अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ईरान को दो टूक, हिज़्बुल्लाह की फंडिंग रोकने पर अड़े, बोले- 'यह ज़रूरी है'।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर मध्य पूर्व की राजनीति में अपनी आक्रामक और स्पष्ट विदेश नीति का परिचय देते हुए ईरान

Apr 24, 2026 - 11:40
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ईरान को दो टूक, हिज़्बुल्लाह की फंडिंग रोकने पर अड़े, बोले- 'यह ज़रूरी है'।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ईरान को दो टूक, हिज़्बुल्लाह की फंडिंग रोकने पर अड़े, बोले- 'यह ज़रूरी है'।
  • ट्रंप के कड़े तेवर: क्या ईरान पर नया दबाव बदलेगा मध्य पूर्व की तस्वीर? हिज़्बुल्लाह की आर्थिक कमर तोड़ने की तैयारी
  • व्हाइट हाउस में शांति वार्ताओं के बीच ट्रंप का बड़ा बयान, 'ईरान को आतंकी फंडिंग बंद करनी ही होगी, तभी होगा समझौता'

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर मध्य पूर्व की राजनीति में अपनी आक्रामक और स्पष्ट विदेश नीति का परिचय देते हुए ईरान को कड़ी चेतावनी दी है। व्हाइट हाउस के ओवल ऑफिस में पत्रकारों से चर्चा के दौरान ट्रंप ने स्पष्ट किया कि ईरान के साथ किसी भी स्थायी समझौते के लिए सबसे पहली शर्त हिज़्बुल्लाह को दी जाने वाली फंडिंग का पूर्ण रूप से खात्मा है। जब उनसे पूछा गया कि क्या ईरान को अपनी इस फंडिंग को बंद करना होगा, तो उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के कहा, "हां, उन्हें यह बंद करना होगा। यह केवल एक विकल्प नहीं बल्कि एक अनिवार्यता है।" ट्रंप का यह बयान ऐसे समय में आया है जब क्षेत्र में इजरायल और लेबनान के बीच संघर्ष विराम को लेकर जटिल वार्ताएं चल रही हैं और अमेरिका ईरान पर 'मैक्सिमम प्रेशर' यानी अधिकतम दबाव की नीति को नए सिरे से लागू कर रहा है।

ईरान और हिज़्बुल्लाह के बीच दशकों पुराने संबंधों पर प्रहार करते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने तर्क दिया कि जब तक तेहरान अपने छद्म संगठनों (प्रॉक्सी) को आर्थिक और सैन्य सहायता देना बंद नहीं करता, तब तक क्षेत्र में शांति की कोई भी कोशिश सफल नहीं हो सकती। उन्होंने उल्लेख किया कि हिज़्बुल्लाह न केवल इजरायल के लिए खतरा है, बल्कि लेबनान की संप्रभुता को भी कमजोर कर रहा है। ट्रंप के अनुसार, ईरान की अर्थव्यवस्था वर्तमान में भारी दबाव में है और उनके पास समझौते के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि वे ईरान के साथ एक "एवरलास्टिंग" यानी चिरस्थायी समझौता चाहते हैं, लेकिन इसके लिए ईरान को अपनी क्षेत्रीय विस्तारवादी नीतियों और आतंकी समूहों के समर्थन को पूरी तरह त्यागना होगा।

मध्य पूर्व की मौजूदा स्थिति में ट्रंप प्रशासन का यह रुख इजरायल-लेबनान सीमा पर जारी तनाव को कम करने के प्रयासों से जुड़ा हुआ है। हाल ही में ट्रंप ने घोषणा की थी कि इजरायल और लेबनान के बीच संघर्ष विराम को तीन सप्ताह के लिए बढ़ा दिया गया है। इसी संदर्भ में उन्होंने कहा कि अमेरिका लेबनान की सरकार और उसकी सेना के साथ मिलकर काम करेगा ताकि वह खुद को हिज़्बुल्लाह के प्रभाव से मुक्त कर सके। ट्रंप का मानना है कि लेबनान एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र तभी बन सकता है जब वहां से ईरानी दखल खत्म हो जाए। उनका यह सख्त रुख इस बात की ओर संकेत करता है कि वे पिछले समझौतों की कमियों को दूर कर एक ऐसा ढांचा तैयार करना चाहते हैं जहां ईरान की सैन्य पहुंच केवल उसकी सीमाओं तक ही सीमित रहे।

