आधुनिक जीवनशैली और गलत खानपान की आदतें बन रही हैं पेट की गंभीर बीमारियों की मुख्य वजह, युवा पीढ़ी में तेजी से बढ़ रहा है आंतों का संक्रमण।
आज के आधुनिक दौर में पेट फूलना, खट्टी डकारें आना, एसिडिटी और कब्ज जैसी समस्याएं केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रह गई हैं,
- पेट फूलना, एसिडिटी और पुरानी कब्ज की समस्या को हल्के में लेना पड़ सकता है भारी, पेट के खराब स्वास्थ्य का सीधा असर मानसिक सेहत पर भी
- डिब्बाबंद भोजन, देर रात तक जागने की आदत और शारीरिक निष्क्रियता ने बिगाड़ा युवाओं का पाचन तंत्र, आंतों के मित्र बैक्टीरिया को हो रहा है बड़ा नुकसान
आज के आधुनिक दौर में पेट फूलना, खट्टी डकारें आना, एसिडिटी और कब्ज जैसी समस्याएं केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रह गई हैं, बल्कि इसकी चपेट में सबसे ज्यादा युवा पीढ़ी आ रही है। भागदौड़ भरी जिंदगी, करियर का अत्यधिक तनाव और खानपान की आदतों में आए अचानक बदलाव ने युवाओं के पूरे पाचन तंत्र को हिलाकर रख दिया है। अक्सर कामकाजी युवा इन शुरुआती लक्षणों को सामान्य समझकर नजरअंदाज कर देते हैं या फिर बिना किसी डॉक्टरी सलाह के अस्थाई राहत देने वाली एंटासिड दवाइयों का धड़ल्ले से सेवन करने लगते हैं। यह लापरवाही धीरे-धीरे आंतों की आंतरिक परत को गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त कर देती है, जिससे भविष्य में 'इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोम' (IBS) या आंतों में अल्सर जैसी बेहद कष्टदायक बीमारियां जन्म ले लेती हैं। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, हमारे शरीर का करीब सत्तर प्रतिशत रोग प्रतिरोधक तंत्र सीधे तौर पर हमारी आंतों के स्वास्थ्य से जुड़ा होता है, इसलिए आंतों में होने वाली छोटी सी गड़बड़ी भी पूरे शरीर की कार्यप्रणाली को पूरी तरह से प्रभावित कर देती है।
युवाओं की दैनिक दिनचर्या का यदि सूक्ष्मता से अवलोकन किया जाए, तो यह साफ हो जाता है कि उनके खाने-पीने का कोई निश्चित समय नहीं रह गया है। सुबह का नाश्ता पूरी तरह से छोड़ देना, दोपहर में अत्यधिक तेल और मसालों से युक्त जंक फूड का सेवन करना और रात को देर गए भारी भोजन करना उनकी जीवनशैली का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका है। पिज्जा, बर्गर, पास्ता और तरह-तरह के प्रोसेस्ड यानी अत्यधिक रिफाइंड और डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों में फाइबर की मात्रा बिल्कुल शून्य के बराबर होती है। फाइबर की यह कमी हमारी आंतों की गतिशीलता को बेहद धीमा कर देती है, जिसके कारण खाया गया भोजन पेट में ही सड़ने लगता है और विषैले टॉक्सिंस का निर्माण करता है। जब यह अधपचा भोजन आंतों में लंबे समय तक जमा रहता है, तो पेट में अत्यधिक गैस बनने लगती है, जिसके परिणामस्वरूप पेट हर समय गुब्बारे की तरह फूला हुआ महसूस होता है।
