती में वर्ष भर खाद की जरूरत होती है, और बाजार की खाद महंगी होने से खर्च बढ़ रहा था। इसलिए उन्होंने घर पर ही देसी खाद बनाने का फैसला किया। इस विधि से झंझट खत्म हो गई है, और खाद सस्ती तथा असरदार साबित हो रही है।
भगवान दास चौरसिया, जो छतरपुर जिले के गढ़ीमलहरा में रहते हैं, पिछले 40 सालों से पान की खेती कर रहे हैं। उन्होंने रासायनिक खाद की बढ़ती लागत से बचने के लिए मटका खाद का देसी तरीका अपनाया। इस खाद को सरसों और तिल की खली से बनाया जाता है। बनाने की प्रक्रिया में एक बड़े मटके में खली की 6 से 7 पसेरी मात्रा डाली जाती है, फिर पानी मिलाकर 6 से 7 दिनों तक सड़ने दिया जाता है। सात दिनों के बाद खाद तैयार हो जाती है। इस खाद के इस्तेमाल से पान की बेलों में तेज विकास होता है। लागत घटती है, क्योंकि बाजार से महंगी खाद खरीदने की जरूरत नहीं रहती। मुनाफा बढ़ता है, क्योंकि उत्पादन में सुधार आता है। भगवान दास के अनुसार, पान की खेती में 12 महीने खाद की आवश्यकता होती है, और रासायनिक खाद की कीमतें लगातार बढ़ रही थीं। इसलिए उन्होंने खुद देसी खाद घर पर तैयार करने का विचार किया। यह खाद सस्ती होने के साथ अधिक प्रभावी है, और रासायनिक खाद की झंझट से मुक्ति मिलती है।
छतरपुर के गढ़ीमलहरा निवासी भगवान दास चौरसिया ने पान की खेती में 40 वर्षों का अनुभव प्राप्त किया है। उन्होंने महंगी रासायनिक खाद से परेशान होकर देसी मटका खाद का उपयोग शुरू किया। खाद सरसों और तिल की खली से तैयार की जाती है। विधि में बड़े मटके में 6-7 पसेरी खली और पानी मिलाकर 6-7 दिन सड़ने दिया जाता है। 7 दिन में खाद बनकर तैयार हो जाती है। इससे पान की बेलें तेजी से बढ़ती हैं। लागत में कमी आती है और मुनाफा बढ़ता है। भगवान दास बताते हैं कि पान खेती में बारह महीने खाद की जरूरत पड़ती है, और बाजार की खाद महंगी हो रही थी। इसलिए घर पर देसी खाद बनाने लगे। इस विधि से रासायनिक खाद खरीदने की समस्या समाप्त हो गई। खाद सस्ती और असरदार है।
भगवान दास चौरसिया गढ़ीमलहरा के निवासी हैं और 40 साल से पान की खेती कर रहे हैं। उन्होंने रासायनिक खाद की बढ़ती कीमतों से बचने के लिए मटका खाद का देसी फॉर्मूला अपनाया। खाद बनाने के लिए सरसों और तिल की खली का इस्तेमाल होता है। बड़े मटके में 6 से 7 पसेरी खली डालकर पानी मिलाया जाता है और 6 से 7 दिनों तक सड़ने दिया जाता है। सात दिनों में खाद तैयार हो जाती है। इस खाद से पान की बेलों में तेज वृद्धि होती है। लागत घटती है, मुनाफा बढ़ता है। पान की खेती में वर्ष भर खाद की जरूरत होती है, और महंगी खाद से खर्च बढ़ रहा था। इसलिए देसी खाद घर पर बनाने का फैसला किया। यह विधि झंझट मुक्त है और खाद प्रभावी साबित हो रही है।
गढ़ीमलहरा के भगवान दास चौरसिया ने पान खेती के 40 वर्षों में सीखा कि रासायनिक खाद की महंगाई से देसी मटका खाद बेहतर विकल्प है। खाद सरसों और तिल की खली से बनती है। प्रक्रिया में मटके में खली और पानी मिलाकर सड़ने दिया जाता है। 6-7 दिन बाद खाद तैयार। पान बेलें तेज बढ़ती हैं, लागत कम होती है, मुनाफा बढ़ता है। वर्ष भर खाद की जरूरत में यह उपयोगी है। बाजार की खाद से झंझट खत्म। खाद सस्ती और असरदार।
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