अप्रैल 2026 में व्हाइट हाउस में हुई उच्च स्तरीय बैठकों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका अब केवल परमाणु कार्यक्रम तक सीमित नहीं है। राष्ट्रपति ट्रंप के एजेंडे में अब ईरान की 'मिसाइल तकनीक' और 'क्षेत्रीय फंडिंग' सबसे ऊपर है। विशेषज्ञों का मानना है कि ओमान में हुई परोक्ष वार्ताओं के विफल होने के बाद अब ट्रंप सीधे दबाव की रणनीति अपना रहे हैं, जिससे ईरान की वित्तीय स्थिति और अधिक नाजुक हो सकती है।

ईरान की आंतरिक स्थिति का जिक्र करते हुए ट्रंप ने यह भी दावा किया कि वहां का नेतृत्व इस समय गहरे संकट और उथल-पुथल में है। उन्होंने पत्रकारों से कहा कि अमेरिका ने ईरान के लगभग 75 प्रतिशत सैन्य लक्ष्यों को पहले ही अपनी पारंपरिक सैन्य शक्ति से प्रभावित कर दिया है। उन्होंने परमाणु हथियारों के उपयोग की संभावना को खारिज करते हुए कहा कि उनके पास बिना इन घातक हथियारों के भी ईरान को झुकने पर मजबूर करने की क्षमता है। ट्रंप का यह दावा कि "समय ईरान के पक्ष में नहीं है", इस बात को पुष्ट करता है कि वे ईरान को आर्थिक रूप से इतना अलग-थलग कर देना चाहते हैं कि वह अपने सहयोगियों, विशेषकर हिज़्बुल्लाह को दी जाने वाली करोड़ों डॉलर की सहायता जारी रखने में सक्षम न रहे।

लेबनान के भीतर हिज़्बुल्लाह की पकड़ और ईरान के साथ उसके वैचारिक संबंधों को देखते हुए यह कार्य अत्यंत चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। ट्रंप ने अपनी सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से भी यह संदेश दिया कि वे जल्द ही इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और लेबनानी राष्ट्रपति जोसेफ औन की मेजबानी करेंगे। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य एक ऐसी रूपरेखा तैयार करना है जिसमें लेबनान की राष्ट्रीय सेना (LAF) को मजबूत किया जाए और हिज़्बुल्लाह के सैन्य विंग को निशस्त्रीकरण की ओर धकेला जाए। ट्रंप ने स्पष्ट किया कि यदि ईरान मेज पर लौटकर इन शर्तों को नहीं मानता है, तो अमेरिका फिर से ऊर्जा ठिकानों और शेष सैन्य लक्ष्यों पर बमबारी शुरू कर सकता है।

ईरान की ओर से इन बयानों पर प्रतिक्रिया भी आई है, जिसमें राष्ट्रपति मसूद पेजेशक्यान ने अमेरिका के दावों को नकारते हुए ईरान की एकता की बात कही है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह स्पष्ट दिख रहा है कि होर्मुज जलडमरूमध्य की घेराबंदी और वैश्विक तेल की कीमतों में उछाल के बीच ईरान की सौदेबाजी की शक्ति घटती जा रही है। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि ईरान ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी आय का बड़ा हिस्सा जनहित के बजाय क्षेत्रीय अस्थिरता फैलाने में लगाया है। इसी कारण, फंडिंग बंद करने की शर्त को अब किसी भी भावी संधि के केंद्र में रखा गया है। ट्रंप के सहयोगियों का कहना है कि यह "शांति के बदले विकास" का सौदा है, लेकिन इसमें 'फंडिंग कट' पहली शर्त है।

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