इस पूरे संकट में सबसे बड़ा आघात आंतों के भीतर रहने वाले उन सूक्ष्म जीवों पर पड़ रहा है, जिन्हें चिकित्सा जगत में 'गट माइक्रोबायोम' यानी मित्र बैक्टीरिया कहा जाता है। हमारी आंतों में अरबों की संख्या में अच्छे और बुरे दोनों तरह के बैक्टीरिया मौजूद होते हैं, जो भोजन को तोड़ने, विटामिनों के निर्माण और हानिकारक बैक्टीरिया से शरीर की रक्षा करने का काम करते हैं। जब युवा अत्यधिक मात्रा में प्रिजर्वेटिव्स, केमिकल युक्त कोल्ड ड्रिंक्स, और रिफाइंड शुगर का सेवन करते हैं, तो आंतों का यह नाजुक संतुलन पूरी तरह से बिगड़ जाता है। अच्छे बैक्टीरिया की संख्या तेजी से घटने लगती है और हानिकारक बैक्टीरिया पूरे पेट पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लेते हैं। इस असंतुलन की वजह से पेट में पुरानी सूजन रहने लगती है, जो न केवल पाचन को बिगाड़ती है बल्कि भोजन में मौजूद जरूरी पोषक तत्वों के अवशोषण की प्रक्रिया को भी पूरी तरह से ठप कर देती है।
इसके अतिरिक्त, युवाओं में शारीरिक निष्क्रियता और स्क्रीन के सामने घंटों बैठे रहने की आदत ने इस आग में घी डालने का काम किया है। दफ्तरों में लगातार आठ से दस घंटे तक कुर्सी पर बैठकर लैपटॉप पर काम करने या घर पर मोबाइल स्क्रीन को देखते हुए लेटे रहने से पेट की मांसपेशियों का हिलना-डुलना बिल्कुल बंद हो जाता है। चिकित्सा अध्ययनों के मुताबिक, जब हम पैदल चलते हैं या कोई भी शारीरिक गतिविधि करते हैं, तो हमारी आंतें स्वतः ही संकुचित और शिथिल होती हैं, जिससे मल आसानी से आगे बढ़ता है। जब यह शारीरिक गति पूरी तरह रुक जाती है, तो आंतों की प्राकृतिक चाल जिसे 'पेरिस्टालसिस मूवमेंट' कहा जाता है, बेहद सुस्त पड़ जाती है। यही मुख्य वजह है कि आजकल के युवाओं को सुबह के समय पेट साफ करने में अत्यधिक कठिनाई होती है और वे पूरे दिन भारीपन और चिड़चिड़ेपन से जूझते रहते हैं।
मानसिक तनाव और अधूरी नींद का भी हमारी आंतों के स्वास्थ्य से एक बहुत ही गहरा और सीधा संबंध पाया गया है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में 'गट-ब्रेन एक्सिस' कहा जाता है। हमारी आंतों में लाखों न्यूरॉन्स होते हैं, इसी वजह से इसे मानव शरीर का 'दूसरा दिमाग' भी कहा जाता है। जब कोई युवा ऑफिस के काम, पढ़ाई या निजी जीवन के कारण अत्यधिक मानसिक तनाव या एंग्जायटी से गुजरता है, तो उसका सीधा नकारात्मक संदेश पेट को जाता है। तनाव की स्थिति में हमारा शरीर 'कोर्टिसोल' नामक हार्मोन का स्राव करता है, जो आंतों में रक्त के प्रवाह को धीमा कर देता है और पाचक रसों के उत्पादन को पूरी तरह से रोक देता है। इसी तरह, रात को देर तक जागने और सुबह देर से उठने के कारण शरीर की जैविक घड़ी यानी 'सर्कैडियन रिदम' पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो जाती है, जिससे एसिडिटी की समस्या एक स्थायी बीमारी का रूप ले लेती है।
पेट की इन लगातार बनी रहने वाली समस्याओं से पर स्थायी काबू पाने के लिए युवाओं को अपनी दैनिक आदतों में आमूलचूल और बेहद कड़े बदलाव करने की सख्त जरूरत है। सबसे पहले भोजन में प्राकृतिक रूप से मिलने वाले फाइबर जैसे ताजे फल, हरी पत्तेदार सब्जियां, अंकुरित अनाज और साबुत अनाज की मात्रा को अनिवार्य रूप से बढ़ाना होगा। इसके साथ ही, आंतों के मित्र बैक्टीरिया को दोबारा जीवित करने के लिए अपने दैनिक आहार में प्रोबायोटिक्स जैसे घर का बना ताजा दही, छाछ और फर्मेंटेड फूड्स को शामिल करना एक बेहद अचूक उपाय साबित होता है। दिनभर में कम से कम तीन से चार लीटर गुनगुना या सामान्य पानी पीने की आदत डालनी होगी ताकि आंतों में जमा हुआ पुराना मल आसानी से बाहर निकल सके और शरीर पूरी तरह से हाइड्रेटेड रहे।
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